Tuesday 11 October 2011

जनप्रतिबद्ध भावनाओं की विचारशील कविताएँ



इंदौर। प्रगतिशील लेखक संघ  व जनवादी  लेखक संघ की इंदौर इकायों  ने 25 सितंबर 2011
रविवार को देवी अहिल्या केन्द्रीय लायब्ररी के अध्ययन कक्ष में कवि श्री अनंत श्रोत्रिय के रचना पाठ का आयोजन किया। श्री अनंत श्रोत्रिय ट्रेड युनियन व कर्मचारी संगठनों से जुड़े रहे हैं। वे  प्रगतिशील विचाराधारा के प्रतिबद्ध कवि हैं और फिलहाल प्रगतिशील लेखक संघ  की इंदौर इकाई के अध्यक्ष हैं। हाल ही में साहित्यक पत्रिका राग भोपाली ने अनंत श्रोत्रिय के रचनाकर्म पर एकाग्र एक अंक निकाला  है। श्री श्रोत्रिय ने "पूरब का सूरज" कविता सुनाकर कार्यक्रम की शुरुआत की। 

उठेंगे कदम, जूझेंगे हम
साथ जूझता होगा जनजन
हाथ उठा मुट्ठी तानी
ताल मिली गरजा जनजन
उन्नीस सौ बयालीस, आर.एन.आय. का रिवोल्ट
उद्वेलित करते, गरजा जनजन
हुंकार भरता नभ, बना प्रेरणा
बढाओ कदम
पूरब में सूरज बिखेरे  लाली
उड़ावे गुलाल यही तो सपना
दिन विहँसा किरणें विकीर्ण
जनजन में जागी खुशियां.

उनके बाद प्रदीप मिश्र, विनीत तिवारी और प्रांजल श्रोत्रिय ने श्री अनंत श्रोत्रिय की चुनी हुई कविताओं का पाठ किया। पोस्टर, यह रास्ते, सर्वोदय, प्रामाणिक ज्ञान आदि कविताओं को काफी सराहना मिली। वरिष्ठ कथाकार श्री सनत कुमार ने श्री श्रोत्रिय के मालवी लेखन और गद्य लेखन पर अपना वक्तव्य केन्द्रित करते हुए कहा कि १९५० के दशक के शुरुआती वर्षों में श्री अनंत श्रोत्रिय का एक आलेख महाकवि निराला पर आया था और उसने मालवा के पाठकों को निराला से परिचित करवाया था. वह बहुत अच्छा आलेख था जिसमें साहित्य के वैज्ञानिक आधारों पर निराला की कविता का विवेचन किया गया था. उन्होंने ये भी कहा कि श्री श्रोत्रिय की कविता अवधारणात्मक वृत्ति  की प्रकृतिमूलक कविता है.  द्वंद्वात्मक भौतिकवाद जैसी जटिल अवधारणा को भी उनहोंने कविता में पिरोया है।

हमारा अस्तित्व भी एक प्रश्न चिन्ह फिर क्यों कर यह सब वाद-विवाद,
जब सब कुछ है असत्य, अस्तित्वहीन तो यह माथापच्ची क्यों कर?
उन्होंने मालवी  जीवन के सुख-दु:ख, आशा-निराशा को बिना  लाउड हुए अभिव्यक्त किया है। उन्होंने मालवा के जनकवियों के मूल्यांकन का महत्त्वपूर्ण काम किया है। उनके साथ मालवा के प्रगतिशील कवियों की एक पूरी परंपरा है जिनमें मान सिंह राही, रंजन,  प्राण गुप्त  और मजनू इंदौरी के नाम प्रमुख हैं. उनकी विरासत का सही मूल्यांकन होना अभी बाकी है। यह यात्रा मालवा में 60 वर्ष से विकसित हो रही है। श्रोत्रियजी की कविताओं में  प्रकृति  के रम्य चित्र हैं।

