Monday, 10 December 2012

उंगलियाँ उम्र की कट गयी हिसाबों में

हिन्दी गीत की विकास यात्रा में नवगीत की परम्परा ने गीत को एक नया स्वरूप दिया है। जो ज्यादा जनोन्मुख है और यथार्थ के तश्वीर को पूरी सम्प्रेषणीयता के साथ अंकित करने में समर्थ भी। इसलिए शुरू से ही इसकी भूमिका गम्भीर रही। नवगीत की इस परम्परा को और भी सम़ृद्ध करने वाले गीतकार प्रमोद उपाध्याय का गीत संग्रह “खिड़कियाँ झाँक रहीं कमरे के पार” हमारे सामने है। शीर्षक गीत कवि के संवेदनात्मक वरीयता में आम आदमी का चित्र खिंचता है – “खिड़कियाँ झाँक रहीं कमरे के पार/छत के मुँह उखड़े से, आंगन बीमार / उंगलियाँ उम्र की कट गयी हिसाबों में / परिचय की केंचुली बंद है किताबों में / कंधा तक देने के नहीं मिले चार।“ इसके अलावा जब हम पढ़ते हैं – “देह हुई बर्तन दिन हुआ ठठेरा“ या “लोग सरौते बीच सुपारी जैसे जीते हैं” तो हमें हमारे समय का दृश्य कुछ और साफ दिखाई देने लगता है। दरअसल एक कवि जब अपनी संवेदना को शब्दरूप दे रहा होता है तो उसकी राजनीतिक चेतना कविता में द़ष्टि की तरह से समाहित होती है। जिसकी व्यंजना अर्थ ध्वनियों के रूप में पाठक के मन में अंकित होती है। यह अंकन ही कवि का सर्थकता है। ऐसी सर्थकता इस संग्रह में संग्रहित अधिकतर गीतों के परिणति में मिलती है जैसे – “गिद्ध जैसे दिन हुए हैं/साँप जैसी रात/किसको सुनाएं किस तरह/आज मन की बात”  या  “उन्माद का अनुवाद करती ये हवाएँ/लिख रही भूगोल की काली कथाएँ”  या “अय्यारों के हाथ में सूरज/हुई तिलिस्मी रातें/हारूत-मारूत नए करिश्में आपस में दिखलाते।“
      कवि कार्बन होते दिन, सुनामी और लातूर का प्रयोग करके जहाँ समसामयिक प्रंसगों को कविता में शामिल करता है, वहीं पर स्पाइल, ड्राइंग रूम, फाइल, वाइन बार, क़ॉफी हाउस और सेनेटरी पेड जैसे शब्दों का प्रयोग करके वर्तमान भाषा संस्कार को भी रेखांकित करता है। संग्रहित काव्य संसार में शकुंतला, पांचाली, कबीर, सूरदास, रसखान, पिकासो, मोपासाँ, वाजिश्रवा और नचिकेता आदि चरित्रों का प्रयोग हमारे समय की जटिलता को सरल तरीके से सम्प्रेषित करता है। कवि “कुछ खदबद सा बेसन रोटी ज्वार की/बिन बघारी भाषा प्यार की” और “बदल रही मुट्ठी में याचक हथेलियाँ/आ बैठी आंखों पर सूर्य की सहेलियाँ” जैसी पंक्तियों से साक्षात्कार करा कर यह एहसास दिला देता है कि काव्य कौशल में भी उसे महारथ हासिल है। मालव भूमि की उर्वरा से जन्मा यह कवि मालवी के शब्दों का सटीक प्रयोग करता है। देवास जैसे कस्बे में कर्मस्थली होने का प्रमाण उसकी कविता में समाहित कस्बाई संवेदना प्रमाणित करती है। फ्लैप पर प्रतिष्ठित कथाकार प्रकाश कांत ने ठीक ही लिखा है – “प्रमोद बुनियादी तौर पर कस्बाई मन के रचनाकार रहे हैं। साथ ही उनका रचनाकार किसी हद तक ग्रामीण संवेदना का रचनाकार भी है, जो नागर जीवन के तनाव, दबाव तथा नकलीपन में खुद को घिरा और घायल पाता है। इस तरह उसके यहाँ आदिम ग्रमीण संवेदना, कस्बाई मन की सहजता और नागर जीवन का संष्लिशटता एक साथ देखने को मिलती हैं।“ इन विचारों के पक्ष में बहुत सारे उदाहरण संग्रह में मौजूद हैं, यहां पर निम्न पंक्तियों को देखा जा सकता है – “शहरी से देहाती मानुस, अब भी अच्छा है /अनुभव से है प्रौढ़ मगर मन से बच्चा है।“
प्रमोद जी इस दुनिया में अब नहीं हैं। उनकी पत्नी रेखा उपाध्याय ने इस संग्रह को संकलित करके प्रकाशित करवाया है। पुस्तक मे अपनी बात शीर्षक से उन्होंने जो लिखा है वह भी एक कविता ही है। यहाँ पर मैं रेखा जी के शब्दों का भी उल्लेख करना चाहूँगा, जो इस संग्रह को मुकम्ल करते हैं – “उनके इन गीतों में मालवा का जो लोक और कस्बाई जीवन है, वह खुद भी मालवा की होने से मुझे हमेशा बहुत आत्मीय लगता रहा। मेरा अपना अनुभव संसार उसी का हिस्सा रहा था। पिछले कुछ सालों में जब उनकी आंखों की रोशनी बहुत कम हो गयी थी और खुद लिखना उनके लिए सम्भव नहीं रह गया था, तब इन गीतों को उनसे सुनकर कागज पर उतारने के दौरान यह अनुभव और गहरा हो गया।“
वस्तुतः प्रगतिशील-जनवादी मूल्यों का सर्जक कवि पूरी तरह से इन गीतों में व्याप्त है। जिसके सरोकारों में हमारा-समाज, हमारा-समय अपने वैज्ञानिक स्वरूप में विकसित होने को आतुर है। पाठ के बाद अपने इस स्वप्न को पाठकों में संचित करने में कवि सफल है और उसकी सर्जना हिन्दी कविता जगत को समृद्ध करती है। मैं अपनी बात उनके गीतो के साथ पूरी कर रहा हूँ- “सईं साँझ से मरे हुओं को/रोएँ तो रोएँ कब तक/रीति-रिवाजों की ये लाशें/ढोंएँ तो ढोएँ कब तक।“

