ईसा से लगभग पाँच हजार साल पहले मिस्त्र की प्राचीन संस्कृति का विकास हुआ। नील नदी की बाढ़ के कारण यहाँ की उर्वर धरती में जिस संस्कृति का विकास हुआ, उसका गहरा असर भुमध्यसागर के प्रदेशों पर पड़ा। यह प्राचीन संस्कृति बर्बर और अर्ध-बर्बर अवस्था की है। लोहे के औजार बनना अभी शुरू नहीं हुए। तांबा और कांसा मुख्य धातुएँ हैं। खेती (अर्थात् बागववनी) पहले हाथ से होती थी, फिर कुदाल को जुए से बाँधकर कर्षण द्वारा ``कृषि`` होने लगी। बागों के बदले क्षेत्रों को जोत-बो कर ``खेती`` होने लगी। जुए में बँधा हुआ कुदाल हल बना और बैल उसे खींचने लगे। इस तरह मनुष्य ने पशुओं के योग से अपने श्रम और उत्पादन की शक्ति बढ़ाई। (पृष्ठ ३२-३३)
प्राचीन संस्कृतियों में भारत की सिन्धु घाटी की सभ्यता का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है। ``मोहेज्जोदड़ो और सिन्धु घाटी की सभ्यता`` (१९३१) में सर जॉन मार्शल ने लिखा है कि पुरातत्व की खोज से चौथी सहस्त्राब्दी ई. पू. के जीवन का ही पता चलता है ``लेकिन मोहेज्जोदड़ो में ही पहले के और कई नगर एक-दूसरे के नीचे दफनाये पड़े हैं और उन तक अभी फावड़े की पहुँच नहीं हुई।`` सिन्ध और बलूचिस्तान मंे और नगरों के मिलने की संभावना बतलाई गई है। मार्शल के अनुसार हड़प्पा और मोहेज्जोदड़ो में वैसी संस्कृति मिली हैं, वह काफी दिनों से विकसित होती रही होगी। वह ``भारत की धरती पर काफी रूढ़िगत हो चुकी थी और उसके पीछे कई हजार वर्ष का मानव- श्रम निहित होना चाहिए।`` इससे सिद्ध होता है कि सिन्धुघाटी की संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से है और यदि वह मिस्त्र की संस्कृति से पहले की नहीं है तो उसकी समकालीन अवश्य है। (पृष्ठ ३४-३५)
सिन्धुघाटी की संस्कृति का प्रभाव न केवल भारत पर वरन् अन्य देशों पर भी पड़ा। गॉर्डन चाइल्ड के शब्दों में यहाँ के विज्ञान का प्रभाव पश्चिम के विज्ञान पर पड़ा और इसलिए हमारे लिए वह ``ब्रौंज एज`` की संस्कृति नष्ट नहीं हुई वरन् हमारे न जानते हुए भी उसका काम आगे प्रगति का रहा है। (पृष्ठ ३७)
ऐंगेल्स के अनुसार यह बर्बर अवस्था की तीसरी और ऊँची मंजिल है जो सभ्यता के आरम्भ से घुलमिल जाती है। इस अवस्था की संस्कृति के निर्माण में एशिया की प्रमुख भूमिका है। अफ्रीका और अमरीका में यह संस्कृति विकसित हुई। यूरोप की देन अभी नगण्य है। (पृष्ठ ३७-३८)
इन प्राचीन समाजों के गर्भ में जो श्रम-विभाजन और वर्ग-विभाजन क्रमश: विकसित होता है, वह सामंती समाज की विशेषता है। हमें वर्ग-विभाजन का यह रूप नहीं मिलता कि समाज में एक ओर तो केवल दास हों और दूसरी और दासों के स्वामी हों। युद्ध आदि से दास प्राप्त होते है, उनसे उन्हीं लोगों की शक्ति बढ़ती है जो शेष समाज को यानी अपने सगोत्रियों को निर्धन बनाते जा रहे हैं और पूरे कबीले की अधिकांश भूमि अपने अधिकार में करते जाते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि सम्पत्तिशाली वर्ग के हित में जब राज्यसत्ता का जन्म होता है, तब वह केवल दासों का दमन करने के लिए नहीं होती वरन् समाज के ``स्वतंत्र`` किन्तु निर्धन सदस्यों के विरूद्ध भी उसका उपयोग होता है।(पृष्ठ ३८)
एथेन्स में दासों की संख्या स्वाधीन यूनानियों से बहुत ज्यादा थी। इनके श्रम के बल पर ही यूनान की सभ्यता का प्रकाश फैला था। एथेंस के कारखानों में ये दास ही काम करते थे। इसलिीए यह स्वाभाविक था कि व्यापारी और औद्योगिक वर्ग उन्हें नियंत्रण मेें रखने के लिए शक्ति का उपयोग करें। एथेंस में फी नागरिक के पीछे अठारह गुलाम थे लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि हर नागरिक के पास गुलाम थे और समाज से धनी-निर्धन का तीव्र वर्ग-भेद मिट गया था। ऐंगेल्स ने लिखा है, ``व्यापार और उद्योगधन्धों की प्रगति से थोड़े से लोगों में सम्पत्ति एकत्र और कंेद्रित हुई। आम स्वाधीन नागरिक गरीब थे। उनके सामने दो ही रास्ते थे - या तो वे दस्तकारी में दास श्रमिकों से होड़ करें जिसे घृणित और त्याज्य समझा जाता था, इसके सिवा जिसमें सफलता की आशा भी बहुत कम थी - या पूरी तरह मुफलिस हो जाएँ। उस समय की परिस्थितियों में दूसरी बात ही हुई।`` इस मुफलिसी ने ही एथेन्स को तबाह किया। (पृष्ठ ४१-४२)
........शेष अगली बार
(हिन्दी साहित्य में रामविलास शर्मा जी को इसलिए हमेशा याद किया जाएगा क्योंकि वे पहले समीक्षक हैं, जिन्होंने हिन्दी समीक्षा को व्यापक अर्थों में सामाजिक मूल्यों से जोड़ा है। न केवल जोड़ा है बल्कि उस पगडण्डी का निर्माण भी किया है, जिसपर भविष्य की समीक्षा को चलना होगा। अन्यथा हिन्दी समीक्षा अपनी दयनीय स्थिती से कभी भी उबर नहीं पाएगी। इस संदर्भ में इन्दौर के राकेश शर्मा ने रामविलास जी पर बहुत गम्भीरता से अध्ययन किया है। वे उनकी पुस्तकों से वे अंश जो वर्तमान समय की जिरह में प्रासंगिक हैं, हमारे लिए निकाल कर दे रहे हैं। हम एक सिलसिला शुरू कर रहे हैं, जिसकी छठी कड़ी आपके सामने है, जिसमें रामविलास शर्मा जी की पुस्तक मानव सभ्यता का विकास से निकाले गए अंश हैं। पढ़ें और विचारों का घमासान करें। - प्रदीप मिश्र)
Tuesday, 16 September 2008
Monday, 1 September 2008
मानव सभ्यता का विकास -5
अंग्रेज पहले भारत में व्यापार करने आये थे, यहाँ का माल अपने वहाँ बेचकर मुनाफा कमाने आये थे। लेकिन अपने यहाँ की औद्योगिक उन्नति के साथ-साथ उन्होंने भारत के उद्योग-धंधों का नाश किया। १८ वीं सदी के अन्त तक भारत के रेशमी और सूती कपड़े अंग्रेजी बाजार में वहाँ के कपड़ों के मुकाबले में ५०-६० फीसदी सस्ते बेचे जा सकते थे। इससे साबित होता है कि इंगलैण्ड अभी औद्योगिक दृष्टि से कमजोर था। अपने माल की खपत के लिए उसने भारतीय माल पर ७०-८० फीसदी कर लगाया जिसका अर्थ था, माल आने पर एकदम रोक लगा देना। इससे पहले एलिजाबेथ ने लोगों को बाध्य किया था कि वे इतवार और त्यौहार के दिन इंगलैंड की बनी हुई टोपी लगाया करें। सत्रहवीं सदी के उत्तरार्ध में चार्ल्स द्वितीय ने कानून बनाया था कि लोगों को दफनाने के लिए स्वदेशी कफन ही काम में लाया जाय। इससे इंगलैंड की औद्योगिक प्रगति का अनुमान किया जा सकता है। एलिजाबेथ के समय में फ्लैडर्स के बुनकर भागकर इंगलैंड आये थे और वहाँ के नगरों में बस गये थे। ``इस नये अपनाये हुए देश को उन्होंने इस योग्य बनाया कि ऊनी उद्योग में वह सिरमौर हो।`` अंग्रेजों ने भारतीय माल पर जो भारी कर लगाने की नीति अपनायी थी, वह १९ वीं सदी के उत्तरार्द्ध तक जारी रही। १८४० की पार्लियामेंट कमेटी की जाँच से पता चलता है कि भारत में आने वाले अँग्रेजी माल पर साढ़े तीन फीसदी (सूती और रेशमी माल पर) और दो फीसदी (ऊनी माल पर), बीस फीसदी (रेशमी माल पर) और दो फीसदी (ऊनी कपड़ों पर) कर लगता था लेकिन यहाँ से जो माल विलायत जाता था, उस पर दस फीसदी (सूती माल पर), बीस फीसदी (रेशमी माल पर) और तीन फीसदी (ऊनी माल पर) कर लगता था। देखने की बात है कि ऊनी माल पर सबसे ज्यादा कर था, यानी इसकी होड़ से अंग्रेज उद्योगपति सबसे ज्यादा बचना चाहते थे और यह उस समय जब इंगलैंड में मशीनों का चलन हो गया था। (पृष्ठ १२०)
भारत में अंग्रेजों की लूट के फलस्वरूप यहाँ के औद्योगिक केन्द्र तबाह हो गये। ढाका और मुर्शिदाबाद के लिए क्लाइव ने कहा था कि ये नगर उतने ही समृद्ध है जितना कि लंदन (और जैसा शहर इंगलैंड में दूसरा न था)। लेकिन १९ वीं सदी के पूर्वार्द्ध में ढाका की आबादी डेढ़ लाख से घट कर तीस-चालीस हजार ही रह गई। सर चाल्स्र ट्रेवेलियन के अनुसार ढाका जो भारत का मैंचेस्टर था वीरान होकर जंगल बनता जा रहा था और मलेरिया का शिकार होने जा रहा था। मोंटगोमरी मार्टिन ने अंग्रेजों द्वारा सूरत, ढाका और मुर्शिदाबाद जैसे औद्योगिक केन्द्रों के नाश को बहुत ही दुखद घटना बतलाया था। १८१७ में उसका निर्यात बन्द हो गया था। बाहर से सस्ता लोहा मँगाने की अंग्रेजी नीति के कारण भारत का अपना लोहे का कारोबार चौपट हो गया। अर्थशास्त्री बकनन ने लिखा है कि जैसी आधुनिक युग के पहले यूरोप में थीं। (आज का भारत अध्याय ५)। यहीं दशा जहाजों के कारबार की हुई। अंग्रेजी राज में भारतीय उद्योग-धंधों की तबाही पर अपनी पुस्तक में वामनदास बसु ने लिखा है कि पूरब का काफी व्यापार पहले भारतीय जहाजों द्वारा होता था। चीन, ईरान, लालसागर तक भारत के जहाज माल पहुँचाते थे। १७९५ में ईस्ट इण्डिया कम्पनी को यह आज्ञा मिली थी कि वह भारत में बने हुए जहाजों द्वारा लंदन माल ला सकती है। सर टामस मनरो ने भारतीय उद्योग-धंधों की दशा देखकर कहा था, ``औद्योगिक रूप में हम लोग उनसे (भारतवासियों से) बहुत पिछड़े हुए हैं।`` रजनी पाम दत्त ने लिखा है कि १८ वीं सदी के मध्य तक इंगलैंड कृषिप्रधान देश था। उन्होंने बैंस का हवाला दिया है जिसने लिखा है कि १७६० तक सूती कपड़र बनाने के लिए इंगलैंड में जो मशीनें इस्तेमाल की जाती थी, वे प्राय: वैसी ही साधारण थी जैसी भारत की। एक तो उन्होंने अपने औद्योगिक विकास के लिए आवश्यक पूँजी बटोरी, दूसरे अपने माल के लिए भारत को खेतिहर देश बनाकर उन्होंने एक बाजार कायम किया। इंगलैंड मेमं भारत की लूट के फलस्वरूप बैंकिंग का कारोबार चमका। प्लासी के युद्ध के बाद इंगलैंड की हालत बदल गई। वहाँ जिन यंत्रों का आविष्कार किया गया था, उन्हें काम में लाने की सुविधा पैदा हो गई। ``इस तरह भारत की लूट पूँजी के एकत्रीकरण का वह गुप्त स्त्रोत थी जिसकी अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका के कारण इंगलैंड में औद्योगिक क्रांति संभव हुई।`` (पृष्ठ १२०-१२१)