पानड़ा झर-झर झरी रिया
आमवा में लाग्या मोर
बागों फूल में की उठाया
हिरदा में उठे हिलोर
 लीली लीली चादर तणी खेत में
इतराती अरे (अलसी) अई-वई डोले
उन्होंने कहा कि श्रोत्रियजी की कुछ कविताएं तो केदारनाथ अग्रवाल  की याद दिलाती हैं।
इस अवसर पर कवि ब्रजेश कानूनगो ने कहा कि श्रोत्रियजी की कविताओं में कला, शिल्प, और  बौद्धिकता  का इतना आग्रह नहीं है, जितना कि अभिव्यक्ति और सम्प्रेशनीयता  का। वे अपनी कविताओं के जरिए एक  प्रतिबद्ध कवि नज़र आते हैं। उनकी कविताएं रातनैतिक कविताएं हैं। कवि में वामपंथी एक्टिविस्ट साफ़ साफ़ दिखाई देता है। मनुष्यता व मनुष्य के पक्ष में अनंत जी की आकांक्षाएं अनंत हैं। वे 82 की उम्र में भी वामपंथी मूल्यों के प्रति सतत संघर्षरत हैं। उनका सकारात्मक कवि इस सफर को जारी रखना चाहता है। वे कहते हैं -
सफर लंबा है
मंजिल  समीप नहीं
इंसान ने फिर भी
कितना तय कर लिया रास्ता
लेखक, कवि एवं एक्टिविस्ट विनीत तिवारी ने कहा कि श्रोत्रिय जी की कवितायें उस दौर कि कवितायें हैं जब साधारण से साधारण कविता भी एक वैश्विक चेतना तक पहुँचने लगी थी. उस दौर में कपड़ा मिलों में काम करने वाले कवि भी सिर्फ अपनी तकलीफों या संघर्षों या घर परिवार के बारे में ही नहीं लिख रहे थे बल्कि वे एशिया के संघर्षरत अन्य देशों के बारे में या अंगोला या रूस, चीन की जनता के के बारे में भी लिख रहे थे और एक तरह का अंतरराष्ट्रीयतावाद उनमें विकसित हो रहा था. आज प्रतिष्ठित हो चुके कवियों के भीतर भी यह चेतना या तो नदारद है या बहुत कम मौजूद है. यह ज़रूर देखना चाहिए कि श्रोत्रियजी की कविताओं में शिल्प के प्रति असजगता है क्योंकि उन्होंने कवि कर्म को भी एक एक्टिविस्ट की ही तरह किया है. बहुत सारे दोहराव भी इन कविताओं में हैं लेकिन अपने समाज, राजनीति की जनपक्षधर समझ और वामपंथी सोच को इसमें साफ़ पारदर्शी तरह से देखा जा सकता है. उनकी कविता "पोस्टर" आम जन के भीतर विकसित होने वाली राजनीतिक समझ की प्रक्रिया की बानगी है-

दीवार पर चिपका पोस्टर
लाल नीले रंगों में छपा
इसके अक्षर समेटे हैं
बीज क्रांति के, संघर्ष के 

कार्यक्रम में कवि राजकुमार कुंभज ने श्रोत्रियजी की कविताओं और उनके जीवन को जनान्दोलनों का अभिन्न हिस्सा बताया और कहा कि श्रोत्रियजी की कविताओं में मुक्तिबोध के बिंब व प्रतीक याद आते हैं जो मनुष्य जीवन की जटिलताओं को व्यक्त करते हैं। उनके कवि कर्म में सारी चीजें जनसंघर्ष से निकल कर आई हैं। वे जुलूस को देखते हुए दर्शक नहीं बल्कि जूझते हुए संघर्षरत योद्धा की तरह नज़र आते हैं। इस घनीभूत पीड़ा में भाषा उनकी कविता के पीछे पीछे आ रही है। उनके तमाम  प्रतीक कलावाद के निषेध में आते हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता इंदौर इप्टा के अध्यक्ष विजय दलाल ने की। इस अवसर पर चुन्नीलाल वाधवानी, विक्रम कुमार, अजय लागू , सुलभा लागू , विश्वनाथ कदम, केसरी सिंह चिढार , सारिका श्रीवास्तव आदि मौजूद थे। संचालन किया प्रलेस इंदौर के श्री एस. के. दुबे ने।