समीक्षक - प्रदीप मिश्र, दिव्याँश 72ए सुदर्शन नगर, अन्नपूर्णा रोड, पोस्ट-सुदामा नगर, इन्दौर-452009(म.प्र), मो. 09425314126

पुस्तक का नाम - खिड़कियाँ झाँक रहीँ कमरे के पार
कवि का नाम – प्रमोद उपाध्याय
मूल्य – 200 रूपए
प्रकाशक – अंतिका प्रकाशन, सी-56, यूजीएफ-4, शालीमार गार्डेन, एक्सटेंशन-II ,गाजियाबाद-5 (उ.प्र.)          

Monday, 21 May 2012

माया महा ठगनी -2


आज तो गजब ही हो गया विचार सिंह घुड़चढ़े और स्पष्ट सिंह उजागर आमने-सामने थे। यादव पान भण्डार पर लगभग भीड़ सी लग गयी थी। सबसे पहले मैं परिचय दे दूँ विचार सिंह जी को तो आप जानते ही हैं, वे सदैव चिंतनशील रहते हैं, अपने मन की बातें बेबाकी के साथ बकते रहते हैं। नागरिकताबोध उनके रग-रग में बसी हुई है। बसी क्या अंकुरित होती रहती है। अतः लोकतंत्र के सारे अधिकारों को वे अपनी जेब में लेकर घूमते हैं। स्पष्ट सिंह उजागर उनसे भी दो कदम आगे हैं। वे पेशे से पत्रकार हैं और खुद को बहुत बड़ा बुद्धीजीवी समझते हैं, जबकि बमुश्किल 12वीं पास हुए और फिर स्नातक तो नेतागीरी ने पास करा दिया। कहा यह भी जाता है कि उनकी उत्तर पुस्तिका भी किसी पट्ठे ने लिखी थी। खैर जो भी दोनों ही हमारे समय की जरूरत की तरह हैं, कम से कम बहस तो करते हैं। मुझे लगता है देवेन्द्र कुमार बंगाली ने इनको ही देख कर अपना चर्चित नवगीत बहस जरूरी है लिखा होगा। ये दोनों बाकी सब चीजों में भले ही अगल सोच रखते हों, लेकिन लेखकों, कवियों और साहित्यकारों को देखते ही उन पर पिल पड़ते हैं। या यूँ कहें कि पढ़े लिखे लोगों से इनको फोबिया है। खैर पूरा परिचय देने लगूँ तो एक पुस्तक तैयार हो जाएगी। फिलहाल उनकी बहस देखकर मैं भी सरकते-सरकते उनके करीब पहुँच गया। विचार सिंह घुड़ चढ़े पूरी ऊर्जा के साथ बोल रहे थे -"क्यों गुरू, हिंलिश उस्ताद, बोलो अब क्या बोलते हो ? तुम को ठीक-ठाक हिन्दी भी बुरी लगती है। खाते हिन्दी की हो और बजाते अंग्रेजों की। बिचारे साहित्यकारों का फजिहत करके रख दिया था। वासांसि... ने तुम्हारा हाजमा खराब करके रख दिया था। दिदे फाड़कर पढ़ो - अमरीका ने नासा में संस्कृत को अपनाने की घोषणा कर दी है। क्योंकि आधुनिक तकनीक के लिए सबसे उचित भाषा संस्कृत है। जब भारतीय संस्कृत के विद्वानों उनको सहयोग करने में नखड़े दिखाए तो प्राथमिकशाला में वे संस्कृत अनिवार्य करने जा रहे हैं। जिससे भविष्य में भारत पर निर्भरता खत्म हो जाए।" बात पूरी करते ही आखबार का पन्ना स्पष्ट सिंह