हेगेल एक भाववादी विचारक था, लेकिन इसी कारण मार्क्स और ऐंगेल्स ने उसकी विचारधारा से किनाराकशी नहीं कर ली। उन्होंने उसके चिन्तन के क्रांतिकारी तत्व को पहचाना और उसे विकसित किया। यह पद्धति बहुत महत्वपूर्ण है जिससे हम पुराने विचारकों का सही मूल्यांकन करना सीखते हैं। मार्क्स ने लिखा है कि उन्होंने ``पूँजी`` के प्रकाशन से तीस साल पहले ही हेगेल के द्वन्द्ववाद के रहस्यमय पक्ष की आलोचना की थी। हेगेल से अपनी पद्धति का भेद बतलाते हुए उन्होंने लिखा है, ``मेरी द्वन्द्वात्मक पद्धति हेगेल पद्धति से भिन्न ही नहीं है वरन् ठीक उसकी उल्टी है।`` हेगेल के लिए मनुष्य की चिंतनक्रिया वास्तविक संसार की मूल प्रेरक शक्ति है और यथार्थ जगत् ``विचार`` का बाह्म रूप है। इसके विपरित मार्क्स के लिए मनुष्य का विचार-जगत् उसके मन में भौतिक जगत् का ही प्रतिबिम्ब है और वह विचारों का रूप धारण करता है। ``हेगेल में द्वन्द्ववाद रहस्यमय बन जाता है। लेकिन इससे इस बात में रूकावट नहीं पड़ी की हेगेल ने सबसे पहले व्यापक और सचेत ढंग से उसकी क्रिया का आम रूप पेश किया था। हेगेल का द्वन्द्ववाद सिर के बल खड़ा है। रहस्यमय रूप के भीतर उसके तर्क-संगत तत्व को जाना है तो उसे फिर से सीधे खड़ा करना होगा।``(पृष्ठ १४३)
मनुष्य ने युगों गों तक अपार यातनाएँ सहकर आज की सभ्यता को जन्म दिया है। यातना अधिकांश जनता के भाग्य में पड़ी, उस यातना से सुख उठाना थोड़े-से सम्पत्तिशाली लोगों के हाथ में रहा। यह युग मानव-समाज के विकास में एक विराट परिवर्तन का युग है। शोषण और ध्वंस की शक्तियाँ अपना विनाश सामने देख रही हैं। वे संसार की बहुसंख्यक जनता का नाश करके उस घड़ी को टालना चाहती हैं। शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व और पंचशील के सिद्धांत उन्हें प्रिय नहीं लगते, व्यवहार में प्रतिदिन वे इन सिद्धांतों को तोड़ती हैं। साथ ही स्थायी शांति और शोषणहीन व्यवस्था कायम करने वाली शक्तियाँ अदम्य वेग से आगे बढ़ रही हैं। विजय इन्हीं प्रगतिशील शक्तियों की होगी। वह देश जो दो सौ वर्ष पहले संसार के किसी भी देश से पिछड़ा हुआ न था, शीघ्र ही अपना ऐतिहासिक स्थान प्राप्त करेगा और मानव-सभ्यता के विकास में अपने इतिहास के अनुरूप ही योग देगा। यह विश्वास सामाजिक विकास के वैज्ञानिक अध्ययन से पुष्ट होता है।(पृष्ठ ११)
एक अर्थ में मनुष्य श्रम द्वारा ही पशु से मनुष्य बना है। पशु-अवस्था से निकले हुए मनुष्य को लाखों वर्ष हो चुके और उस अवस्था का ठीक काल-निर्णय करना सम्भव नहीं है। लेकिन पशु-जीवन से निकलते-निकलते उसे लाखों वर्ष लगे होंगे, इसमें संदेह नहीं। उसकी सभ्यता का इतिहास उसके पशुजीवन के इतिहास के समय को देखते हुए बहुत छोटा है। (पृष्ठ १५)
मानव चेतना बाह्य जगत की वस्तुगत सत्ता को ठीक-ठीक नहीं समझती, इसलिए मनुष्य कल्पना करता है कि वह जादू-टोने से, जंतर-मंतर सेऱ्या आगे चलकर योग-बल से।-उसे इच्छानुसार बदल लेगा। (पृष्ठ २२)
मातृसत्ताक गोत्रों में किसी व्यक्ति की अपनी वस्तुएँ उसके न रहने पर उसके मामा, भांजे और भाई पाते हैं। उसकी अपनी संतान उन्हें नहीं पाती। नारी की वारिस उसकी अपनी संतान, उसकी बहने और उसकी बहनों की सन्तान होती है। इस तरह गोत्र की उत्पत्ति गोत्र में ही रहती है। मातृसत्ताक विरासत का यह ढंग बहुत दिनों तक प्राचीन मिस्त्र में चलता रहा जहाँ राज परिवार में बहन-भाई इसलिए शादी करते थे कि अपने गोत्र की सम्पत्ति बाहर न जाय।(पृष्ठ २३)
इस संस्कृति के विनाश का श्रेय यूरोप की ``सभ्यता`` को है। अमरीकी आदिवासियों के विनाश का इतिहास अच्छी तरह प्रकट करता है कि यूरोप के लुटेरे वहाँ किस तरह की सभ्यता फैलाने गये थे। इसमें सन्देह नहीं कि यूरोप निवासी वहाँ न पहुँचते तो पेरू और मेक्सिको के लोग सभ्यता की अगल मंजिलों की तरफ बढ़ते। फॉस्टर ने ठीक लिखा है कि इनमें शासक वर्ग और राज्यसत्ता के निर्माण के लक्षण मिलते हैं। अज्तेक और इंका लोगों ने दूसरे कबीलों को जीत कर अपना राज्य-विस्तार किया था और उन कबीलों से दास, सैनिक, नरमेध के लिए बलि प्राप्त करते थे। फॉस्टर ने लिखा है, ``जब स्पेन के लोग अमरीका पहुँचें, तब दिखता है कि इंका और अज्तेक लोग वैसे ही समाज का विकास करने में लगे हुए थे, जैसे प्राचीन ग्रीस और रोम के लोग।`` इससे सिद्ध होता है कि सामाजिक विकास के नियम अमरीकी आदिवासियों पर वैसे ही लागू होते हैं जैसे यूरोप के ``सभ्य आर्यों`` पर। (पृष्ठ ३२)
........शेष अगली बार
(हिन्दी साहित्य में रामविलास शर्मा जी को इसलिए हमेशा याद किया जाएगा क्योंकि वे पहले समीक्षक हैं, जिन्होंने हिन्दी समीक्षा को व्यापक अर्थों में सामाजिक मूल्यों से जोड़ा है। न केवल जोड़ा है बल्कि उस पगडण्डी का निर्माण भी किया है, जिसपर भविष्य की समीक्षा को चलना होगा। अन्यथा हिन्दी समीक्षा अपनी दयनीय स्थिती से कभी भी उबर नहीं पाएगी। इस संदर्भ में इन्दौर के राकेश शर्मा ने रामविलास जी पर बहुत गम्भीरता से अध्ययन किया है। वे उनकी पुस्तकों से वे अंश जो वर्तमान समय की जिरह में प्रासंगिक हैं, हमारे लिए निकाल कर दे रहे हैं। हम एक सिलसिला शुरू कर रहे हैं, जिसकी पांचवीं कड़ी आपके सामने है, जिसमें रामविलास शर्मा जी की पुस्तक मानव सभ्यता का विकास से निकाले गए अंश हैं। पढ़ें और विचारों का घमासान करें। - प्रदीप मिश्र)
भारत में अंग्रेजों की लूट के फलस्वरूप यहाँ के औद्योगिक केन्द्र तबाह हो गये। ढाका और मुर्शिदाबाद के लिए क्लाइव ने कहा था कि ये नगर उतने ही समृद्ध है जितना कि लंदन (और जैसा शहर इंगलैंड में दूसरा न था)। लेकिन १९ वीं सदी के पूर्वार्द्ध में ढाका की आबादी डेढ़ लाख से घट कर तीस-चालीस हजार ही रह गई। सर चाल्स्र ट्रेवेलियन के अनुसार ढाका जो भारत का मैंचेस्टर था वीरान होकर जंगल बनता जा रहा था और मलेरिया का शिकार होने जा रहा था। मोंटगोमरी मार्टिन ने अंग्रेजों द्वारा सूरत, ढाका और मुर्शिदाबाद जैसे औद्योगिक केन्द्रों के नाश को बहुत ही दुखद घटना बतलाया था। १८१७ में उसका निर्यात बन्द हो गया था। बाहर से सस्ता लोहा मँगाने की अंग्रेजी नीति के कारण भारत का अपना लोहे का कारोबार चौपट हो गया। अर्थशास्त्री बकनन ने लिखा है कि जैसी आधुनिक युग के पहले यूरोप में थीं। (आज का भारत अध्याय ५)। यहीं दशा जहाजों के कारबार की हुई। अंग्रेजी राज में भारतीय उद्योग-धंधों की तबाही पर अपनी पुस्तक में वामनदास बसु ने लिखा है कि पूरब का काफी व्यापार पहले भारतीय जहाजों द्वारा होता था। चीन, ईरान, लालसागर तक भारत के जहाज माल पहुँचाते थे। १७९५ में ईस्ट इण्डिया कम्पनी को यह आज्ञा मिली थी कि वह भारत में बने हुए जहाजों द्वारा लंदन माल ला सकती है। सर टामस मनरो ने भारतीय उद्योग-धंधों की दशा देखकर कहा था, ``औद्योगिक रूप में हम लोग उनसे (भारतवासियों से) बहुत पिछड़े हुए हैं।`` रजनी पाम दत्त ने लिखा है कि १८ वीं सदी के मध्य तक इंगलैंड कृषिप्रधान देश था। उन्होंने बैंस का हवाला दिया है जिसने लिखा है कि १७६० तक सूती कपड़र बनाने के लिए इंगलैंड में जो मशीनें इस्तेमाल की जाती थी, वे प्राय: वैसी ही साधारण थी जैसी भारत की। एक तो उन्होंने अपने औद्योगिक विकास के लिए आवश्यक पूँजी बटोरी, दूसरे अपने माल के लिए भारत को खेतिहर देश बनाकर उन्होंने एक बाजार कायम किया। इंगलैंड मेमं भारत की लूट के फलस्वरूप बैंकिंग का कारोबार चमका। प्लासी के युद्ध के बाद इंगलैंड की हालत बदल गई। वहाँ जिन यंत्रों का आविष्कार किया गया था, उन्हें काम में लाने की सुविधा पैदा हो गई। ``इस तरह भारत की लूट पूँजी के एकत्रीकरण का वह गुप्त स्त्रोत थी जिसकी अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका के कारण इंगलैंड में औद्योगिक क्रांति संभव हुई।`` (पृष्ठ १२०-१२१)