Friday 29 July 2011


अंधेरे के खिलाफ सूरज -  डा. कमला प्रसाद

                                                                                                                                    -प्रदीप मिश्र


हिन्दी साहित्य के वर्तमान परिदृश्य में बहुत कम ऐसे व्यक्तित्व उपस्थित हैं। जो लेखन के साथ-साथ संगठन के स्तर पर भी उतनी ही मजबूती से जुटे हों। कमलाप्रसाद जी का नाम इस तर ह के व्यक्तित्वों पहली पंक्ति में रखा जा सकता है। इन्दौर आने के बाद उनसे पहचान हुई।

            उन दिनों मैं और अरूण आदित्य मिलकर भोरसृजन संवाद नामक पत्रिका निकालने की योजना बना रहे थे। सम्पादक मंडल में उनको रखना चाहते थे। इस संदर्भ में उनको पत्र लिखा। यह पत्र ही संभवतः हमारे नाम का पहला परिचय था। एकदम से नए नाम के युवा सम्पादकों के पत्र के जवाब में,उन्होंने न केवल हमारे प्रस्ताव को स्वीकार किया, बल्की जवाब मे एक लंबा पत्र लिखा। इस घटना ने उनके प्रति हमारे मन में सम्मान को और भी बढ़ा दिया। जहाँ बड़े-बड़े लेखकों की प्रतिक्रियाऐं संशय भरी और हतोत्साहित करनेवाली थीं। वहाँ पर कमला प्रसाद जी ने संबल दिया। उसके बाद  खूब खतोकिताबत हुए और उन्होंने बहुत सारा मार्ग निर्देशन दिया।  हमलोगों ने पत्रिका निकाली उसके जो भी अंक निकले, हिन्दी साहित्य के जनपद में उनका स्वागत हुआ।