के चेहरे पर फेंक दिया और ऊपर से जुमला चिपका दिया- "ये तुम्हारा ही अखबार है।" यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि वर्षों बाद इन्दौर आकाशवाणी ने कथा, उपन्यास तथा आलोचना पर केन्द्रित त्रीदिवसिय आयोजन वासांसि.... शीर्षक से किया, जिसकी रिपोर्टिंग में स्पष्ट सिंह ने जमकर उल्टी की थी और उनका वश चलता तो साहित्यकारों को सूली पर चढ़ा देते। क्योंकि यहाँ पर परम्परा और संस्कृति पर भी चर्चा हुई थी और शीर्षक गीता के दूसरे अध्याय का बाइसवां श्लोक था। बिचारे करें भी तो क्या करें, नेताओं की चमचागीरी के बरक्स साहित्यकार ही तो बचते हैं। खैर उन्होने अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से विचार सिंह जी को घूरा और अखबार को सम्भाल कर लपेटा और जेब के हवाले करते हुए भुनभुनाए - "दारू की बोतल लपेटने के काम आएगी।" फिर विचार सिंह से मुखातिब हुए - "तुमको तो देख लूंगा। शाम को जब अंगुरी हलक के नीचे उतरेगी तो मेरी प्रज्ञा जगेगी। फिर तुमको निपटाउंगा। कल का अखबार पढ़ लेना। पत्रकार हूँ...... पत्रकार हूँ। तुम क्या समझो इन बौद्धिक चीजों को। समय के साथ बदलना सीखो। सड़ी गली परम्परा और भाषा की वकीली बन्द करो। दुनिया बहुत आगे निकल गयी है और तुम पीछे लौटने की बात कर रहे हो। पिज्जा-बर्गर के बरक्श सूखी रोटी....। तुम जैसों ने देश के विकास में लंगड़ी फंसी रखी है। " और अपने मोटर साइकिल का किक् मारने लगे। इतने में विचार सिंह उनकी खिल्ली उड़ाते हुए बोले- " वासांसि.. के नाम पर कपड़े फाड़-फाड़कर तुने क्या हाल कर लिया है। बनियान और पैंट भी फट गए हैं। घर जा पहले ये चिंदी उतार कर कोई कायदे का कपड़ा पहन। तूने ही लिखा था न वासांसि यानि कपड़ा।......पढ़ लूंगा तुमको। कल अखबार में...ऐसे अखबार में जिसका सम्पादक तुम्हारी जेब में पड़ा है और वह भी पढ़ा-लिखा तुम जितना ही है। बापू की खेत है, चाहे जो बोवो, जो काटो। " इतने में मोटरसाइकिल फुर्र हो गयी थी। खैर विचार सिंह जी ने अपना उतारा कर लिया था इसलिए वे यादव की तरफ मुड़ते हुए बोले - " एक मीठा पत्ता, एक सौबीस, तीन सौ, गीली सुपारी और सादी पत्ती ...मीठा कुछ भी मत डालना। " फिर मसकुराते हुए यादव से बोले - " देखा कैसा निपटाया..? " कुछ और बोलते इससे पहले यादव ने पान का बीड़ा आगे बढ़ा दिया था। मैं भी धीरे से खिसक लिया और दुश्यंत कुमार मेरे अंतस में गूंज रहे थे –
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।             

