आधी शताब्दी से ज़्यादा दिनों तक
आज़ाद रहने के बाद
मैं जिस जगह खड़ा हूँ
वहाँ की ज़मीन दलदल में बदल रही है
और आसमान गिद्धों के कब्जे में है
लोकतन्त्र की लोक को
सावधान की मुद्रा में खड़ा कर दिया गया है
हारमोनियम पर एक शासक का
स्वागतगान बज रहा है
जब जयगान
तीन बार गा लिया जाएगा
तब बटेंगी मिठाइयाँ
मिठाइयाँ लेकर
जब लोग लौट रहे होंगे घर
झपटे मारेंगे गिध्द
गिध्द शाकाहारी नहीं होते हैं
फिर क्या खायेंगे वे
शुन्यकाल के इस प्रश्न पर
देश की संसद मौन है ।
( 26 जनवरी हमारे लिए श्रेष्ठ उत्सव का दिन है। एक भारतीय होने और नागरिकता बोध के इस उत्सव पर सारे देशवासियों को बधाई। इस समय लोग कश्मीर के लाल चौक पर झण्डावंदन के लिए एक युवा नेता कूच कर गए हैं और इस कूच के कारण जो अशान्ति और समस्याएं जन्म ले रहीं हैं वे भी हम सबके सामने है। यहाँ पर एक बात तो ठीक है कि कश्मीर हमारा अभिन्न अंग है और हमारी आजादी और लोकतंत्र के सम्मान में लाल चौक पर झण्डा फहरना चाहिए। लेकिन जिस तरीके से यह पूरा मूहीस चल रहा है, वह देश और झण्डे का सम्मान कम अपने वोट बैंक की राजनीति ज्यादा दिख रहा है। हमारे देश की राजनीति को का दृष्टि मिलेगी और कब सारे राजनीतिज्ञ अपने दायित्वबोध को समझेंगे। ऐसा न हो यह स्वप्न भोर से पहले टूट जाऐ। हमें एक ऐसा देश चाहिए जहाँ लोकतंत्र और नागरिक बहैसियत रहते हों। खैर एक मेरी समसामयिक कविता दिख गयी सो लगा दिया। पढ़ें और विचार दें।- प्रदीप मिश्र, दिव्याँश ७२ए सुदर्शन नगर, अन्नपूर्णारोड, इन्दौर-४५२००९ (म.प्र), भारत.,फोन ०९१-०७३१-२४८५३२७, मो. ०९४२५३१४१२६, मेल – mishra508@yahoo.co.in, )