            अचानक एक दिन उनका बच्चों के शादी निमन्त्रण पत्र आया। यह भी हमारे लिए सामान्य बात नहीं थी। जिससे अभी तक रूबरू मुलाकात भी नहीं हुई, उन्होंने आमन्त्रण भेजा। जब शादी में सम्मिलित होने गया तो देखा हिन्दी पट्टी के सभी तरह का साहित्यकार उपस्थित थे। न केवल साहित्यकार बल्की जो लोग मैदानों में उतकर सीधा-सीधा उपेक्षित वर्ग के उत्थान के सक्रिय थे, उनकी फौज वहाँ उपस्थित थी। यहीं पर पहलीबार मामा बलेश्वर और कुमार अंबुज से मुलाकात हुई। पूरा आयोजन शादी का कम एक बड़ा साहित्यिक आयोजन ज्यादा लग रहा था। वहाँ पर दिन भर साहित्य के और समाज के मूल्यों पर खूब चर्चा होती रही। इतनी सार्थक चर्चाऐं कई बार औपचारिक साहित्यिक गोष्ठियों में भी नहीं होतां हैं। यहाँ तक कि शाम को रसरंजन भी हुआ और साहित्यकारों का रसरंजन  जैसा होता है वैसा ही हुआ। ये पूरी जमात शादी कम साहित्यिक गोष्ठी के तमीज में ज्यादा थी।  खैर शाम को हम उनसे मिलने गए। सब में मैं सबसे छोटा था। अतः थोड़ा संकुचित और दूर -दूर था । समला प्रसाद जी सामने आए, अच्छा खासा कद। ऊपर की तरफ काढ़े गए ज्यादातर सफेद और कुछ काले बाल। बड़ी आँखें जिनमें बेहतर दुनिया के स्वप्न के लिए पर्याप्त जगह। आवज में बुलंदगी। उनको देखकर मेरे दिमाग में सबसे पहले निराला का ख्याल आया। सोचा निराला ऐसे ही दिखते रहे होंगे। हम सबमें ज्यादातर उनके शिष्य थे। शिष्यों के साथ  उनका पुत्रवत प्रेम साफ झलक रहा था । हम सब लोगों से चर्चा में वे मसगूल हो गए। वहाँ पर भी प्रगतिशील लेखक संघ की गतिविधियों और संगठनात्मक मजबूती पर चर्चा जारी हो गयी। वे भूल गए की उनके यहाँ शादी है। फिर किसी बहुत जरूरी काम के लिए उनके परिवार का कोई सदस्य आया और उनको ले गया।
            उन दिमों वे कला परिषद में थे वसुधा का पुनर्प्रकाशन शुरू हो गया था। कड़ी दोपहरी में हम उनसे मिलने कलापरिषद गए । पहुँचते ही चाय पानी की व्यवस्था के बाद वसुधा की बात हुई। मैंने आग्रह किया कि पाँच कापी मुझे भेज दें। भेजना क्या उन्होंने तुरंत सारी व्यवस्था करके वसुधा की प्रतियों का एक बंडल मेरे साथ लगा दिया। कुछ महीनों तक मैं वसुधा बेचता रहा फिर मेरी अपनी व्यस्तता और लोगों की अरूचि के कारण। वेचना मुश्किल हो गया। मैंने वसुधा के नए अंक न भेजने का निवेदन भी किया लेकिन अंक आने बंद नहीं हुए। वसुधा के बहुत सारे अंक मेरे पास जमा हो गए। जिनका पैसा भी नहीं भेज पाया। इस दौरान एक कार्यक्रम में कमला जी से मुलाकात हो गयी। तो उन्होंने टोका कि तुमने बहुत दिनों से पैसा भी नहीं भिजवाया और मेरे पोस्टकार्ड का जवाब भी नहीं दिया। मैने सच -सच बता दिया कि लोग खरीदना नहीं चाहते हैं और मेरे पास समय नहीं है कि उनको दे कर दस बार पैसा मांगने जाउँ।  मेरी बात उनको अच्छी नहीं लगी। उनकी मेरी बहस हो गयी। उसके बाद वे बोले ठीक है , वसुधा की जितनी प्रतियाँ बची हैं और जी हिसाब बाकी है करके भेज दो। मैंने उनके निर्देशानुसार काम कर दिया और मानकर चल रहा था कि अब उनसे बातचीत बंद ही हो गयी। लेकिन एक कार्यक्रम के दौरान भोपाल में मुलाकात हुई तो फिर वे उसी पुरानी आत्मियता से मिले। एक बार फिर मैं उनके व्यक्तित्व के आगे नतमस्तक हुआ।

            इस तरह से बहुत सारी मुलाकतों की स्मृतियाँ हैं। लेकिन पिछले दो तीन वर्षों से प्रलेश का जो छिछालेदर चल रहा था, उससे वे बहुत आहत थे। हर मुलाकात में वैचारिक आंदोलनों कमजोर पड़ने पर वे चिन्ता व्यक्त कर रहे थे।  अंतिम बार मैं उनसे भोपाल के चिरायु हास्पिटल में  मिला था। वह कद्दावर शरीर पिछले बीस वर्षों की मुलाकात में पहली बार कमजोर और खामोश दिखाई दिए। इस खमोशी को तोड़ती हुई उनकी स्वप्निल आँखों में बहुत सारे स्वप्न अभी भी तैर रहे थे, और पूछ रहे थे कि क्या मेरी मौत के साथ मेरे सपने भी मर जाऐंगे। मर जाएंगी वे सारी उम्मीदें ? हर मिलनेवालों से वे इन सवालों को साझा कर रहे थे। संगठन और वैचारिक आंदोलन  के कार्कर्ता की तरह से उन्होने अपना  पूरा जीवन झोंक दिया और अंतिम समय तक पूरी पीढ़ी तैयार कर गए। जो उनके सपनों को साकार करने में सक्षम है। इसलिए वे हमारे बीच में हमेशा बने रहेंगे। उनका मूर्त सभी युवा साथियों में विधटित हो गया है। अब हम सब के क्रिया कलापों और संधर्षों में कमला प्रसाद जी जीवित हैं। ुनका जीवन और विस्तृत और अमूर्त हो गया है। इस अंधेरे के खिलाफ सूरज में तब्दील हो चुके कमला प्रसाद जी को याद करना, एक वैज्ञानिक समाज के स्वप्न जैसा है।