लेखक -  प्रदीप मिश्र   mishra508@gmail.com

Wednesday, 16 May 2012

संयुक्त अरब इमारात की पहली हिन्दी पत्रिका निकट


समाई हैं कई बेचैन नदियाँ उसके सीने में
अगर चाहे भी तो कैसे समन्दर चैन से बैठे।

कोई मछली नहीं जिन्दा कमल बाकी नहीं कोई
बता दो ऐसे में कैसे सरोवर चैन से बैठे।

कमलेश भट्ट 'कमल' के इन शेरों को पढ़ते हुए। एक रचनाकार की बैचेनी जो चित्र बनता है, उसके सारे रंग सृजनात्मक ऊर्जा से भरे हैं। इस तरह की रचनाओं से सुसज्जित एक पत्रिका अंक हमारे हाथ में है। पत्रिका का नाम 'निकट' है और आबूधाबी से प्रकाशित हुई है। इसके सम्पादक हिन्दी के सुपरिचित कथाकार कृष्णबिहारी हैं। प्रदीप ने जब पत्रिका अंक दिया और कहा कि विदेश से निकलनेवाली पत्रिका है, तो मन वैसे भी कुछ खास उत्साहित नहीं था। क्योंकि आजकल हिन्दी में यह रिवाज चल पड़ा है कि विदेशों में रहनेवाले कुछ लोग जो डायरीनुमा कुछ लिखकर कथाकार और किशोरावस्था के आवेगों को नोट करके अपने को कवि मान लेते हैं। विदेश यात्रा और डालर के लालच में हिन्दी के कुछ नामचीन समीक्षक, लेखक और कवि जो हिन्दी के देशी रचनाकारों की बखिया उधेड़ते हैं, इन अधकचरे रचनाकारों का झण्डा उठाए फिरते हैं। लेकिन प्रदीप ने अंक दिया था, पलटना मजबूरी थी। सो पलटते - पलटते कमलेश के ये शेर सामने आ गए और पूरी पत्रिका पढ़ गया।
एक समाचार पत्र के रिपोर्टर की तरह से लिखा गया सम्पादकीय तो ऊबाउ है। लेकिन उसके आगे जब अज्ञेय पर राजेश जोशी का आलेख पढ़ते हैं तो अज्ञेय को समझने की नई दृष्टि मिलती है। राजेन्द्र राव का 'जेल जीवन का के सवाक् चित्र' के शीर्षक से विद्यार्थी जी के जेल जीवन की डायरी अंक में विशिष्टता पैदा करता है। सम्पादक कथाकार हैं और कथा की अच्छी समझ रखते हैं, इसका प्रमाण अंक में छपी कहनियाँ हैं। लगभग सारी कहनियाँ पठनीय हैं, विशेष रूप से प्रमोद सिंह की कहानी 'आदमी और औरत उर्फ बीत रात की लोरी', अपूर्व जोशी की कहानी 'नेपथ्य का नरक' , प्रताप दिक्षित की कहानी 'ढलान पर कुछ पल' , उर्मिला शिरीष की कहानी 'असमाप्त' तथा हरि भटनागर की कहानी 'खसम' का जिक्र तो कराना ही पड़ेगा। इन कहानियों में न केवल किस्सागोई की पकड़ है, बल्की भाषा हृदय में जगह बनाती है। हरि भटनागर की कहानी का एक अंश उदाहरण की तरह से देखा जा सकता है - 'इस पर वह शरमा गया, हल्खा मुस्कुराया, दा़ढ़ी पर हाथ फेरा, बोला मैं शायर वायर कुछ नहीं। हाँ, अपने धंधे को शायरी की तरह लेता हूँ और इसी तरंग में पूरा दिन काट देता हूँ। अगर ये शायरी न हो तो मैं कब्रिस्तान में जा लगूँगा। यकायक वह झुककर एड़ी खुजलाने लगा और तिरछी नज़रों से देखता आगे बोला हर इंसान को शायर होना चाहिए। ......................................पत्नी बोलीं ज़ालिमों ने भाई जान और उनके बच्चों को मार डाला, कित्ते गंदे लोग हैं कहते हुए वे रो पड़ी थीं।
अब मुझसे रहा न गया, अलफ होकर चीख़ पड़ा तू तो ऐसे रो रही है जैसा तेरा ख़सम मर गया हो... कमीन कहीं की नीच ।'