हेगेल एक भाववादी विचारक था, लेकिन इसी कारण मार्क्स और ऐंगेल्स ने उसकी विचारधारा से किनाराकशी नहीं कर ली। उन्होंने उसके चिन्तन के क्रांतिकारी तत्व को पहचाना और उसे विकसित किया। यह पद्धति बहुत महत्वपूर्ण है जिससे हम पुराने विचारकों का सही मूल्यांकन करना सीखते हैं। मार्क्स ने लिखा है कि उन्होंने ``पूँजी`` के प्रकाशन से तीस साल पहले ही हेगेल के द्वन्द्ववाद के रहस्यमय पक्ष की आलोचना की थी। हेगेल से अपनी पद्धति का भेद बतलाते हुए उन्होंने लिखा है, ``मेरी द्वन्द्वात्मक पद्धति हेगेल पद्धति से भिन्न ही नहीं है वरन् ठीक उसकी उल्टी है।`` हेगेल के लिए मनुष्य की चिंतनक्रिया वास्तविक संसार की मूल प्रेरक शक्ति है और यथार्थ जगत् ``विचार`` का बाह्म रूप है। इसके विपरित मार्क्स के लिए मनुष्य का विचार-जगत् उसके मन में भौतिक जगत् का ही प्रतिबिम्ब है और वह विचारों का रूप धारण करता है। ``हेगेल में द्वन्द्ववाद रहस्यमय बन जाता है। लेकिन इससे इस बात में रूकावट नहीं पड़ी की हेगेल ने सबसे पहले व्यापक और सचेत ढंग से उसकी क्रिया का आम रूप पेश किया था। हेगेल का द्वन्द्ववाद सिर के बल खड़ा है। रहस्यमय रूप के भीतर उसके तर्क-संगत तत्व को जाना है तो उसे फिर से सीधे खड़ा करना होगा।``(पृष्ठ १४३)
मनुष्य ने युगों गों तक अपार यातनाएँ सहकर आज की सभ्यता को जन्म दिया है। यातना अधिकांश जनता के भाग्य में पड़ी, उस यातना से सुख उठाना थोड़े-से सम्पत्तिशाली लोगों के हाथ में रहा। यह युग मानव-समाज के विकास में एक विराट परिवर्तन का युग है। शोषण और ध्वंस की शक्तियाँ अपना विनाश सामने देख रही हैं। वे संसार की बहुसंख्यक जनता का नाश करके उस घड़ी को टालना चाहती हैं। शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व और पंचशील के सिद्धांत उन्हें प्रिय नहीं लगते, व्यवहार में प्रतिदिन वे इन सिद्धांतों को तोड़ती हैं। साथ ही स्थायी शांति और शोषणहीन व्यवस्था कायम करने वाली शक्तियाँ अदम्य वेग से आगे बढ़ रही हैं। विजय इन्हीं प्रगतिशील शक्तियों की होगी। वह देश जो दो सौ वर्ष पहले संसार के किसी भी देश से पिछड़ा हुआ न था, शीघ्र ही अपना ऐतिहासिक स्थान प्राप्त करेगा और मानव-सभ्यता के विकास में अपने इतिहास के अनुरूप ही योग देगा। यह विश्वास सामाजिक विकास के वैज्ञानिक अध्ययन से पुष्ट होता है।(पृष्ठ ११)
एक अर्थ में मनुष्य श्रम द्वारा ही पशु से मनुष्य बना है। पशु-अवस्था से निकले हुए मनुष्य को लाखों वर्ष हो चुके और उस अवस्था का ठीक काल-निर्णय करना सम्भव नहीं है। लेकिन पशु-जीवन से निकलते-निकलते उसे लाखों वर्ष लगे होंगे, इसमें संदेह नहीं। उसकी सभ्यता का इतिहास उसके पशुजीवन के इतिहास के समय को देखते हुए बहुत छोटा है। (पृष्ठ १५)
मानव चेतना बाह्य जगत की वस्तुगत सत्ता को ठीक-ठीक नहीं समझती, इसलिए मनुष्य कल्पना करता है कि वह जादू-टोने से, जंतर-मंतर सेऱ्या आगे चलकर योग-बल से।-उसे इच्छानुसार बदल लेगा। (पृष्ठ २२)
मातृसत्ताक गोत्रों में किसी व्यक्ति की अपनी वस्तुएँ उसके न रहने पर उसके मामा, भांजे और भाई पाते हैं। उसकी अपनी संतान उन्हें नहीं पाती। नारी की वारिस उसकी अपनी संतान, उसकी बहने और उसकी बहनों की सन्तान होती है। इस तरह गोत्र की उत्पत्ति गोत्र में ही रहती है। मातृसत्ताक विरासत का यह ढंग बहुत दिनों तक प्राचीन मिस्त्र में चलता रहा जहाँ राज परिवार में बहन-भाई इसलिए शादी करते थे कि अपने गोत्र की सम्पत्ति बाहर न जाय।(पृष्ठ २३)
इस संस्कृति के विनाश का श्रेय यूरोप की ``सभ्यता`` को है। अमरीकी आदिवासियों के विनाश का इतिहास अच्छी तरह प्रकट करता है कि यूरोप के लुटेरे वहाँ किस तरह की सभ्यता फैलाने गये थे। इसमें सन्देह नहीं कि यूरोप निवासी वहाँ न पहुँचते तो पेरू और मेक्सिको के लोग सभ्यता की अगल मंजिलों की तरफ बढ़ते। फॉस्टर ने ठीक लिखा है कि इनमें शासक वर्ग और राज्यसत्ता के निर्माण के लक्षण मिलते हैं। अज्तेक और इंका लोगों ने दूसरे कबीलों को जीत कर अपना राज्य-विस्तार किया था और उन कबीलों से दास, सैनिक, नरमेध के लिए बलि प्राप्त करते थे। फॉस्टर ने लिखा है, ``जब स्पेन के लोग अमरीका पहुँचें, तब दिखता है कि इंका और अज्तेक लोग वैसे ही समाज का विकास करने में लगे हुए थे, जैसे प्राचीन ग्रीस और रोम के लोग।`` इससे सिद्ध होता है कि सामाजिक विकास के नियम अमरीकी आदिवासियों पर वैसे ही लागू होते हैं जैसे यूरोप के ``सभ्य आर्यों`` पर। (पृष्ठ ३२)
........शेष अगली बार
(हिन्दी साहित्य में रामविलास शर्मा जी को इसलिए हमेशा याद किया जाएगा क्योंकि वे पहले समीक्षक हैं, जिन्होंने हिन्दी समीक्षा को व्यापक अर्थों में सामाजिक मूल्यों से जोड़ा है। न केवल जोड़ा है बल्कि उस पगडण्डी का निर्माण भी किया है, जिसपर भविष्य की समीक्षा को चलना होगा। अन्यथा हिन्दी समीक्षा अपनी दयनीय स्थिती से कभी भी उबर नहीं पाएगी। इस संदर्भ में इन्दौर के राकेश शर्मा ने रामविलास जी पर बहुत गम्भीरता से अध्ययन किया है। वे उनकी पुस्तकों से वे अंश जो वर्तमान समय की जिरह में प्रासंगिक हैं, हमारे लिए निकाल कर दे रहे हैं। हम एक सिलसिला शुरू कर रहे हैं, जिसकी पांचवीं कड़ी आपके सामने है, जिसमें रामविलास शर्मा जी की पुस्तक मानव सभ्यता का विकास से निकाले गए अंश हैं। पढ़ें और विचारों का घमासान करें। - प्रदीप मिश्र)
Thursday, 21 August 2008
मानव सभ्यता का विकास -4
यह वर्ण-व्यवस्था मानव समाज के भावी विकास के लिए आवश्यक थी। इससे एक वर्ग ऐसा बना जो अवकाश-भोगी था और अपना समय गणित, ज्योतिष, साहित्य, व्याकरण आदि के विकास के लिए दे सकता था। वर्ण-व्यवस्था के कारण धर्म शास्त्र, साहित्य, दर्शन और विज्ञान का विभाजन हुआ। ऋग्वेद में यह विभाजन नहीं है, बीजरूप में भले विद्यमान हो। भरत का नाट्यशास्त्र, कालिदास के नाटक, कपिलकणाद के दर्शन, पाणिनि का व्याकरण, आर्यभट्ट का गणित इस वर्गभेद और संपत्तिगत विभाजन से ही संभव हुए। आज वर्ण-व्यवस्था को अन्यायपूर्ण ठहराना सही है लेकिन अथर्ववेद और शतपथ ब्राह्यण के समय उसे अन्यायपूर्ण ठहराना निरर्थक है, क्योंकि वह व्यवस्था ऐतिहासिक रूप से अनिवार्य थी। ऐंगेल्स ने प्राचीन युग में दास-प्रथा की आलोचना करने वालों से ``ऐं टीडूयरिंग`` में कहा है, यदि यूनान में दास-प्रथा न होती तो यूरोप में सोशलिज्म भी न आता। इसी तरह भारत और विश्व के भावी विकास के लिए वर्ण-व्यवस्था आवश्यक थी। आज हम यह न मानते हैं कि ब्राह्यण और क्षत्रिय वर्गहितों से परे ईश्वर के अंश हैं, न हम यहीं मानते हैं कि भारतीय संस्कृति और मानव-सभ्यता के विकास में उनकी महत्वपूर्ण देन न थी। लेकिन जैसा कि एंगेल्स ने लिखा है, सभ्यता की प्रगति के साथ दुर्गति का भी एक अंश जुड़ा रहता है, उसी के अनुकूल यहाँ भी यह प्रगति समाज के लिए बाध्य करके ही हुई। स्त्रियों की शिक्षा और सार्वजनिक कार्यों से दूर रखने के लिए कड़ी व्यवस्था की गयी और शूद्र को यथाकामवध्य: कहा गया। (पृष्ठ ५७-५८)
डॉ. काशीप्रसाद जायसवाल ने पहले महायुद्ध के बाद अपना महत्वपूर्ण ग्रंथ ``हिन्दू राज्यतंत्र`` लिखा था। अंग्रेज शासक और उनके समर्थक इतिहासकार भारतवासियों को यह कहकर नीचा दिखाते थे कि भारत और एशिया के लोग सदा से निरंकुश राजतन्त्र के आदी रहे हैं। जनतंत्र का उद्भव यूनान में हुआ और इंग्लैण्ड में उसका विकास हुआ। भारतवासियों को जनतंत्र की शिक्षा देने का श्रेय अंग्रेजों को है। डॉ. जायसवाल ने भारत के प्राचीन गणराज्यों का अध्ययन करके यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया कि जनतंत्र का उद्भव यहाँ बहुत पहले हो चुका था, इसलिए अंग्रेजों का यह आरोप कि यहाँ के लोग कभी जनतंत्र से परिचित नहीं रहे झूठा है। हम जनतंत्र दिखाने का दावा दंभ मात्र है। डॉ. जायवाल ने जो सामग्री यहाँ एकत्र की, उससे एक बीते युग की जानकारी बढ़ी। उन्होंने न केवल जनतंत्र वरन् भारतीय राज्यतंत्र के अन्य रूपों के बारे में भी यहाँ महत्वपूर्ण तथ्य दिये। उनका यह दावा कि प्राचीन गण राज्यों में जनतांत्रिक व्यवस्था थी, बिल्कुल सहीं है। सत्ता जनता से भिन्न किसी शासक वर्ग के हाथ में न थी। सैन्य शक्ति जनता से भिन्न कोई अलग सशस्त्र दल न थी जो शासक वर्ग की आज्ञापालन के लिए हो। इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि यूरोप के प्राचीन समाजों में जनतांत्रिक व्यवस्था का विकास हुआ था तो यह विकास भारत में भी हो चुका था। इसलिए अंग्रेजों का दावा झूठा था, विशेषकर जब उनका पूंजीवादी जनतंत्र मजदूरों के शोषण और भारत जैसे उपनिवेशों की लूट के लिए था। (पृष्ठ ६०)