प्रदीप मिश्र, दिव्याँश ७२ए  सुदर्शन नगर, अन्नपूर्णा नगर, इन्दैर-४५२००९  .प्र
मो. -  ९४२५३१४१२६

Tuesday 22 March 2011

ये कौन सा दयार है


विचार सिंह घुड़ चढ़े आज वेहद नाराज थे। बार-बार दुष्यंत कुमार की शेर दोहरा हे थे - "सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं / मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए। मुझे देखते ही खूब जोर से चिल्लाए तुम बुद्धी जीवियों ने इस देश को डुबा दिया। जहाँ सोने की चिढ़िया करती थी बसेरा वहाँ अमरीका के कौवे काँव-काँव कर रहे हैं, और चीन की बिल्ली तो बेधड़क घूम रही है। जो बचा खुचा है उसे पकिस्तान के स्यार नोंच रहे हैं। नेता तो अब इस देश में रहे नहीं और तुम बुद्धीजीवी लोग तो सरकारी पुरस्कारों और पूंजीपतियों के अनुदान पर मदहोश  हो। अभी हाल में सुना है कि लेखकों में डालर का घुन भी लग गया है। सबके सब हमारे प्यारे देश को निपटाने में लगे हो। गद्दार हो तुम सब गद्दार।" कहते ह्ए वे गुटके की पीक थूकते हुए अपनी साइकिल पर सवार हुए और मेरा जवाब सुने बगैर आगे बड़ गए। मुझे समझ में आ रहा था। अभी - अभी हमने अपने गण तंत्र का ६२ वां उत्सव मानाया है और विचीर सिंह जी हर १५ अगस्त और २६ जनवरी के १५ दिन पहले से एक महीने बाद तक  अत्यंत उत्साहित रहते हैं। इस दौरान वे आजादी से लेकर अभी तक की पूरी यात्रा के विश्लेषण करते रहते हैं। उनकी नाराजगी हमारे देश की आम जनता की आवाज में होती है। इसलिए उनको गम्भीरता सुनना जरूरी होता है। आज भी वे जो कुछ कह कर गए उसमें दम तो था। सचमुच दिन प्रतिदिन हम अपने सोरकारों से मुक्त होते जा रहे हैं। क्या गणतंत्र दिवस का मतलब सिर्फ इतना ही है कि डोर का खिंचना और झण्डे का फहर जाना। सैल्युट दागना और भाषणबाजी करना और फिर पार्टी-सार्टी  कर लेना। यहाँ पर एक सवाल और खड़ा होता है कि क्यों होनी चाहिए इन राष्ट्र त्यौहारों पर छुट्टियाँ ? क्या जब इन छुट्टियों को बारे में निर्णय लिया गया होगा उसके पीछे यही पार्टी-सार्टी , पिकनिक-सिकनिक था या कुछ और ? कम से कम इन उत्सवों पर हम सबको अपना भी मूल्यांकन करना चाहिए कि हम कितने नागरिक बचे और पिछले वर्षभर में बतौर नागरिक जो जिम्मेदारियाँ अपने देश के प्रति थीं, उनको किस हद तक हम निभा पाए ?  मुझे लगता है कि इस कटघरे में अगर खड़ा करें तो सबसे ज्यादा संदेहास्पद स्थिती हमारे समय के बुद्धीजीवियों की होगी। खैर यह सब सोचता हुआ मैं यादव के पान ठेले पर पहुँचा ही था और गुटके का डोज लेकर मुँह में डाला ही था कि विचार सिंह जी वापस पहँच गए। लगभग लड़खड़ते हुए साइकिल को स्टैण्ड पर लगाए और झूमते हुए मेरे पास आए और मेरी आंखों में आँख डलकर पूछा - "क्यों जनाब कुछ समझ में आया। बहुत बड़े कवि बने फिरते हो ना  तो सुनों मंगलेश डबराल ने क्या लिखा है- एक सरल वाक्य बचाना मेरा उद्देश्य है /मसलन कि हम इंसान हैं /मैं चाहता हूँ इस वाक्य की सच्चाई बची रहे / सड़क पर जो नारा सुनाई देरहा है /वह बचा रहे अपने अर्थ के साथ /मैं चाहता हूँ निराशा बची रहे /जो फिर से उम्मीद पैदा करती है /अपने लिए  /शब्द बचे रहें /जो चिड़ियों की तरह कभी पकड़ में नहीं आते /प्रेम में बचकानापन बचा रहे /कवियों में बची रहे थोड़ी सी लज्जा....." इस बार वे पूरी ताकत से खड़े रहे और मेरी आँखों में आँख डालकर मेरे जवाब का इन्तजार कर हे थे और मेरे अंदर चन्द्रकांत देवताले की पंक्तियाँ गुँज रही थी- एक दिन मांगनी होगी हमें माफी।
mishra508@gmail.com