कहनियों में जितनी गुणवत्ता है, कविताओं के चुनाव में उतनी ही लापरवाही दिखाई दी। इतनी सारी बुरी कविताऐं और कुछ तो कविता भी नहीं हैं और कविता की तरह छपीं हैं। इनके बीच में कुछ अच्छी काव्यपंक्तियों से भी सामना हुआ जिनका उल्लेख करना चाहिए । उत्पल बेनजीं की सारी कविताएं अच्छी हैं - 'जाते समय - अभी आता हूँ... कहना / उन्हें दिलासा देना होता है / जो हर पल इस कश्मकश में रहते हैं / कि शायद इस बार भी हम लौट आएँगे /कि शायद इस बार हम नहीं लौट पाएँगे' , प्रदीप मिश्र की कविताएं भी अच्छी हैं -'आदमी जब तक जीतता रहता है / एक भीड़ दौड़ती रहती है /उसके साथ /जब हारने लगता है /छंट जाती है भीड़
/अकेला पड़ जाता है/फिर भी अंदर के आदमी होते हैं/उसके साथ' । कविताओं के साथ गीत का आस्वाद भी पत्रिका में मिलता है, यतीन्द्र नाथ राही के गीत अच्छे हैं - 'न ठहरेंगे बसन्ती दिन /
किसी कचनार की ख़ातिर / पिये महुआ /हवाओं के चलन /होते बड़े शातिर /पलाशों पर दहकते / प्रीति के फागुन /चले आओ '!
जगन्नाथ त्रिपाठी शारदेय पर विशेष सामग्री देकर सम्पादक ने अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह किया है। उनकी रचनाओं और उन पर आलेख हिन्दी जगत को एक विलक्षण रचनाकार से परिचित करवाता है। उनकी कविता कुछ पंक्तियों देखा जा सकता है - 'हे काल ठहरो। जब तलक मैं चुक न जाऊं / पास मेरे जो बचा है जब तलक मैं दे ना पाऊँ / रिक्त होते ही तुम्हें मैं स्वयं प्रस्तुत करुँगा / मुदित मन स्मित वदन यह कहते हुए /मैं तुम्हारी ही प्रतीक्षा में खड़ा था / आ गए तुम' ।
इसके अलावा समीक्षा, फिल्म पर एक आलेख, लघु कथाएं और मन की बात आदि स्तम्भ के माध्यम से ठीक-ठाक सामग्री पत्रिका में संचित है। पत्रिका के लेआउट में सुधार की बहुत गुंजाईश है। कविताओं और लघुकथाओं को फिलर की तरह प्रयोग करना उचित नहीं है। प्रदीप मिश्र की कविताएं तो इस तरह से लगीँ हैं, जैसे जगह बच गयी तो कुछ भी ठूँस दिया। ऐसा लगता है स्कूटर चलाती लड़कियाँ कविता में उप शीर्षक मे हारकर बैठा आदमी कविता भी है। सम्पादक की लापरवाही ने कविताओं का आस्वाद खराब कर दिया है। इस तरह की दुर्घटना पत्रिका में और भी जगहों पर है। विषय सूची में अगर कविता उप शीर्षक के नीचे सिर्फ कवियों का नाम गया होता तो ज्यादा ठीक था। एक कविता की पंक्ती में दीमक निगल गए हैं लिखा है, तो फिर चाटने का काम कौन करेगा। निकट का यह 5वाँ अंक है। अगले अंक में सम्भावित जिस तरह से बड़े - बड़े लेखकों की सूची दी गयी है, उसी तरह की सम्पादकीय समझ की भी अपेक्षा रहेगी। विदेश में रहते हुए इस तरह का प्रयास सराहनीय है। सबसे ज्यादा सराहना सम्पादक की इस बात की जानी चाहिए कि वे इसको मुकम्मल हिन्दी जनपद की पत्रिकाओं के कलेवर में निकाल रहे हैं, न कि विदेशी तड़के साथ।