छठीं शताब्दी ई. पू. में बौद्ध ग्रंथों के अनुसार उत्तर भारत में सोलह महा-जनपद थे। डॉ. बी.सी. लॉ के अनुसार ये स्वायत्त शासन वाले जन थे। अंग राज्य आज के भागलपुर के पास गंगा नदी के किनारे था और चम्पा नगर उसकी राजधानी था। अंग और काशी के राज्यों में स्पर्धा चलती थी। कोसल राज्य की सीमाएँ आज के अवध से मिलती-जुलती थीं। कोसल ने काशी को जीतकर उसे अपने राज्य में मिला लिया था। बाद को कपिलवस्तु के शाक्यों पर भी कोसल का आधिपत्य हो गया था। कोसल के राजा प्रसेनजित और मगध के राजा अजातशत्रु में लम्बा संघर्ष चला। यह दिलचस्प बात है कि कोसल का राजा प्रसेनजित गौतम बुद्ध का प्रशंसक था। वज्जि (वृजि) संघ में विदेह, लिच्छवि, वज्जि आदि अनेक गण शामिल थे। कोसल से लिच्छवियों की मैत्री थी। बौद्ध काल में विभिन्न गण अनेक संघ बनाने लगे थे। आगे चलकर उनके परस्पर मिलने और मिलकर एक जाति (नैशनैलिटी) का रूप लेने में यह कार्य सहायक हुआ। मल्लों के मुख्य नगर पावा और कुशीनारा थै। चेदिजन आज के बुन्देलखण्ड में रहता था। वत्सजन का मुख्य नगर जमुना के किनारे कोशाम्बी था। गुरूजन का मुख्य नगर दिल्ली के पास इन्द्रप्रस्थ था और पञ्चाल बदायूँ और फर्रूखाबाद के आसपास के प्रदेश में रहते थे। मत्स्य प्रदेश में आज के अलवर, भरतपुर और जयपुर शामिल थे। शूरसेन जन की राजधानी मधुरा या मथुरा थी। अवन्ति जन का प्रदेश वर्तमान मालवा था और उज्जयिनी उनकी प्रमुख नगरी थी। इन प्राचीन जनों के प्रदेश की सीमाएँ महत्वपूर्ण हैं। डॉ. लॉ के आधार पर दिये हुए उपर्युक्त विवरण से मालूम होता है कि बौद्ध ग्रंथों में जिन राज्यों का उल्लेख हैं, वे अधिकतर वर्तमान हिंदी-भाषी प्रदेश के अन्तर्गत है। वैदिक समाज की चर्चा करते हुए हम देख चुके हैं कि मुख्य वैदिक जन इसी प्रदेश के थे। बौद्ध ग्रंथों में वर्णित जनों, गणों या राज्यों के प्रदेश पर ध्यान देने से इस तथ्य की पुष्टि होती है कि इनमें अधिकांश और विशेषकर शक्तिशाली मगध और कोसल के राज्य हिंदी-भाषी प्रदेश के अंतर्गत थे। इस तरह वैदिक और बौद्ध साहित्य द्वारा जितना क्रमबद्ध प्राचीन इतिहास हमें हिन्दी-भाषी जाति का मिलता है, उतना भारत की अन्य जातियों का नहीं। इन प्राचीन जनों और राज्यों में परस्पर संपर्क था, वे एक-दूसरे से मिलती-जुलती भाषाएँ बोलते थे, विभिन्न गणों ने मिलकर संघ बनाये थे, मगध सम्राटों के राज्यों में ये प्राय: सभी शामिल थे, ये तथ्य हिन्दी-भाषी जाति के निर्माण में सहायक हुए। लेकिन हिन्दी-भाषी जाति का गठन बाद का है। इससे पहले वे छोटी-छोटी जातियाँ बनीं जो आज के विशाल हिन्दी-भाषी प्रदेश के विभिन्न इलाकों में बहुत कुछ सुरक्षित हैं। इन्हें हम लोग जनपद कहते हैं जैसे ब्रज, अवध, बुंदेलखंड के जनपद। ये जनपद उन्हीं क्षेत्रों में बने जहाँ प्राचीन शूरसेन, कोसल, चेदि आदि जन रहते थे। प्राचीन जन रक्तसंबंध पर आधिारित थे लेकिन बाद के जनपदों में जनता के संगठन का आधार वर्ण-धर्म था। वर्णों के संगठन में प्राचीन रक्तसंबंधों, गोत्रों आदि की रक्षा की गई, लेकिन ये संबंध अब मुख्य न थे। मुख्य संबंध श्रम के विभाजन के अनुसार आर्थिक थे। अब भूमि पर भूस्वामियों का शासन था और किसानों का काम उन्हें अपने श्रमफल से शासक और शोषक के रूप मे जीवित रखना था। (पृष्ठ ६६-६७)
मार्क्स या ऐंगेल्स की किसी स्थापना को आँख मूँद कर दोहराने के पहले इस सम्बन्ध में जो सामग्री सामने आये, उस पर ध्यान देना मार्क्सवादी पद्धति के ज्यादा अनुकूल होगा। (पृष्ठ ६२)
........शेष अगली बार
(हिन्दी साहित्य में रामविलास शर्मा जी को इसलिए हमेशा याद किया जाएगा क्योंकि वे पहले समीक्षक हैं, जिन्होंने हिन्दी समीक्षा को व्यापक अर्थों में सामाजिक मूल्यों से जोड़ा है। न केवल जोड़ा है बल्कि उस पगडण्डी का निर्माण भी किया है, जिसपर भविष्य की समीक्षा को चलना होगा। अन्यथा हिन्दी समीक्षा अपनी दयनीय स्थिती से कभी भी उबर नहीं पाएगी। इस संदर्भ में इन्दौर के राकेश शर्मा ने रामविलास जी पर बहुत गम्भीरता से अध्ययन किया है। वे उनकी पुस्तकों से वे अंश जो वर्तमान समय की जिरह में प्रासंगिक हैं, हमारे लिए निकाल कर दे रहे हैं। हम एक सिलसिला शुरू कर रहे हैं, जिसकी चौथी कड़ी आपके सामने है, जिसमें रामविलास शर्मा जी की पुस्तक मानव सभ्यता का विकास से निकाले गए अंश हैं। पढ़ें और विचारों का घमासान करें। - प्रदीप मिश्र)
डॉ. काशीप्रसाद जायसवाल ने पहले महायुद्ध के बाद अपना महत्वपूर्ण ग्रंथ ``हिन्दू राज्यतंत्र`` लिखा था। अंग्रेज शासक और उनके समर्थक इतिहासकार भारतवासियों को यह कहकर नीचा दिखाते थे कि भारत और एशिया के लोग सदा से निरंकुश राजतन्त्र के आदी रहे हैं। जनतंत्र का उद्भव यूनान में हुआ और इंग्लैण्ड में उसका विकास हुआ। भारतवासियों को जनतंत्र की शिक्षा देने का श्रेय अंग्रेजों को है। डॉ. जायसवाल ने भारत के प्राचीन गणराज्यों का अध्ययन करके यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया कि जनतंत्र का उद्भव यहाँ बहुत पहले हो चुका था, इसलिए अंग्रेजों का यह आरोप कि यहाँ के लोग कभी जनतंत्र से परिचित नहीं रहे झूठा है। हम जनतंत्र दिखाने का दावा दंभ मात्र है। डॉ. जायवाल ने जो सामग्री यहाँ एकत्र की, उससे एक बीते युग की जानकारी बढ़ी। उन्होंने न केवल जनतंत्र वरन् भारतीय राज्यतंत्र के अन्य रूपों के बारे में भी यहाँ महत्वपूर्ण तथ्य दिये। उनका यह दावा कि प्राचीन गण राज्यों में जनतांत्रिक व्यवस्था थी, बिल्कुल सहीं है। सत्ता जनता से भिन्न किसी शासक वर्ग के हाथ में न थी। सैन्य शक्ति जनता से भिन्न कोई अलग सशस्त्र दल न थी जो शासक वर्ग की आज्ञापालन के लिए हो। इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि यूरोप के प्राचीन समाजों में जनतांत्रिक व्यवस्था का विकास हुआ था तो यह विकास भारत में भी हो चुका था। इसलिए अंग्रेजों का दावा झूठा था, विशेषकर जब उनका पूंजीवादी जनतंत्र मजदूरों के शोषण और भारत जैसे उपनिवेशों की लूट के लिए था। (पृष्ठ ६०)
छठीं शताब्दी ई. पू. में बौद्ध ग्रंथों के अनुसार उत्तर भारत में सोलह महा-जनपद थे। डॉ. बी.सी. लॉ के अनुसार ये स्वायत्त शासन वाले जन थे। अंग राज्य आज के भागलपुर के पास गंगा नदी के किनारे था और चम्पा नगर उसकी राजधानी था। अंग और काशी के राज्यों में स्पर्धा चलती थी। कोसल राज्य की सीमाएँ आज के अवध से मिलती-जुलती थीं। कोसल ने काशी को जीतकर उसे अपने राज्य में मिला लिया था। बाद को कपिलवस्तु के शाक्यों पर भी कोसल का आधिपत्य हो गया था। कोसल के राजा प्रसेनजित और मगध के राजा अजातशत्रु में लम्बा संघर्ष चला। यह दिलचस्प बात है कि कोसल का राजा प्रसेनजित गौतम बुद्ध का प्रशंसक था। वज्जि (वृजि) संघ में विदेह, लिच्छवि, वज्जि आदि अनेक गण शामिल थे। कोसल से लिच्छवियों की मैत्री थी। बौद्ध काल में विभिन्न गण अनेक संघ बनाने लगे थे। आगे चलकर उनके परस्पर मिलने और मिलकर एक जाति (नैशनैलिटी) का रूप लेने में यह कार्य सहायक हुआ। मल्लों के मुख्य नगर पावा और कुशीनारा थै। चेदिजन आज के बुन्देलखण्ड में रहता था। वत्सजन का मुख्य नगर जमुना के किनारे कोशाम्बी था। गुरूजन का मुख्य नगर दिल्ली के पास इन्द्रप्रस्थ था और पञ्चाल बदायूँ और फर्रूखाबाद के आसपास के प्रदेश में रहते थे। मत्स्य प्रदेश में आज के अलवर, भरतपुर और जयपुर शामिल थे। शूरसेन जन की राजधानी मधुरा या मथुरा थी। अवन्ति जन का प्रदेश वर्तमान मालवा था और उज्जयिनी उनकी प्रमुख नगरी थी। इन प्राचीन जनों के प्रदेश की सीमाएँ महत्वपूर्ण हैं। डॉ. लॉ के आधार पर दिये हुए उपर्युक्त विवरण से मालूम होता है कि बौद्ध ग्रंथों में जिन राज्यों का उल्लेख हैं, वे अधिकतर वर्तमान हिंदी-भाषी प्रदेश के अन्तर्गत है। वैदिक समाज की चर्चा करते हुए हम देख चुके हैं कि मुख्य वैदिक जन इसी प्रदेश के थे। बौद्ध ग्रंथों में वर्णित जनों, गणों या राज्यों के प्रदेश पर ध्यान देने से इस तथ्य की पुष्टि होती है कि इनमें अधिकांश और विशेषकर शक्तिशाली मगध और कोसल के राज्य हिंदी-भाषी प्रदेश के अंतर्गत थे। इस तरह वैदिक और बौद्ध साहित्य द्वारा जितना क्रमबद्ध प्राचीन इतिहास हमें हिन्दी-भाषी जाति का मिलता है, उतना भारत की अन्य जातियों का नहीं। इन प्राचीन जनों और राज्यों में परस्पर संपर्क था, वे एक-दूसरे से मिलती-जुलती भाषाएँ बोलते थे, विभिन्न गणों ने मिलकर संघ बनाये थे, मगध सम्राटों के राज्यों में ये प्राय: सभी शामिल थे, ये तथ्य हिन्दी-भाषी जाति के निर्माण में सहायक हुए। लेकिन हिन्दी-भाषी जाति का गठन बाद का है। इससे पहले वे छोटी-छोटी जातियाँ बनीं जो आज के विशाल हिन्दी-भाषी प्रदेश के विभिन्न इलाकों में बहुत कुछ सुरक्षित हैं। इन्हें हम लोग जनपद कहते हैं जैसे ब्रज, अवध, बुंदेलखंड के जनपद। ये जनपद उन्हीं क्षेत्रों में बने जहाँ प्राचीन शूरसेन, कोसल, चेदि आदि जन रहते थे। प्राचीन जन रक्तसंबंध पर आधिारित थे लेकिन बाद के जनपदों में जनता के संगठन का आधार वर्ण-धर्म था। वर्णों के संगठन में प्राचीन रक्तसंबंधों, गोत्रों आदि की रक्षा की गई, लेकिन ये संबंध अब मुख्य न थे। मुख्य संबंध श्रम के विभाजन के अनुसार आर्थिक थे। अब भूमि पर भूस्वामियों का शासन था और किसानों का काम उन्हें अपने श्रमफल से शासक और शोषक के रूप मे जीवित रखना था। (पृष्ठ ६६-६७)
मार्क्स या ऐंगेल्स की किसी स्थापना को आँख मूँद कर दोहराने के पहले इस सम्बन्ध में जो सामग्री सामने आये, उस पर ध्यान देना मार्क्सवादी पद्धति के ज्यादा अनुकूल होगा। (पृष्ठ ६२)
........शेष अगली बार