Tuesday 25 January 2011

गिद्ध शाकाहारी नहीं होते


आधी शताब्दी से ज़्यादा दिनों तक
आज़ाद रहने के बाद
मैं जिस जगह खड़ा हूँ
वहाँ की ज़मीन दलदल में बदल रही है
और आसमान गिद्धों के कब्जे में है

लोकतन्त्र की लोक को
सावधान की मुद्रा में खड़ा कर दिया गया है
हारमोनियम पर एक शासक का
स्वागतगान बज रहा है

जब जयगान
तीन बार गा लिया जाएगा
तब बटेंगी मिठाइयाँ
मिठाइयाँ लेकर

जब लोग लौट रहे होंगे घर

झपटे मारेंगे गिध्द

गिध्द शाकाहारी नहीं होते हैं
फिर क्या खायेंगे वे
शुन्यकाल के इस प्रश्न पर
देश की संसद मौन है

( 26 जनवरी हमारे लिए श्रेष्ठ उत्सव का दिन है। एक भारतीय होने और नागरिकता बोध के इस उत्सव पर सारे देशवासियों को बधाई। इस समय लोग कश्मीर के लाल चौक पर झण्डावंदन के लिए एक युवा नेता कूच कर गए हैं और इस कूच के कारण जो अशान्ति और समस्याएं जन्म ले रहीं हैं वे भी हम सबके सामने है। यहाँ पर एक बात तो ठीक है कि कश्मीर हमारा अभिन्न अंग है और हमारी आजादी और लोकतंत्र के सम्मान में लाल चौक पर झण्डा फहरना चाहिए। लेकिन जिस तरीके से यह पूरा मूहीस चल रहा है, वह देश और झण्डे का सम्मान कम अपने वोट बैंक की राजनीति ज्यादा दिख रहा है। हमारे देश की राजनीति को का दृष्टि मिलेगी और कब सारे राजनीतिज्ञ अपने दायित्वबोध को समझेंगे। ऐसा न हो यह स्वप्न भोर से पहले टूट जाऐ। हमें एक ऐसा देश चाहिए जहाँ लोकतंत्र और नागरिक बहैसियत रहते हों। खैर एक मेरी समसामयिक कविता दिख गयी सो लगा दिया। पढ़ें और विचार दें।-  प्रदीप मिश्र, दिव्याँश ७२ए सुदर्शन नगर, अन्नपूर्णारोड, इन्दौर-४५२००९ (म.प्र), भारत.,फोन ०९१-०७३१-२४८५३२७, मो. ०९४२५३१४१२६, मेल – mishra508@yahoo.co.in, )