पत्रिका का नाम - निकट
सम्पादक - कृष्णबिहारी
वर्ष - 5, अंक-5 मई-अक्टूबर 2011
मूल्य - 25 रूपये
पो.बा. न. 52088
आबूधाबी यूएई
                                                                                                      
                                                                                                                                   - रजनी रमण शर्मा
      


Monday, 9 April 2012

माया महा ठगनी -1



विचार सिंह घुड़ चढ़े आज बेहद नाराज थे। बार-बार दुष्यंत कुमार के शेर को मालवी लहजे में दोहरा रहे थे - "सिरिफ हंगामो खड़ो करनो म्हारो मकसद नी /म्हारी कोशिश है कि या सूरत बदलनी चइए।" मुझे देखते ही खूब जोर से चिल्लाए तुम बुद्धी जीवियों ने इस देश को डुबा दिया। जहाँ सोने की चिढ़िया करती थी बसेरा वहाँ अमरीका के कौवे काँव-काँव कर रहे हैं, और चीन की बिल्ली तो बेधड़क घूम रही है। जो बचा खुचा है उसे पकिस्तान के स्यार नोंच रहे हैं। नेता तो अब इस देश में रहे नहीं और तुम बुद्धीजीवी लोग तो सरकारी पुरस्कारों और पूंजीपतियों के अनुदान पर मदहोश  हो। अभी हाल में सुना है कि लेखकों में डालर का घुन भी लग गया है। सबके सब हमारे प्यारे देश को निपटाने में लगे हो। गद्दार हो तुम सब गद्दार।" कहते ह्ए वे गुटके की पीक थूकते हुए अपनी साइकिल पर सवार हुए और मेरा जवाब सुने बगैर आगे बड़ गए। मुझे समझ में आ रहा था। जब से अन्ना हजारे का अनसन शुरू हुआ है, उनके अंदर का आम आदमी जाग गया है। वे जब बोल रहे होते हैं तो उनकी आवाज हमारे देश की आम जनता की आवाज में होती है। इसलिए उनको गम्भीरता सुनना जरूरी होता है। आज भी वे जो कुछ कह कर गए उसमें दम तो था। सचमुच दिन प्रतिदिन हम अपने सोरकारों से मुक्त होते जा रहे हैं। बतौर नागरिक जो जिम्मेदारियाँ अपने देश के प्रति हैं, उनको किस हद तक हम निभा रहे हैं ?  मुझे लगता है कि इस कटघरे में अगर खड़ा करें तो सबसे ज्यादा संदेहास्पद स्थिती हमारे समय के बुद्धीजीवियों की होगी। खैर यह सब सोचता हुआ मैं यादव के पान ठेले पर पहुँचा ही था और गुटके का डोज लेकर मुँह में डाला ही था कि विचार सिंह जी वापस पहँच गए। लगभग लड़खड़ते हुए साइकिल को स्टैण्ड पर लगाए और झूमते हुए मेरे पास आए और मेरी आंखों में आँख डलकर पूछा - "क्यों जनाब कुछ समझ में आया। बहुत बड़े कवि बने फिरते हो ना  तो सुनों मंगलेश डबराल ने क्या लिखा है- "एक सरल वाक्य बचाना मेरा उद्देश्य है /मसलन कि हम इंसान हैं /मैं चाहता हूँ इस वाक्य की सच्चाई बची रहे / सड़क पर जो नारा सुनाई देरहा है /वह बचा रहे अपने अर्थ के साथ /मैं चाहता हूँ निराशा बची रहे /जो फिर से उम्मीद पैदा करती है /अपने लिए  /शब्द बचे रहें /जो चिड़ियों की तरह कभी पकड़ में नहीं आते /प्रेम में बचकानापन बचा रहे /कवियों में बची रहे थोड़ी सी लज्जा.....। " इस बार वे पूरी ताकत से खड़े रहे और मेरी आँखों में आँख डालकर मेरे जवाब का इन्तजार कर हे थे और मेरे अंदर चन्द्रकांत देवताले की पंक्तियाँ गुँज रही थी- " एक दिन मांगनी होगी हमें माफी।"