(हिन्दी साहित्य में रामविलास शर्मा जी को इसलिए हमेशा याद किया जाएगा क्योंकि वे पहले समीक्षक हैं, जिन्होंने हिन्दी समीक्षा को व्यापक अर्थों में सामाजिक मूल्यों से जोड़ा है। न केवल जोड़ा है बल्कि उस पगडण्डी का निर्माण भी किया है, जिसपर भविष्य की समीक्षा को चलना होगा। अन्यथा हिन्दी समीक्षा अपनी दयनीय स्थिती से कभी भी उबर नहीं पाएगी। इस संदर्भ में इन्दौर के राकेश शर्मा ने रामविलास जी पर बहुत गम्भीरता से अध्ययन किया है। वे उनकी पुस्तकों से वे अंश जो वर्तमान समय की जिरह में प्रासंगिक हैं, हमारे लिए निकाल कर दे रहे हैं। हम एक सिलसिला शुरू कर रहे हैं, जिसकी चौथी कड़ी आपके सामने है, जिसमें रामविलास शर्मा जी की पुस्तक मानव सभ्यता का विकास से निकाले गए अंश हैं। पढ़ें और विचारों का घमासान करें। - प्रदीप मिश्र)
Monday, 4 August 2008
मानव सभ्यता का विकास -3
एथेन्स में दासों की संख्या स्वाधीन यूनानियों से बहुत ज्यादा थी। इनके श्रम के बल पर ही यूनान की सभ्यता का प्रकाश फैला था। एथेंस के कारखानों में ये दास ही काम करते थे। इसलिीए यह स्वाभाविक था कि व्यापारी और औद्योगिक वर्ग उन्हें नियंत्रण में रखने के लिए शक्ति का उपयोग करें। एथेंस में फी नागरिक के पीछे अठारह गुलाम थे लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि हर नागरिक के पास गुलाम थे और समाज से धनी-निर्धन का तीव्र वर्ग-भेद मिट गया था। ऐंगेल्स ने लिखा है, ``व्यापार और उद्योगधन्धों की प्रगति से थोड़े से लोगों में सम्पत्ति एकत्र और केंद्रित हुई। आम स्वाधीन नागरिक गरीब थे। उनके सामने दो ही रास्ते थे - या तो वे दस्तकारी में दास श्रमिकों से होड़ करें जिसे घृणित और त्याज्य समझा जाता था, इसके सिवा जिसमें सफलता की आशा भी बहुत कम थी - या पूरी तरह मुफलिस हो जाएँ। उस समय की परिस्थितियों में दूसरी बात ही हुई।`` इस मुफलिसी ने ही एथेन्स को तबाह किया। (पृष्ठ ४१-४२)
खेतों के काम करने वालो दासों को गरम लोहे से दाग दिया जाता था जिससे कि वे सदा पहचाने जा सके कि किस मालिक के हैं। रात को भेड़-बकरियों की तरह वे बाड़ों में बन्द कर दिये जाते थे और भूखे जानवरों की तरह सबरे खेतों में हाँक दिये जाते थे। युद्ध से गुलामों की कमी पूरी न होती थी तो गुलाम उड़ाने वाले डाकू उन्हें जुटाते थे। वर्षों तक ईजिप्टियन और पूर्वी भूमध्य सागर से ये डाकू लोगों को पकड़ लाते थे और उन्हें देलोस के बाजार में बेच देते थे। वहाँ से रोमन व्यापारी उन्हें इटली ले आते थे। (पृष्ठ ४३)
यह अत्याचार न सह सकने पर दासों ने कई बार विद्रोह किया। सिसिली में साठ हजार विद्रोही दासों ने अपने मालिकों को मार कर शहरों पर कब्जा कर लिया और अपना राज्य स्थापित कर लिया। रोमन फौज कई साल के संघर्ष के बाद ही उन्हें दबा पायी। इस विद्रोह के समय छोटे खेतों के मालिक, स्वाधीन किसान भी चुप नहीं बैठे। उन्होंने धनी भूस्वामियों के महलों में आग लगा दी। ``इसलिए दासों के विद्रोह से न केवल दासों की वरन् स्वाधीन लोगों में निर्धन किसान वर्ग की भी घृणा प्रकट हुई।`` (ब्रेस्टेड)। धनी और निर्धन का भेद इतना तीव्र हो गया था कि दोनों वर्ग एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हो गये थे। ``इटली दो बड़े सामाजिक वर्गों में बँट गया था।`` जो एक-दूसरे के खतरनाक ढंग से विरोधी था।`` (उप.)। एक और भूपतियों का वर्ग था जिनके पास दास और भूमि थी, दूसरी ओर दास और वे गरीब किसान थे जो भूपतियों की नीति से तबाह हो रहे थे। रोमन सामन्तों की युद्ध-नीति से साधारण जनता खुशहाल न हुई, वरन् और तबाह हुई। दूसरों को लूट कर वे जो सम्पदा लाते थे, उससे साधारण जनता को लाभ न था। युद्ध से लौटने पर रोमन सैनिकों को अपना खेत सुरक्षित न मिलता था। कर्ज के न चुका सकने पर अक्सर वह भूस्वामी के पास पहुँच जाता था। अगर खेत बचा भी रहा तो वह गुलामों द्वारा की जाने वाली बड़े पैमाने की खेती का मुकाबला न कर सकता था। बाहर से भी सस्ता अनाज मँगाया जाता था। आगे-पीछे खेत बेच कर किसान सर्वहारा बनकर रोम पहुँच जाता था। रोम का भव्य साम्राज्य उसके स्वाधीन किसानों ने ही कायम किया था। वहीं उससे तबाह हुए। एथेंस की तरह रोम के पतन का आंतरिक कारण ये मुफलिस बने। (पृष्ठ ४३-४४)
सबसे पहले प्रश्न यह है कि क्या वैदिक संस्कृति किसी विशेष प्रदेश की संस्कृति है। प्रदेश का सवाल भी तब उठता है, जब यह सिद्ध हो जाय कि इस संस्कृति के रचने वाले घुमन्तू जीवन न बिताते थे वरन् किसी प्रदेश में बस गये थे। श्री पुलास्कर ने भारत में आर्य बस्तियों की चर्चा करते हुए यह परिणाम निकाला है कि वैदिक ऋचाओं में जिस प्रदेश की चर्चा है, उसमें अफगानिस्तान, पंजाब, सिन्ध और राजस्थान के कुछ भाग, उत्तर-पश्छिमी सीमान्त प्रदेश, कश्मीर और सरयू नदी तक का पूर्वी प्रदेश आता है। (``वैदिक युग``)। पश्चिम के कुछ विद्वानों का मत रहा है कि ऋग्वेद का मुख्य क्षेत्र पंजाब है। दूसार और उसके बाद का मत है कि यह प्रदेश सरस्वती नदी के आसपास और अंबाला के दक्षिण का है।
कुछ लोगों का मत भी है कि अधिकांश मंत्र भारत के बाहर ही रचे गये थे। (पृष्ठ ४७)
........शेष अगली बार
(हिन्दी साहित्य में रामविलास शर्मा जी को इसलिए हमेशा याद किया जाएगा क्योंकि वे पहले समीक्षक हैं, जिन्होंने हिन्दी समीक्षा को व्यापक अर्थों में सामाजिक मूल्यों से जोड़ा है। न केवल जोड़ा है बल्कि उस पगडण्डी का निर्माण भी किया है, जिसपर भविष्य की समीक्षा को चलना होगा। अन्यथा हिन्दी समीक्षा अपनी दयनीय स्थिती से कभी भी उबर नहीं पाएगी। इस संदर्भ में इन्दौर के राकेश शर्मा ने रामविलास जी पर बहुत गम्भीरता से अध्ययन किया है। वे उनकी पुस्तकों से वे अंश जो वर्तमान समय की जिरह में प्रासंगिक हैं, हमारे लिए निकाल कर दे रहे हैं। हम एक सिलसिला शुरू कर रहे हैं, जिसकी दूसरी कड़ी आपके सामने है, जिसमें रामविलास शर्मा जी की पुस्तक मानव सभ्यता का विकास से निकाले गए अंश हैं। फोटो प्रदीप कांत के कैमरे से। पढ़ें और विचारों का घमासान करें। - प्रदीप मिश्र)
Sunday, 27 July 2008
तुम्हे प्यार करते हुए
तुम्हे प्यार करते हुए
तुम्हारे आकाश में
जिद्दी परिंदे की तरह उड़ रहा हूँ
जानता हूँ लौट आना है इस दुनिया में
जिसे मैं चाहता हूँ तुम्हे प्यार करते हुए
यहाँ करोड़ों चीजों के कसमसाने की आवाज
उनके टूटने बिखरने का सिलसिला
बनाता है जगह हमारे बीच
अलग नहीं है तुम्हे प्यार करना
और इस दुनिया में चोट खाकर संभलना
अलग नहीं है हमारे सपने, चाहतें और नाराजगियाँ
तुमसे रूठता हूँ
तब यही आपाधापी में
चेहरों को उलझते मुस्कुराते देख
भर उठता हूँ समुन्द्र की तरह
जैसे तुम्हारे प्यार में
ऐसा भी तो होता है कि
खिलाफ लगने लगता है सबकुछ
तब मिलती हो तुम
उस अंतिम दरख्त की तरह
जहाँ हजारों चिंचियाती चिड़ियाओं से
भर उठती है पृथ्वी
तुम्हे प्यार करते हुए
मैं चाहता हूँ यह पृथ्वी ।
- नीलोत्पल, उज्जैन
- मो. 09826732121
पड़ोस
खारिज हो रही है अब यह धारणा
कि पड़ोस अच्छा होना चाहिए
वक्त जरूरत काम होने पर
मिल जाती है मदद
और परेशानियाँ हो जाती हैं हल
जैसा पहले होता था
धनिया मिर्च और
आलू प्याज से लेकर
रूपये पैसों तक का
हो जाता था लेन-देन
कई बार तो छोटी-मोटी बात पर
झगड़ लेते थे पड़ोसी
सभ्यता और प्रबंधन के
इस महान युग में
अब किसी को किसी से
कुछ भी लेना देना नहीं
न धनिया मिर्च न आलू प्याज
न रूपया पैसा
अब किसी के भी घर
अनायास ही खत्म नहीं होती शक्कर
कि कटोरी लेकर
भागना पड़े पड़ोसी के यहाँ
अब हँसी,प्रेम,गुस्सा,जलन
और झगड़ा भी नहीं रहा पड़ोसियों के बीच
चारो और फैल गया है एक निर्वात
जिसमें छाई है शुष्क उदासीनता और कठोरता
पड़ोस अच्छा होने या न होने से
अब कोई फर्क नहीं पड़ता।
- राजेश सक्सेना, उज्जैन
- मो. न. +919425108734
पिता की मृत्यु पर बेटी का रूदन
आप पेड़ थे और छांव नहीं थी मेरे जीवन में
पत्ते की तरह गिरी आपकी देह से पीलापन लिए
देखो झांककर मेरी आत्मा का रंग हो गया है गहरा नीला
कभी पलटकर देखा नहीं आपने
नहीं किया याद
आप मुझसे लड़ते रहे समाज से लड़ने के बजाय
मैं धरती के किनारे पर खड़ी क्या कहती आपसे
धकेल दी गई मैं, ऐसी जगह गिरी
जहाँ मां की कोख जितनी जगह भी नहीं मिली
आप थे इस दुनिया में
तब भी मेरे लिए नहीं थी धरती
और माँ से धरती होने का हक छीन लिया गया है कब से
छटपटा रही थी हवा में
देह की खोह में सन्नाटा रौंद रहा था मुझे
और अपनी मिट्टी किसे कहूं, किसे देश
कोई नहीं आया था मुझे थामने
जीवन जितना जटिल
कितने छिलके निकालेंगे दुःखों के
उसके बाद सुख क्या भरोसा
कौन से छिलके की परत कब आंसुओं में डुबो दे
हमारी सिसकियों से अपने ही कानों के पर्दे फट जायें
हृदय का पारा कब नाभी में उतर आये
मोह दुश्मन है सबका
मौत आपकी नहीं मेरी हुई है
हुई है तमाम स्त्रियों की
यह आपकी बेटी विलाप कर रही है निर्जीव देह पर
चित्कार पहुंच रही है ब्रह्माण्ड में
जहां पहले से मौजूद हैं कई बेटियों का हाहाकार
और कोई सुन नहीं पा रहा है।
-बहादुर पटेल, देवास म.प्र.