Monday 24 January 2011

डॉ0 विनायक सेन की सजा के खिलाफ


(हमारे देश की प्रशासनिक व्यवस्था की क्रूरता और राजनीतिक पार्टियों द्वारा उनके दुरूपयोग का ज्वलंत उदाहरण डॉ. विनायक सेन प्रकरण हैं। लोकतांत्रिक मूल्यों का उपहास , देश का अपमान है। जिसे कोई भी सजग नागरिक स्वीकार नहीं करेगा। हम सब इसका विरोध कर रहे हैं। देश के हर हिस्से का बुद्धीजीवी इसका विरोध कर रहा है। इस संदर्भ में इन्दौर में भी विरोध दर्ज हुआ। आज भी स्थानीय शहीद भवन में एक विरोध प्रस्ताव रखा गया है, जिसमें नगर के सारे बुद्धीजीवी एकत्रित होंगे। फिलहाल यहाँ पर देश के दूसरे हिस्से में हुए विरोध प्रदर्शनों की रपट दी जारी है। इसको अशोक पाण्डेय के ब्लाग से मारा है। मुझे लगता है, इस प्रकरण में देश के हर सजग नागरिक को शामिल होना चाहिए। इस उद्देश्य से अपने पाठकों के लिए यहाँ पर दे रहा हूँ - प्रदीप मिश्र)

छत्तीसगढ़ की निचली अदालत द्वारा विख्यात मानवाधिकारवादी व जनचिकित्सक डॉ0 विनायक सेन को दिये उम्रकैद की सजा के खिलाफ तथा उनकी रिहाई की माँग को लेकर जन संस्कृति मंच (जसम) की ओर से 2 जनवरी 2011 को लखनऊ के शहीद स्मारक पर विरोध प्रदर्शन व सभा का आयोजन किया गया। इसके माध्यम से लखनऊ के लेखकों, संस्कृतिकर्मियों, नागरिक अधिकार व जन आंदोलनों से जुड़े कार्यकर्ताओं ने विनायक सेन की सजा पर अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि इस तरह का फैसला हमारे बचे.खुचे जनतंत्र का गला घोटना है, यह नागरिक आजादी और लोकतंत्र पर हमला है। इसलिए विनायक सेन की रिहाई का आंदोलन लोकतंत्र को बचाने का संघर्ष है।


प्रदर्शनकारी लेखकों व कलाकारों के हाथों में प्ले कार्ड्स थे जिनमें सीखचों में बन्द विनायक सेन की तस्वारें थीं और उन पर लिखा था ‘कॉरपोरेट पूँजी का खेल, विनायक सेन को भेजे जेल’,विनायक सेन को रिहा करो’ आदि। इस अवसर पर जन कलाकार परिषद के कलाकारों ने शंकर शैलेन्द्र का गीत ‘भगत सिंह इस बार न लेना काया भारतवासी की, देशभ्क्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फाँसी की’ और दुष्यन्त की गजल ‘हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए’ गाकर अपना विरोध जताया।

जन संस्कृति मंच द्वारा आयोजित इस विरोध प्रदर्शन के माध्यम से माँग की गई कि डा0 विनायक सेन को रिहा किया जाय, आपरेशन ग्रीनहंट व सलवा जुडुम को बन्द किया जाय, छत्तीसगढ़ जनसुरक्षा कानून और इसी तरह के अन्य जन विरोधी कानूनों को खत्म किया जाय और इन्हीं कानूनों के तहत उम्रकैद की सजा पाये नारायण सन्याल और पीयूष गुहा को रिहा किया जाय।