(दोस्तों माया महा ठगनी शीर्षक से एक कालम शुरू कर रहा हूँ। इसी बहाने शायद कुछ नियमित हो सकूँ। आपकी प्रतिक्रिया चाहिए। - प्रदीप मिश्र)
mishra508@gmail.com

Tuesday, 11 October 2011

जनप्रतिबद्ध भावनाओं की विचारशील कविताएँ



इंदौर। प्रगतिशील लेखक संघ  व जनवादी  लेखक संघ की इंदौर इकायों  ने 25 सितंबर 2011
रविवार को देवी अहिल्या केन्द्रीय लायब्ररी के अध्ययन कक्ष में कवि श्री अनंत श्रोत्रिय के रचना पाठ का आयोजन किया। श्री अनंत श्रोत्रिय ट्रेड युनियन व कर्मचारी संगठनों से जुड़े रहे हैं। वे  प्रगतिशील विचाराधारा के प्रतिबद्ध कवि हैं और फिलहाल प्रगतिशील लेखक संघ  की इंदौर इकाई के अध्यक्ष हैं। हाल ही में साहित्यक पत्रिका राग भोपाली ने अनंत श्रोत्रिय के रचनाकर्म पर एकाग्र एक अंक निकाला  है। श्री श्रोत्रिय ने "पूरब का सूरज" कविता सुनाकर कार्यक्रम की शुरुआत की। 

उठेंगे कदम, जूझेंगे हम
साथ जूझता होगा जनजन
हाथ उठा मुट्ठी तानी
ताल मिली गरजा जनजन
उन्नीस सौ बयालीस, आर.एन.आय. का रिवोल्ट
उद्वेलित करते, गरजा जनजन
हुंकार भरता नभ, बना प्रेरणा
बढाओ कदम
पूरब में सूरज बिखेरे  लाली
उड़ावे गुलाल यही तो सपना
दिन विहँसा किरणें विकीर्ण
जनजन में जागी खुशियां.

उनके बाद प्रदीप मिश्र, विनीत तिवारी और प्रांजल श्रोत्रिय ने श्री अनंत श्रोत्रिय की चुनी हुई कविताओं का पाठ किया। पोस्टर, यह रास्ते, सर्वोदय, प्रामाणिक ज्ञान आदि कविताओं को काफी सराहना मिली। वरिष्ठ कथाकार श्री सनत कुमार ने श्री श्रोत्रिय के मालवी लेखन और गद्य लेखन पर अपना वक्तव्य केन्द्रित करते हुए कहा कि १९५० के दशक के शुरुआती वर्षों में श्री अनंत श्रोत्रिय का एक आलेख महाकवि निराला पर आया था और उसने मालवा के पाठकों को निराला से परिचित करवाया था. वह बहुत अच्छा आलेख था जिसमें साहित्य के वैज्ञानिक आधारों पर निराला की कविता का विवेचन किया गया था. उन्होंने ये भी कहा कि श्री श्रोत्रिय की कविता अवधारणात्मक वृत्ति  की प्रकृतिमूलक कविता है.  द्वंद्वात्मक भौतिकवाद जैसी जटिल अवधारणा को भी उनहोंने कविता में पिरोया है।

हमारा अस्तित्व भी एक प्रश्न चिन्ह फिर क्यों कर यह सब वाद-विवाद,
जब सब कुछ है असत्य, अस्तित्वहीन तो यह माथापच्ची क्यों कर?
उन्होंने मालवी  जीवन के सुख-दु:ख, आशा-निराशा को बिना  लाउड हुए अभिव्यक्त किया है। उन्होंने मालवा के जनकवियों के मूल्यांकन का महत्त्वपूर्ण काम किया है। उनके साथ मालवा के प्रगतिशील कवियों की एक पूरी परंपरा है जिनमें मान सिंह राही, रंजन,  प्राण गुप्त  और मजनू इंदौरी के नाम प्रमुख हैं. उनकी विरासत का सही मूल्यांकन होना अभी बाकी है। यह यात्रा मालवा में 60 वर्ष से विकसित हो रही है। श्रोत्रियजी की कविताओं में  प्रकृति  के रम्य चित्र हैं।

