साल आया है नया
फटे मोजे,
पाँव की उँगली दिखाई दे रही
साल आया है नया
दुनिया बधाई दे रही!
रोटियाँ ठंडे तवे पर
आग पानी-सी लगे
ज़िंदगी कब तक बताओ
मेहरबानी-सी लगे
बीतकर भी एक बीती धुन
सुनाई दे रही!
दूध-सा फटना दिलों का
साल-भर जारी रहा
हर नशा उतरा चढ़े बिन
सिर मगर भारी रहा
ज़िंदगी फिर बंद घड़ियों को
कलाई दे रही!
आपसी रिश्ते रहे
काई लगी दीवार-से
रह गए हम भुरभुरे
संकल्प की मुट्ठी कसे
उम्र पतली ऊन को
मोटी सलाई दे रही!
लगे उड़ने बहुत सारे सच
हवा में चील से
कई अफ़साने बिना जाने
दिखे अश्लील से
सुबह भी अब
सुबह होने की सफ़ाई दे रही!
मंज़िलों के नाम
उलझे रास्ते ही रह गए
बहुत नन्हे मोड़ भी
बस खाँसते ही रह गए
माँ की खाली पेट
बच्चों को दवाई दे रही!
डबडबाई आँख
हर तारीख को पढ़ती रही
बदचलन-सी सांस
अपनी सांस से लड़ती रही
रात, दिन को देह की,
सारी कमाई दे रही!
गीतकार - यश मालवीय
(आगन्तुकों को नये वर्ष की शुभकामनाऐं। आनेवाले वर्ष को लेकर जो विचार मेरे मन में थे, उनको शब्दों में पिरो कर मेरे प्रिय गीतकार यश मालवीय ने पहले से रख दिया है। मैं उनके इस गीत के साथ नव वर्ष की शुरूआत कर रहा हूँ। - प्रदीप मिश्र)
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Thursday, 1 January 2009
Thursday, 12 June 2008
देवेन्द्र कुमार बंगाली का गीत
एक पेड़ चांदनी
एक पेड़ चांदनी
लगाया है आंगने
फूले तो आ जाना
एक फूल मांगने
ढिबरी की लौ
जैसे लीक चली आ रही
बादल रोता है
बिजली शरमा रही
मेरा घर छाया है
तेरे सुहागने
तन कातिक
मन अगहन
बार-बार हो रहा
मुझमें तेरा कुआर
जैसे कुछ बो रहा
रहने दो यह हिसाब
कर लेना बाद में
नदी झील सागर के
रिश्ते मत जोड़ना
लहरों को आता है
यहां-वहां छोड़ना
मुझको पहुंचाया है
तुम तक अनुराग ने
एक पेड़ चांदनी
लगाया है आंगने
फूले तो आ जाना
एक फूल मांगने ।
( देवेन्द्र कुमार बंगाली का यह गीत आज से 20-22 वर्ष पूर्व जब मैंने सुना था, तब यह भी नहीं जानता था कि इस दुबली – पतली काया मे छिपा हुआ गीतकार हमारे समय के कैनवास का सबसे चमकदार रंग है। फिर मुलाकात हुई और गोरखपुर रेलवे कार्यालय में कार्यरत बंगाली जी से मिलने के लालच में, विद्यालय से छूटने के बाद उनकी साइकिल के पास जाकर खड़ा रहता था। जब वे कार्यालय से निकलते और मुझे देखते तो उनके चेहरे पर फैली मुस्कान से, मैं गीतों को झरते हुए महसूस करता। फिर साइकिल हाथ में पकड़े-पकड़े पैदल चलते-चलते उनके साथ उनके घर तक की यात्रा होती। इस यात्रा के दौरान ही पहली बार जाना कविता-गीत, प्रतीक-विधान, रंगों के अर्थ और नाजुक की ताकत और न जाने कितना ज्ञान उनके मुँह से झरता और मैं बटोरता – बटोरता उनके घर पहुँचता। मुझे नहीं याद है कि कभी बिना चाय पिए उनके घर से लौटा हूँ। एक तरफ मैं डिप्लोमा का छात्र और वे हिन्दी नवगीत के आधार स्तम्भ। फिर भी उनकी सहृदयता और प्रेम ने मेरे ऊपर जादू कर दिया था। उनसे आखिरी मुलाकात जब हुई तो वे रेलवे अस्पताल में थे। डाक्टरों ने बोलने से मनाकर दिया था। मुझे देखते ही उनकी आँखों ने बहुत कुछ कहना शुरू कर दिया। पहली बार अनुभव हुआ कि जुबान से ज्यादा आँखें बोलतीं हैं। मेरे हाथ को पकड़े रहे, जैसे वे अभी जाना नहीं चाहता हैं। अभी बहुत काम बाकी है। खैर उसके बाद मैं राजस्थान नैकरी पर लौट गया। बाद में डा. वशिष्ठ अनूप से सूचना मिली वे नहीं रहे। उनके हाथ की गरमी अभी भी सुरक्षित है मेरे हाथों में। मैंने साहित्य में जो कुछ जाना समझा है, उसका बहुत बड़ी हिस्सा उनका ही दिया हुआ है। उनकी किताब का शीर्षक था - बहस जरूरी है । मैंने इसे अपने जीवन का सूत्र बना रखा। सिर्फ याद .......शायद श्रद्धांजली भी। - प्रदीप)
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