-मो. 09827340666
(पिछले दिनों प्रलेस, इन्दोर इकाई ने तीन युवा कवियो का काव्य पाठ आयोजित किया था। उनकी एक-एक कविताएं आपके लिए भी – प्रदीप मिश्र)
Saturday, 26 July 2008
हिजाबों से दूर रहने वाला शायर – अहमदफ़राज़

तू खुदा है न मेंरा ईश्क फरिश्तों जैसा
दोनो इन्साँ हैं तो क्यों इतने हिजाबों में मिलें
इन्सान को इन्सान से इन्सान के सलीके से मिलाने की बात करता ये शेर दुनिया के सबसे मशहूर और मकबूल शायरों में से एक अहमद फ़राज़ का है।
१९४७ में भारत को आज़ादी तो मिल गई पर विभाजन की बुरी कीमत पर। अब क्या क्या बाँटा जा सकता था। भूगोल और उसमें बसी आबादी को धर्म और मज़हब के नाम पर अलग कर दिया गया किन्तु आसमान! वो तो आज भी सबका है। ज़रा सरहद पर जाकर देखो, यहाँ से वहाँ का और वहाँ से यहाँ का आसमान बराबर दिखता है। पंछी बिना पासपोर्ट और वीज़ा के सरहद पार करते है। धर्म के आधार पर ज़मीन को बाँट कर दो देश तो बट गऐ पर सौभाग्य से विभाजन के ठेकेदार भाषा, साहित्य और कला के विभाजित नहीं कर पाए। साहित्य किसी भी देश का हो, पैरवी शोषितों की ही करेगा, गुण इन्सानियत के ही गाऐगा, नग्में मुहब्बत के ही गुनगुनाएगा।
आज़ादी के नाम पर बटवारे के बाद भले ही फ़राज़ पाकिस्तान में रह गऐ किन्तु भारतीयों के दिल से नही निकले। बकौल अशोक वाजपेयी -- `उनकी कविता जितनी पाकिस्तानी है उतनी ही भारतीय' (फ़राज़ की शायरी - खानाबदोश में अशोक वाजपेयी की भूमिका से)। सही भी है क्यों कि ऊर्दू तो हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दोनो की साँझी विरासत है। फ़राज़ की शायरी इन्सानी जेहन व रिश्तों की बारिक जटिलता को बडे सलीके से बयान करती है। और जब तक दुनिया कायम है ये मसले ख़त्म नहीं हो सकते। इसलिये फ़राज़ की शायरी प्रासंगिक थी, है और हमेशा रहेगी।
फ़राज़ निरे शायर ही नहीं, लोकतान्त्रिक मूल्यों के कट्टर समर्थक रहे। इसीलिये उन्होने २००४ मे मिला `हिलाले-इम्तियाज़ अवॉर्ड' २००६ में पाकिस्तानी सरकार को वापस लौटा दिया।
अपने फ़न के उस्ताद शायर फ़राज़ इन दिनों गम्भीर रूप से बीमार हैं। उनका शिकागो में इलाज चल रहा है। आइये, हम सब उनके जल्द स्वस्थ होने की शुभकामना करते हुऐ उनकी ये दो गज़लें पढ़ें। ये गज़लें उनकी दस किताबों के एक मुकम्मल संग्रह में छपी अप्रकाशित गज़लों से ली गई हैं।
१
उम्र गुज़री है कहाँ यूँ ही गुज़ारा हुआ था
वरना जो माल गिरह में था वो हारा हुआ था
ये भी तस्लीम है कि हम दुश्मने जाँ थे अपने
ये भी सच है कि उधर का भी इशारा हुआ था
हमने उस हुस्न के दरिया का तमाशा देखा
वो जो प्यासा भी न था प्यास का मारा हुआ था
पहने फिरती है जिसे नाज़ से लैला-ऐ-बहार१
पैरहन२ वो मेरी जानाँ३ का उतारा हुआ था
हम कि दुश्मन का भी अहसास नहीं भूलते
तू अदावत४ में हमें और भी प्यारा हुआ था
हम जो खुश खुश नज़र आते हैं बहुत गम़ज़दा हैं
तू न आया था तो ये खोल उतारा हुआ था
बाज़ औकात तो महसूस ये होता है `फ़राज़'
जैसे जो वक्त गुज़रता है गुज़ारा हुआ था
१. बहार का मौसम या बहार की जान २. लिबास ३. महबूबा ४. शत्रुता
२
गुफतगू अच्छी लगी ज़ौके नज़र अच्छा लगा
मुद्दतों के बाद कोई हमसफ़र अच्छा लगा
दिल का दुख जाना तो दिल का मस्अला है पर हमें
उसका हँस देना हमारे हाल पर अच्छा लगा
इस तरह की बे-सरो-सामानियों के बावजूद
आज वो आया तो मुझको अपना घर अच्छा लगा
क्या बुरा था गऱ पड़ा रहता तेरी दहलीज़ पर
तू ही बतला क्या तुझे वो दर--बदर अच्छा लगा
कौन मक्तल में न पहुँचा कौन ज़ालिम था जिसे
तेरे कातिल से ज़ियादा अपना सर अच्छा लगा
हम भी क़ायल हैं वफ़ा-ऐ-उस्तवारी१ के मगर
कोई पूछे कौन किसको उम्र भर अच्छा लगा
`मीर' की मानिन्द गरचे ज़ीस्त करता था `फ़राज़'
हमको वो आशुफ़्ता-खू२ शायर मगर अच्छा लगा
१. स्थायी प्रेम २. पागल, बद-दिमाग
-प्रदीप कान्त, फोन. 0731-2320041
(इन दिनों हमारे अजीम शायर अहमदफ़राज़ बीमार चल रहे हैं। साथी प्रदीप कांत भी शायरी करते हैं। पेश है उनकी कलम से चन्द शब्द -प्रदीप मिश्र
पुनश्च- इस आलेख को अपलोड कर रहा था इसी बीच हिन्दी के वरिष्ट कवि चन्द्रकान्त देवताले का फोन आ गया। बात चीत में उनको जब पता चला कि अहमदफ़राज़ पर आलेख दे रहा हूँ, तो वे बहुत प्रसन्न हुए और अपनी स्मृति का एक कतरा थमा गए -
लगभग दो साल पहल जब मैं साहित्य अकादेमी के एक कार्यक्रम में कविता पढ़ने गया था तो वहाँ पर अहमदफ़राज़ भी बतौर कवि शामिल थे। उनके साथ कविता पाठ एक उत्तेजना भरा अनुभव था । जब वे कविता पाठ कर रहे थे तो ऐसा लग रहा था कि सचमुच एक बड़ा कवि भाषा,देश और सरहद से परे होता है। मैं उनके यथाशीघ्र स्वस्थ होने की कामना करता हूँ।- चन्द्रकांत देवताले)
Wednesday, 23 July 2008
हमारे समय से उम्मीद
अभी कल ही संसद की भयानक और शर्मसार करनेवाली कार्यवाही से रूबरू हुआ और आज समय के उम्मीद पर कुछ कहना अत्यन्त कठिन है। क्योंकि हम जिस वर्तमान में जी रहे हैं, उसका भविष्य मनुष्यों का भविष्य नहीं है। कुछ अजीब किस्म की सभ्यता की तरफ बढ़ रहे हैं, जहाँ सामने आता हुआ, मनुष्य रूपयों की शक्ल में दिखाई देगा। जितने का नोट उतनी इज्जत। तकनीकी विकास इतने चरम पर पङुँच जाएगा कि बस्तर के बीहड़ में बैठा हुआ आदिवासी किसान भी इन्टरनेट से खेती की आधुनिकतम तकनीकें डाउनलोड करेगा और अपनी पैदावार दोगुना-तीनगुना कर लेगा। फिर अमेरिका या फ्रांस के किसी मण्डी में बेचकर डालर कमाएगा। मजदूर एयर कण्डीशन्ड वातावरण में काम करते हुए भूल जाएगा कि पसीना क्या होता है। चारो तरफ रूपये ही रुपये बिखरे पड़े होंगे। भविष्य में किसी को लाटरी खुलने की खुशी में दिल का दौरा नहीं पड़ेगा। सामाजिक और नैतिक मूल्यों को मापने का पैमाना भी अत्यन्त आधुनिक तकनिक से निर्मित होगा उसके लिए भी परमाणु करार जैसा कुछ विकास से लबालब करार किसी विकसित देश से हो जाएगा। यहाँ के कस्बे, गांव टोले भी न्युयार्क और लंदन जैसे दिखाई दैंगे। इसलिए चिन्तित होने की कोई जरूरत नहीं है। हम अपनी आंख पर काली पट्टी बाँध कर किसी एयरकण्डीशन्ड कमरे में बैठा दिए गए हैं और हमें बताया जा रहा है कि यह पुरवाई बह रही है। हमें वहां की ठण्डक में सचमुच पुरवाई महसूस हो रही है। अब इससे ज्यादा विकास क्या चहिए।
किसी महानगर में बैठे कुल जमा दस-बारह प्रतिशत अतिआधुनिक समाज के विकास को देखते हुए अगर यह कल्पना किया जा रहा है कि हमारा भविष्य बहुत अच्छा है और हम दौड़ में सबसे आगे हैं, तो यह आत्महत्या का जुगाड़ है। वास्तव में ताकत, अतिचारिता और पैसे के आधार पर निर्धारित हो रहे आज के सामाजिक मूल्य निश्चित रूप से हमें अमरीका और फ्रांस की जीवनशैली तक पहुँचा दैंगे। खरीदने की क्षमता हमारे पास आ जाएगी, लेकिन तब तक हमसे हमारा देश, हमारी भाषा और संस्कृति कितनी पीछे छूट चुकी होगी, इसकी कल्पना दिल दहला देती है। मेरा कहना है कि पूरे विश्व को आज बैठकर सोचना चहिए कि जिस विकास और आधुनिकता की बात हो रही है, जिस उन्नत तकनीक की बात हो रही है और जिस तरह की जीवनशैली का स्वप्न आंखों में बोया जा रहा है। क्या यह सबकुछ सही दिशा में है। क्या विज्ञान का विकास उसी दिशा में हो रहा है, जिस दिशा की कामना के साथ हमने इसे हाथों-हाथ लिया। अगर बहुत जल्दी मूल्यांकन की मानवीयप्रणाली नहीं विकसित हुई तो हमें अफसोस के साथ कहना पड़ेगा कि अपने आज को देखते हुई सिर्फ एक उम्मीद है, कि आत्महत्या को नैसर्गिक मौत की तरह स्वीकार कर लिया जाएगा।
आज के बहुमान्य मूल्यों के आधार पर देखें तो कोई उल्लेखनीय और सुखद उम्मीद नहीं है। लेकिन ऐसा नहीं है कि सबकुछ गड़बड़ ही है, हाशिए पर बैठी कुछ चीजें जो भले ही हाँफ रहीं हैं, लेकिन इस बुरे को अच्छे में बदलने की कुव्वत रखतीं हैं। जब तक अपने खेत में खटते हुए किसान दिखाई दे रहे हैं, माथे से पसीना पोंछते हुए मजदूर दिखाई दे रहे हैं, राजनीति में कुछ पढ़े-लिखे युवा दिखाई दे रहे हैं, समाज में बेचैन और चिन्तित बुद्धिजीवी दिखाई दे रहे हैं और विरोध बचा हुआ है, तब तक बहुत अच्छे भविष्य की कल्पना की जा सकती है। इस संदर्भ में मेरी एक कविता शायद समीचीन हो –
उम्मीद
आज फिर टरका दिया सेठ ने
पिछले दो महीने से करा रहा है बेगार
फिर भी उसे उम्मीद है पगार की
हर तारीख़ पर
कुछ न कुछ ऐसा होता है कि
अगली तारीख़ पड़ जाती है
जज-वकील और प्रतिवादी
सबके सब मिले हुए हैं
फिर भी उसे उम्मीद है
एक दिन जीत जाएगा
अन्याय के ख़िलाफ़ मुकदमा
तीन साल से सूखा पड़ रहा है
फिर भी किसानों को उम्मीद है
बरसात होगी
लहलहाऐंगे खेत
आदमियों से ज़्यादा लाठियाँ हैं
विकास के मुद्दों से ज़्यादा घोटाले
जीवन से ज़्यादा मृत्यु के उदघोष
सेवा से ज़्यादा स्वार्थ
फिर भी वोट डाल रहा है वह
उसे उम्मीद है, आऐंगे अच्छे दिन भी
अख़बार के पन्नों पर नज़र पड़ते ही
बढ़ जाता है चेहरे का पीलापन
फिर भी हर सुबह
अख़बार के पन्नों को पलटते हुए
उम्मीद होती है उन ख़बरों की
जिनके इंतज़ार में कट गए जीवन के साठ बरस
उम्मीद की इस परंपरा को शुभकामनाऐं
उनको सबसे ज़्यादा
जो उम्मीद की इस बुझती हुई लौ को
अपने हथेलियों की आड़ में सहेजे हुए हैं।
प्रदीप मिश्र, दिव्यांश 72ए सुदर्शन नगर, अन्नपूर्णा रोड इन्दौर-452009 (म.प्र.)