पानड़ा झर-झर झरी रिया
आमवा में लाग्या मोर
बागों फूल में की उठाया
हिरदा में उठे हिलोर
 लीली लीली चादर तणी खेत में
इतराती अरे (अलसी) अई-वई डोले
उन्होंने कहा कि श्रोत्रियजी की कुछ कविताएं तो केदारनाथ अग्रवाल  की याद दिलाती हैं।
इस अवसर पर कवि ब्रजेश कानूनगो ने कहा कि श्रोत्रियजी की कविताओं में कला, शिल्प, और  बौद्धिकता  का इतना आग्रह नहीं है, जितना कि अभिव्यक्ति और सम्प्रेशनीयता  का। वे अपनी कविताओं के जरिए एक  प्रतिबद्ध कवि नज़र आते हैं। उनकी कविताएं रातनैतिक कविताएं हैं। कवि में वामपंथी एक्टिविस्ट साफ़ साफ़ दिखाई देता है। मनुष्यता व मनुष्य के पक्ष में अनंत जी की आकांक्षाएं अनंत हैं। वे 82 की उम्र में भी वामपंथी मूल्यों के प्रति सतत संघर्षरत हैं। उनका सकारात्मक कवि इस सफर को जारी रखना चाहता है। वे कहते हैं -
सफर लंबा है
मंजिल  समीप नहीं
इंसान ने फिर भी
कितना तय कर लिया रास्ता
लेखक, कवि एवं एक्टिविस्ट विनीत तिवारी ने कहा कि श्रोत्रिय जी की कवितायें उस दौर कि कवितायें हैं जब साधारण से साधारण कविता भी एक वैश्विक चेतना तक पहुँचने लगी थी. उस दौर में कपड़ा मिलों में काम करने वाले कवि भी सिर्फ अपनी तकलीफों या संघर्षों या घर परिवार के बारे में ही नहीं लिख रहे थे बल्कि वे एशिया के संघर्षरत अन्य देशों के बारे में या अंगोला या रूस, चीन की जनता के के बारे में भी लिख रहे थे और एक तरह का अंतरराष्ट्रीयतावाद उनमें विकसित हो रहा था. आज प्रतिष्ठित हो चुके कवियों के भीतर भी यह चेतना या तो नदारद है या बहुत कम मौजूद है. यह ज़रूर देखना चाहिए कि श्रोत्रियजी की कविताओं में शिल्प के प्रति असजगता है क्योंकि उन्होंने कवि कर्म को भी एक एक्टिविस्ट की ही तरह किया है. बहुत सारे दोहराव भी इन कविताओं में हैं लेकिन अपने समाज, राजनीति की जनपक्षधर समझ और वामपंथी सोच को इसमें साफ़ पारदर्शी तरह से देखा जा सकता है. उनकी कविता "पोस्टर" आम जन के भीतर विकसित होने वाली राजनीतिक समझ की प्रक्रिया की बानगी है-

दीवार पर चिपका पोस्टर
लाल नीले रंगों में छपा
इसके अक्षर समेटे हैं
बीज क्रांति के, संघर्ष के 

कार्यक्रम में कवि राजकुमार कुंभज ने श्रोत्रियजी की कविताओं और उनके जीवन को जनान्दोलनों का अभिन्न हिस्सा बताया और कहा कि श्रोत्रियजी की कविताओं में मुक्तिबोध के बिंब व प्रतीक याद आते हैं जो मनुष्य जीवन की जटिलताओं को व्यक्त करते हैं। उनके कवि कर्म में सारी चीजें जनसंघर्ष से निकल कर आई हैं। वे जुलूस को देखते हुए दर्शक नहीं बल्कि जूझते हुए संघर्षरत योद्धा की तरह नज़र आते हैं। इस घनीभूत पीड़ा में भाषा उनकी कविता के पीछे पीछे आ रही है। उनके तमाम  प्रतीक कलावाद के निषेध में आते हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता इंदौर इप्टा के अध्यक्ष विजय दलाल ने की। इस अवसर पर चुन्नीलाल वाधवानी, विक्रम कुमार, अजय लागू , सुलभा लागू , विश्वनाथ कदम, केसरी सिंह चिढार , सारिका श्रीवास्तव आदि मौजूद थे। संचालन किया प्रलेस इंदौर के श्री एस. के. दुबे ने।

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