इस विरोध प्रदर्शन में जनवादी लेखक संघ, एपवा, पी यू सी एल, इंकलाबी नौजवान सभा, अलग दुनिया, आइसा, दिशा, अमुक आर्टिस्ट ग्रुप, आवाज आदि के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इस मौके पर हुई विरोध सभा को रामजी राय, अजय सिंह, शिवमूर्ति, ताहिरा हसन, गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव, रमेश दीक्षित, सुभाष चन्द्र कुशवाहा, राजेश कुमार, के0 के0 पाण्डेय, भगवान स्वरूप कटियार, चन्द्रेश्वर, वंदना मिश्र, के0 के0 वत्स, कल्पना पाण्डेय, बी0 एन0 गौड़, सुरेश पंजम, आदियोग, बालमुकुन्द धूरिया, अनिल मिश्र ‘गुरूजी’, विमला किशोर, जानकी प्रसाद गौड़, के0 के0 शुक्ला, महेश आदि ने सम्बोधित किया। सभा का संचालन जसम के संयोजक कौशल किशोर ने किया

वक्ताओं ने कहा कि जिन कानूनों के आधार पर विनायक सेन को सजा दी गई है, वे कानून ही कानून की बुनियाद के खिलाफ हैं। इनमें कई कानून अंग्रेजों के बनाये हैं जिनका उद्देश्य ही आजादी के आंदोलन को कुचलना था। आज उन्हीं कानूनों तथा छŸाीसगढ़ में लागू दमनकारी कानूनों का सहारा लेकर विनायक सेन पर राजद्रोह व राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने की साजिश का आरोप लगाया गया है और इसके आधार पर उन्हें सजा दी गई है। गौरतलब है कि अपने आरोपों के पक्ष में पुलिस द्वारा जो साक्ष्य पेश किये गये, वे गढ़े हुए थे और अपने आरोपों को सिद्ध कर पाने वह असफल रही है। अगर इन आरोपों को आधार बना दिया जाय तो लोकतांत्रिक विरोध की हर आवाज पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया जा सकता है।

वक्ताओं ने इस बात पर गहरी चिन्ता व्यक्त की कि न्यायालयों के फैसले भी राजनीतिक होने लगे हैं। भोपाल गैस काँड और अयोध्या के सम्बन्ध में आये कोर्ट के फैसले ने न्यायपालिका के चेहरे का पर्दाफाश कर दिया है। विनायक सेन के सम्बन्ध में आया फैसला नजीर बन सकता है जिसके आधार पर विरोध की आवाज को दबाया जायेगा। अरुंघती राय पर भी इसी तरह की धारायें लगाकर मंकदमा दर्ज किया गया है। इस प्रदेश में भी सामाजिक कार्यकर्ता सीमा आजाद को एक साल से जेल में बन्द रखा गया है।

वक्ताओं का कहना था कि जब भ्रष्टाचारी, घोटालेबाज, माफिया व अपराधी सरकार को सुशोभित कर रहे हों वहाँ आदिवासियों, जनजातियों को स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराने जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए संघर्ष करने तथा सलवा जुडुम से लेकर सरकार के जनविरोधी कार्यों का विरोध करने वाले डॉ सेन पर दमनकारी कानून का सहारा लेकर आजीवन कारावास की सजा देने का एक मात्र मकसद जनता के प्रतिरोध की आवाज को कुचल देना है। इसीलिए आज विनायक सेन प्रतिरोध की संस्कृति और इंसाफ व लोकतंत्र की लड़ाई के प्रतीक बन गये हैं।

जसम के इस प्रदर्शन के माध्यम से यह घोषणा भी की गई कि डा0 विनायक सेन की रिहाई के लिए विभिन्न संगठनो को लेकर रिहाई समिति बनाई जायेगी तथा यह समिति विविध आंदोलनात्क कार्यक्रमों के द्वारा जनमत तैयार करेगी।
- कौशल किशोर

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