मो. 9425314126
(हमारे मित्र श्री अवधेश जी को किसी काम के लिए हमारे समय की उम्मीद पर कुछ विचार चहिए था। लिखा उनके लिए था, लेकिन आप सब भी इस विषय पर कुछ मगजमारी करें। इसलिए यहाँ पर भी- प्रदीप मिश्र)
किसी महानगर में बैठे कुल जमा दस-बारह प्रतिशत अतिआधुनिक समाज के विकास को देखते हुए अगर यह कल्पना किया जा रहा है कि हमारा भविष्य बहुत अच्छा है और हम दौड़ में सबसे आगे हैं, तो यह आत्महत्या का जुगाड़ है। वास्तव में ताकत, अतिचारिता और पैसे के आधार पर निर्धारित हो रहे आज के सामाजिक मूल्य निश्चित रूप से हमें अमरीका और फ्रांस की जीवनशैली तक पहुँचा दैंगे। खरीदने की क्षमता हमारे पास आ जाएगी, लेकिन तब तक हमसे हमारा देश, हमारी भाषा और संस्कृति कितनी पीछे छूट चुकी होगी, इसकी कल्पना दिल दहला देती है। मेरा कहना है कि पूरे विश्व को आज बैठकर सोचना चहिए कि जिस विकास और आधुनिकता की बात हो रही है, जिस उन्नत तकनीक की बात हो रही है और जिस तरह की जीवनशैली का स्वप्न आंखों में बोया जा रहा है। क्या यह सबकुछ सही दिशा में है। क्या विज्ञान का विकास उसी दिशा में हो रहा है, जिस दिशा की कामना के साथ हमने इसे हाथों-हाथ लिया। अगर बहुत जल्दी मूल्यांकन की मानवीयप्रणाली नहीं विकसित हुई तो हमें अफसोस के साथ कहना पड़ेगा कि अपने आज को देखते हुई सिर्फ एक उम्मीद है, कि आत्महत्या को नैसर्गिक मौत की तरह स्वीकार कर लिया जाएगा।
आज के बहुमान्य मूल्यों के आधार पर देखें तो कोई उल्लेखनीय और सुखद उम्मीद नहीं है। लेकिन ऐसा नहीं है कि सबकुछ गड़बड़ ही है, हाशिए पर बैठी कुछ चीजें जो भले ही हाँफ रहीं हैं, लेकिन इस बुरे को अच्छे में बदलने की कुव्वत रखतीं हैं। जब तक अपने खेत में खटते हुए किसान दिखाई दे रहे हैं, माथे से पसीना पोंछते हुए मजदूर दिखाई दे रहे हैं, राजनीति में कुछ पढ़े-लिखे युवा दिखाई दे रहे हैं, समाज में बेचैन और चिन्तित बुद्धिजीवी दिखाई दे रहे हैं और विरोध बचा हुआ है, तब तक बहुत अच्छे भविष्य की कल्पना की जा सकती है। इस संदर्भ में मेरी एक कविता शायद समीचीन हो –
उम्मीद
आज फिर टरका दिया सेठ ने
पिछले दो महीने से करा रहा है बेगार
फिर भी उसे उम्मीद है पगार की
हर तारीख़ पर
कुछ न कुछ ऐसा होता है कि
अगली तारीख़ पड़ जाती है
जज-वकील और प्रतिवादी
सबके सब मिले हुए हैं
फिर भी उसे उम्मीद है
एक दिन जीत जाएगा
अन्याय के ख़िलाफ़ मुकदमा
तीन साल से सूखा पड़ रहा है
फिर भी किसानों को उम्मीद है
बरसात होगी
लहलहाऐंगे खेत
आदमियों से ज़्यादा लाठियाँ हैं
विकास के मुद्दों से ज़्यादा घोटाले
जीवन से ज़्यादा मृत्यु के उदघोष
सेवा से ज़्यादा स्वार्थ
फिर भी वोट डाल रहा है वह
उसे उम्मीद है, आऐंगे अच्छे दिन भी
अख़बार के पन्नों पर नज़र पड़ते ही
बढ़ जाता है चेहरे का पीलापन
फिर भी हर सुबह
अख़बार के पन्नों को पलटते हुए
उम्मीद होती है उन ख़बरों की
जिनके इंतज़ार में कट गए जीवन के साठ बरस
उम्मीद की इस परंपरा को शुभकामनाऐं
उनको सबसे ज़्यादा
जो उम्मीद की इस बुझती हुई लौ को
अपने हथेलियों की आड़ में सहेजे हुए हैं।
प्रदीप मिश्र, दिव्यांश 72ए सुदर्शन नगर, अन्नपूर्णा रोड इन्दौर-452009 (म.प्र.)
मो. 9425314126
(हमारे मित्र श्री अवधेश जी को किसी काम के लिए हमारे समय की उम्मीद पर कुछ विचार चहिए था। लिखा उनके लिए था, लेकिन आप सब भी इस विषय पर कुछ मगजमारी करें। इसलिए यहाँ पर भी- प्रदीप मिश्र)
Sunday, 20 July 2008
अधिकारी-नेता-कलर्क सबने
मेघराज
(एक)
गृहणियों ने घर के सामानों को
धूप दिखाकर जतना दिया है
छतों की मरम्मत पूरी हो चुकी है
नाले-नालियों की सफाई का
टेंडर पास हो गया है
अधिकारी-नेता-कलर्क सबने
अपना हिस्सा तय कर लिया है
और तुम हो कि
आने का नाम ही नहीं ले रहे हो
चक्कर क्या है मेघराज
कहीं सटोरियों का जादू
तुम पर भी तो नहीं चल गया
क्रिकेट से कम लोकप्रिय तुम भी नहीं हो
आओ मेघराज
तुम्हारे इंतजार में बुढ़ा रही है धरती
खेतों में फसलों की मौत का मातम है
किसान कर्ज और भूख की भय से
आत्महत्या कर रहें हैं
आओ मेघराज इससे पहले कि
अकाल के गिध्द बैठने लगें मुँडेर पर ।
(दो)
मेघराज तुम पहली बार आए थे
तब धरती जल रही थी विरह वेदना में
और तुम बरसे इतना झमाझम
कि उसकी कोख हरी हो गई
मेघराज तुम आए थे कालीदास के पास
तब वे बंजर जमीन पर कुदाल चला रहे थे
तुम्हारे बरसते ही उफन पड़ी उर्वरा
उन्होंने रचा इतना मनोरम प्रकृति
मेघराज तुम तब भी आए थे
जब जंगल में लगी थी आग
असफल हो गए थे मनुष्यों के सारे जुगाड़
जंगल के जीवन में मची हुई थी हाहाकार
और अपनी बूंदों से
पी गए थे तुम सारी आग
मेघराज हम उसी जंगल के जीव हैं
जब भी देखते हैं तुम्हारी तरफ
हमारा जीवन हराभरा हो जाता है
आओ मेघराज
कि बहुत कम नमी बची है
हमारी आँखों में
हमारा सारा पानी पी गया सूरज
आओ मेघराज
नहीं तो हम आ जाऐंगे तुम्हारे पास
उजड़ जाएगी तुम्हारी धरती की कोख।
-प्रदीप मिश्र मो.9425314126
( मित्रों इस समय बरसात के रिमझिम के लिए टकटकी लगाए महाराष्ट्र और म.प्र. के किसानो की आँख पथरा रही है। उनकी आवाज में मैं अपनी कविता को शामिल करने की गरज से यहाँ रखा रहा हूँ। हमारी मित्र मण्डली के प्रदीप कांत ने इस कविता की संवेदना को और गहन करने के लिए विशेषरूप से इस फोटो को उपलब्ध कराया है। प्रदीपकांत राजा रामन्ना प्रगत प्रौद्यौगिकी केन्द्र में युवा वैज्ञानिक हैं। इनकी गजलों का एक संग्रह तैयार है। इन दिनों फोटोग्राफी में हाथ अजमा रहे हैं। फोन. 0731-2320041) )
Friday, 11 July 2008
मानव सभ्यता का विकास -2
प्राचीन संस्कृतियों में भारत की सिन्धु घाटी की सभ्यता का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है। ``मोहेज्जोदड़ो और सिन्धु घाटी की सभ्यता`` (१९३१) में सर जॉन मार्शल ने लिखा है कि पुरातत्व की खोज से चौथी सहस्त्राब्दी ई. पू. के जीवन का ही पता चलता है ``लेकिन मोहेज्जोदड़ो में ही पहले के और कई नगर एक-दूसरे के नीचे दफनाये पड़े हैं और उन तक अभी फावड़े की पहुँच नहीं हुई।`` सिन्ध और बलूचिस्तान में और नगरों के मिलने की संभावना बतलाई गई है। मार्शल के अनुसार हड़प्पा और मोहेज्जोदड़ो में वैसी संस्कृति मिली हैं, वह काफी दिनों से विकसित होती रही होगी। वह ``भारत की धरती पर काफी रूढ़िगत हो चुकी थी और उसके पीछे कई हजार वर्ष का मानव- श्रम निहित होना चाहिए।`` इससे सिद्ध होता है कि सिन्धुघाटी की संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से है और यदि वह मिस्त्र की संस्कृति से पहले की नहीं है तो उसकी समकालीन अवश्य है। (पृष्ठ ३४-३५)
सिन्धुघाटी की संस्कृति का प्रभाव न केवल भारत पर वरन् अन्य देशों पर भी पड़ा। गॉर्डन चाइल्ड के शब्दों में यहाँ के विज्ञान का प्रभाव पश्चिम के विज्ञान पर पड़ा और इसलिए हमारे लिए वह ``ब्रौंज एज`` की संस्कृति नष्ट नहीं हुई वरन् हमारे न जानते हुए भी उसका काम आगे प्रगति का रहा है। (पृष्ठ ३७)
ऐंगेल्स के अनुसार यह बर्बर अवस्था की तीसरी और ऊँची मंजिल है जो सभ्यता के आरम्भ से घुलमिल जाती है। इस अवस्था की संस्कृति के निर्माण में एशिया की प्रमुख भूमिका है। अफ्रीका और अमरीका में यह संस्कृति विकसित हुई। यूरोप की देन अभी नगण्य है। (पृष्ठ ३७-३८)
इन प्राचीन समाजों के गर्भ में जो श्रम-विभाजन और वर्ग-विभाजन क्रमश: विकसित होता है, वह सामंती समाज की विशेषता है। हमें वर्ग-विभाजन का यह रूप नहीं मिलता कि समाज में एक ओर तो केवल दास हों और दूसरी और दासों के स्वामी हों। युद्ध आदि से दास प्राप्त होते है, उनसे उन्हीं लोगों की शक्ति बढ़ती है जो शेष समाज को यानी अपने सगोत्रियों को निर्धन बनाते जा रहे हैं और पूरे कबीले की अधिकांश भूमि अपने अधिकार में करते जाते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि सम्पत्तिशाली वर्ग के हित में जब राज्यसत्ता का जन्म होता है, त बवह केवल दासों का दमन करने के लिए नहीं होती वरन् समाज के ``स्वतंत्र`` किन्तु निर्धन सदस्यों के विरूद्ध भी उसका उपयोग होता है। (पृष्ठ ३८)
........शेष अगली बार
(हिन्दी साहित्य में रामविलास शर्मा जी को इसलिए हमेशा याद किया जाएगा क्योंकि वे पहले समीक्षक हैं, जिन्होंने हिन्दी समीक्षा को व्यापक अर्थों में सामाजिक मूल्यों से जोड़ा है। न केवल जोड़ा है बल्कि उस पगडण्डी का निर्माण भी किया है, जिसपर भविष्य की समीक्षा को चलना होगा। अन्यथा हिन्दी समीक्षा अपनी दयनीय स्थिती से कभी भी उबर नहीं पाएगी। इस संदर्भ में इन्दौर के राकेश शर्मा ने रामविलास जी पर बहुत गम्भीरता से अध्ययन किया है। वे उनकी पुस्तकों से वे अंश जो वर्तमान समय की जिरह में प्रासंगिक हैं, हमारे लिए निकाल कर दे रहे हैं। हम एक सिलसिला शुरू कर रहे हैं, जिसकी दूसरी कड़ी आपके सामने है, जिसमें रामविलास शर्मा जी की पुस्तक मानव सभ्यता का विकास से निकाले गए अंश हैं। पढ़ें और विचारों का घमासान करें। - प्रदीप मिश्र)
सिन्धुघाटी की संस्कृति का प्रभाव न केवल भारत पर वरन् अन्य देशों पर भी पड़ा। गॉर्डन चाइल्ड के शब्दों में यहाँ के विज्ञान का प्रभाव पश्चिम के विज्ञान पर पड़ा और इसलिए हमारे लिए वह ``ब्रौंज एज`` की संस्कृति नष्ट नहीं हुई वरन् हमारे न जानते हुए भी उसका काम आगे प्रगति का रहा है। (पृष्ठ ३७)
ऐंगेल्स के अनुसार यह बर्बर अवस्था की तीसरी और ऊँची मंजिल है जो सभ्यता के आरम्भ से घुलमिल जाती है। इस अवस्था की संस्कृति के निर्माण में एशिया की प्रमुख भूमिका है। अफ्रीका और अमरीका में यह संस्कृति विकसित हुई। यूरोप की देन अभी नगण्य है। (पृष्ठ ३७-३८)
इन प्राचीन समाजों के गर्भ में जो श्रम-विभाजन और वर्ग-विभाजन क्रमश: विकसित होता है, वह सामंती समाज की विशेषता है। हमें वर्ग-विभाजन का यह रूप नहीं मिलता कि समाज में एक ओर तो केवल दास हों और दूसरी और दासों के स्वामी हों। युद्ध आदि से दास प्राप्त होते है, उनसे उन्हीं लोगों की शक्ति बढ़ती है जो शेष समाज को यानी अपने सगोत्रियों को निर्धन बनाते जा रहे हैं और पूरे कबीले की अधिकांश भूमि अपने अधिकार में करते जाते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि सम्पत्तिशाली वर्ग के हित में जब राज्यसत्ता का जन्म होता है, त बवह केवल दासों का दमन करने के लिए नहीं होती वरन् समाज के ``स्वतंत्र`` किन्तु निर्धन सदस्यों के विरूद्ध भी उसका उपयोग होता है। (पृष्ठ ३८)
........शेष अगली बार
(हिन्दी साहित्य में रामविलास शर्मा जी को इसलिए हमेशा याद किया जाएगा क्योंकि वे पहले समीक्षक हैं, जिन्होंने हिन्दी समीक्षा को व्यापक अर्थों में सामाजिक मूल्यों से जोड़ा है। न केवल जोड़ा है बल्कि उस पगडण्डी का निर्माण भी किया है, जिसपर भविष्य की समीक्षा को चलना होगा। अन्यथा हिन्दी समीक्षा अपनी दयनीय स्थिती से कभी भी उबर नहीं पाएगी। इस संदर्भ में इन्दौर के राकेश शर्मा ने रामविलास जी पर बहुत गम्भीरता से अध्ययन किया है। वे उनकी पुस्तकों से वे अंश जो वर्तमान समय की जिरह में प्रासंगिक हैं, हमारे लिए निकाल कर दे रहे हैं। हम एक सिलसिला शुरू कर रहे हैं, जिसकी दूसरी कड़ी आपके सामने है, जिसमें रामविलास शर्मा जी की पुस्तक मानव सभ्यता का विकास से निकाले गए अंश हैं। पढ़ें और विचारों का घमासान करें। - प्रदीप मिश्र)
Tuesday, 8 July 2008
मानव सभ्यता का विकास
मनुष्य ने युगों-युगों तक अपार यातनाएँ सहकर आज की सभ्यता को जन्म दिया है। यातना अधिकांश जनता के भाग्य में पड़ी, उस यातना से सुख उठाना थोड़े-से सम्पत्तिशाली लोगों के हाथ में रहा। यह युग मानव-समाज के विकास में एक विराट परिवर्तन का युग है। शोषण और ध्वंस की शक्तियाँ अपना विनाश सामने देख रही हैं। वे संसार की बहुसंख्यक जनता का नाश करके उस घड़ी को टालना चाहती हैं। शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व और पंचशील के सिद्धांत उन्हें प्रिय नहीं लगते, व्यवहार में प्रतिदिन वे इन सिद्धांतों को तोड़ती हैं। साथ ही स्थायी शांति और शोषणहीन व्यवस्था कायम करने वाली शक्तियाँ अदम्य वेग से आगे बढ़ रही हैं। विजय इन्हीं प्रगतिशील शक्तियों की होगी। वह देश जो दो सौ वर्ष पहले संसार के किसी भी देश से पिछड़ा हुआ न था, शीघ्र ही अपना ऐतिहासिक स्थान प्राप्त करेगा और मानव-सभ्यता के विकास में अपने इतिहास के अनुरूप ही योग देगा। यह विश्वास सामाजिक विकास के वैज्ञानिक अध्ययन से पुष्ट होता है। (पृष्ठ ११)
एक अर्थ में मनुष्य श्रम द्वारा ही पशु से मनुष्य बना है। पशु-अवस्था से निकले हुए मनुष्य को लाखों वर्ष हो चुके और उस अवस्था का ठीक काल-निर्णय करना सम्भव नहीं है। लेकिन पशु-जीवन से निकलते-निकलते उसे लाखों वर्ष लगे होंगे, इसमें संदेह नहीं। उसकी सभ्यता का इतिहास उसके पशुजीवन के इतिहास के समय को देखते हुए बहुत छोटा है। (पृष्ठ १५)
मानव चेतना बाह्य जगत की वस्तुगत सत्ता को ठीक-ठीक नहीं समझती, इसलिए मनुष्य कल्पना करता है कि वह जादू-टोने से, जंतर-मंतर से या आगे चलकर योग-बल से, उसे इच्छानुसार बदल लेगा। (पृष्ठ २२)
मातृसत्ताक गोत्रों में किसी व्यक्ति की अपनी वस्तुएँ उसके न रहने पर उसके मामा, भांजे और भाई पाते हैं। उसकी अपनी संतान उन्हें नहीं पाती। नारी की वारिस उसकी अपनी संतान, उसकी बहने और उसकी बहनों की सन्तान होती है। इस तरह गोत्र की उत्पत्ति गोत्र में ही रहती है। मातृसत्ताक विरासत का यह ढंग बहुत दिनों तक प्राचीन मिस्त्र में चलता रहा जहाँ राज परिवार में बहन-भाई इसलिए शादी करते थे कि अपने गोत्र की सम्पत्ति बाहर न जाय। (पृष्ठ २३)
इस संस्कृति के विनाश का श्रेय यूरोप की ``सभ्यता`` को है। अमरीकी आदिवासियों के विनाश का इतिहास अच्छी तरह प्रकट करता है कि यूरोप के लुटेरे वहाँ किस तरह की सभ्यता फैलाने गये थे। इसमें सन्देह नहीं कि यूरोप निवासी वहाँ न पहुँचते तो पेरू और मेक्सिको के लोग सभ्यता की अगल मंजिलों की तरफ बढ़ते। फॉस्टर ने ठीक लिखा है कि इनमें शासक वर्ग और राज्यसत्ता के निर्माण के लक्षण मिलते हैं। अज्तेक और इंका लोगों ने दूसरे कबीलों को जीत कर अपना राज्य-विस्तार किया था और उन कबीलों से दास, सैनिक, नरमेध के लिए बलि प्राप्त करते थे। फॉस्टर ने लिखा है, ``जब स्पेन के लोग अमरीका पहुँचें, तब दिखता है कि इंका और अज्तेक लोग वैसे ही समाज का विकास करने में लगे हुए थे, जैसे प्राचीन ग्रीस और रोम के लोग।`` इससे सिद्ध होता है कि सामाजिक विकास के नियम अमरीकी आदिवासियों पर वैसे ही लागू होते हैं जैसे यूरोप के ``सभ्य आर्यों`` पर। (पृष्ठ ३२)
ईसा से लगभग पाँच हजार साल पहले मिस्त्र की प्राचीन संस्कृति का विकास हुआ। नील नदी की बाढ़ के कारण यहाँ की उर्वर धरती में जिस संस्कृति का विकास हुआ, उसका गहरा असर भुमध्यसागर के प्रदेशों पर पड़ा। यह प्राचीन संस्कृति बर्बर और अर्ध-बर्बर अवस्था की है। लोहे के औजार बनना अभी शुरू नहीं हुए। तांबा और कांसा मुख्य धातुएँ हैं। खेती (अर्थात् बागववनी) पहले हाथ से होती थी, फिर कुदाल को जुए से बाँधकर कर्षण द्वारा ``कृषि`` होने लगी। बागों के बदले क्षेत्रों को जोत-बो कर ``खेती`` होने लगी। जुए में बँधा हुआ कुदाल हल बना और बैल उसे खींचने लगे। इस तरह मनुष्य ने पशुओं के योग से अपने श्रम और उत्पादन की शक्ति बढ़ाई। (पृष्ठ ३२-३३)
........शेष अगली बार
(हिन्दी साहित्य में रामविलास शर्मा जी को इसलिए हमेशा याद किया जाएगा क्योंकि वे पहले समीक्षक हैं, जिन्होंने हिन्दी समीक्षा को व्यापक अर्थों में सामाजिक मूल्यों से जोड़ा है। न केवल जोड़ा है बल्कि उस पगडण्डी का निर्माण भी किया है, जिसपर भविष्य की समीक्षा को चलना होगा। अन्यथा हिन्दी समीक्षा अपनी दयनीय स्थिती से कभी भी उबर नहीं पाएगी। इस संदर्भ में इन्दौर के राकेश शर्मा ने रामविलास जी पर बहुत गम्भीरता से अध्ययन किया है। वे उनकी पुस्तकों से वे अंश जो वर्तमान समय की जिरह में प्रासंगिक हैं, हमारे लिए निकाल कर दे रहे हैं। हम एक सिलसिला शुरू कर रहे हैं, जिसकी पहली कड़ी आपके सामने है, जिसमें रामविलास शर्मा जी की पुस्तक मानव सभ्यता का विकास से निकाले गए अंश हैं। पढ़ें और विचारों का घमासान करें। - प्रदीप मिश्र)
एक अर्थ में मनुष्य श्रम द्वारा ही पशु से मनुष्य बना है। पशु-अवस्था से निकले हुए मनुष्य को लाखों वर्ष हो चुके और उस अवस्था का ठीक काल-निर्णय करना सम्भव नहीं है। लेकिन पशु-जीवन से निकलते-निकलते उसे लाखों वर्ष लगे होंगे, इसमें संदेह नहीं। उसकी सभ्यता का इतिहास उसके पशुजीवन के इतिहास के समय को देखते हुए बहुत छोटा है। (पृष्ठ १५)
मानव चेतना बाह्य जगत की वस्तुगत सत्ता को ठीक-ठीक नहीं समझती, इसलिए मनुष्य कल्पना करता है कि वह जादू-टोने से, जंतर-मंतर से या आगे चलकर योग-बल से, उसे इच्छानुसार बदल लेगा। (पृष्ठ २२)
मातृसत्ताक गोत्रों में किसी व्यक्ति की अपनी वस्तुएँ उसके न रहने पर उसके मामा, भांजे और भाई पाते हैं। उसकी अपनी संतान उन्हें नहीं पाती। नारी की वारिस उसकी अपनी संतान, उसकी बहने और उसकी बहनों की सन्तान होती है। इस तरह गोत्र की उत्पत्ति गोत्र में ही रहती है। मातृसत्ताक विरासत का यह ढंग बहुत दिनों तक प्राचीन मिस्त्र में चलता रहा जहाँ राज परिवार में बहन-भाई इसलिए शादी करते थे कि अपने गोत्र की सम्पत्ति बाहर न जाय। (पृष्ठ २३)
इस संस्कृति के विनाश का श्रेय यूरोप की ``सभ्यता`` को है। अमरीकी आदिवासियों के विनाश का इतिहास अच्छी तरह प्रकट करता है कि यूरोप के लुटेरे वहाँ किस तरह की सभ्यता फैलाने गये थे। इसमें सन्देह नहीं कि यूरोप निवासी वहाँ न पहुँचते तो पेरू और मेक्सिको के लोग सभ्यता की अगल मंजिलों की तरफ बढ़ते। फॉस्टर ने ठीक लिखा है कि इनमें शासक वर्ग और राज्यसत्ता के निर्माण के लक्षण मिलते हैं। अज्तेक और इंका लोगों ने दूसरे कबीलों को जीत कर अपना राज्य-विस्तार किया था और उन कबीलों से दास, सैनिक, नरमेध के लिए बलि प्राप्त करते थे। फॉस्टर ने लिखा है, ``जब स्पेन के लोग अमरीका पहुँचें, तब दिखता है कि इंका और अज्तेक लोग वैसे ही समाज का विकास करने में लगे हुए थे, जैसे प्राचीन ग्रीस और रोम के लोग।`` इससे सिद्ध होता है कि सामाजिक विकास के नियम अमरीकी आदिवासियों पर वैसे ही लागू होते हैं जैसे यूरोप के ``सभ्य आर्यों`` पर। (पृष्ठ ३२)
ईसा से लगभग पाँच हजार साल पहले मिस्त्र की प्राचीन संस्कृति का विकास हुआ। नील नदी की बाढ़ के कारण यहाँ की उर्वर धरती में जिस संस्कृति का विकास हुआ, उसका गहरा असर भुमध्यसागर के प्रदेशों पर पड़ा। यह प्राचीन संस्कृति बर्बर और अर्ध-बर्बर अवस्था की है। लोहे के औजार बनना अभी शुरू नहीं हुए। तांबा और कांसा मुख्य धातुएँ हैं। खेती (अर्थात् बागववनी) पहले हाथ से होती थी, फिर कुदाल को जुए से बाँधकर कर्षण द्वारा ``कृषि`` होने लगी। बागों के बदले क्षेत्रों को जोत-बो कर ``खेती`` होने लगी। जुए में बँधा हुआ कुदाल हल बना और बैल उसे खींचने लगे। इस तरह मनुष्य ने पशुओं के योग से अपने श्रम और उत्पादन की शक्ति बढ़ाई। (पृष्ठ ३२-३३)
........शेष अगली बार
(हिन्दी साहित्य में रामविलास शर्मा जी को इसलिए हमेशा याद किया जाएगा क्योंकि वे पहले समीक्षक हैं, जिन्होंने हिन्दी समीक्षा को व्यापक अर्थों में सामाजिक मूल्यों से जोड़ा है। न केवल जोड़ा है बल्कि उस पगडण्डी का निर्माण भी किया है, जिसपर भविष्य की समीक्षा को चलना होगा। अन्यथा हिन्दी समीक्षा अपनी दयनीय स्थिती से कभी भी उबर नहीं पाएगी। इस संदर्भ में इन्दौर के राकेश शर्मा ने रामविलास जी पर बहुत गम्भीरता से अध्ययन किया है। वे उनकी पुस्तकों से वे अंश जो वर्तमान समय की जिरह में प्रासंगिक हैं, हमारे लिए निकाल कर दे रहे हैं। हम एक सिलसिला शुरू कर रहे हैं, जिसकी पहली कड़ी आपके सामने है, जिसमें रामविलास शर्मा जी की पुस्तक मानव सभ्यता का विकास से निकाले गए अंश हैं। पढ़ें और विचारों का घमासान करें। - प्रदीप मिश्र)
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