Friday, 29 July 2011


अंधेरे के खिलाफ सूरज -  डा. कमला प्रसाद

                                                                                                                                    -प्रदीप मिश्र


हिन्दी साहित्य के वर्तमान परिदृश्य में बहुत कम ऐसे व्यक्तित्व उपस्थित हैं। जो लेखन के साथ-साथ संगठन के स्तर पर भी उतनी ही मजबूती से जुटे हों। कमलाप्रसाद जी का नाम इस तर ह के व्यक्तित्वों पहली पंक्ति में रखा जा सकता है। इन्दौर आने के बाद उनसे पहचान हुई।

            उन दिनों मैं और अरूण आदित्य मिलकर भोरसृजन संवाद नामक पत्रिका निकालने की योजना बना रहे थे। सम्पादक मंडल में उनको रखना चाहते थे। इस संदर्भ में उनको पत्र लिखा। यह पत्र ही संभवतः हमारे नाम का पहला परिचय था। एकदम से नए नाम के युवा सम्पादकों के पत्र के जवाब में,उन्होंने न केवल हमारे प्रस्ताव को स्वीकार किया, बल्की जवाब मे एक लंबा पत्र लिखा। इस घटना ने उनके प्रति हमारे मन में सम्मान को और भी बढ़ा दिया। जहाँ बड़े-बड़े लेखकों की प्रतिक्रियाऐं संशय भरी और हतोत्साहित करनेवाली थीं। वहाँ पर कमला प्रसाद जी ने संबल दिया। उसके बाद  खूब खतोकिताबत हुए और उन्होंने बहुत सारा मार्ग निर्देशन दिया।  हमलोगों ने पत्रिका निकाली उसके जो भी अंक निकले, हिन्दी साहित्य के जनपद में उनका स्वागत हुआ।


            अचानक एक दिन उनका बच्चों के शादी निमन्त्रण पत्र आया। यह भी हमारे लिए सामान्य बात नहीं थी। जिससे अभी तक रूबरू मुलाकात भी नहीं हुई, उन्होंने आमन्त्रण भेजा। जब शादी में सम्मिलित होने गया तो देखा हिन्दी पट्टी के सभी तरह का साहित्यकार उपस्थित थे। न केवल साहित्यकार बल्की जो लोग मैदानों में उतकर सीधा-सीधा उपेक्षित वर्ग के उत्थान के सक्रिय थे, उनकी फौज वहाँ उपस्थित थी। यहीं पर पहलीबार मामा बलेश्वर और कुमार अंबुज से मुलाकात हुई। पूरा आयोजन शादी का कम एक बड़ा साहित्यिक आयोजन ज्यादा लग रहा था। वहाँ पर दिन भर साहित्य के और समाज के मूल्यों पर खूब चर्चा होती रही। इतनी सार्थक चर्चाऐं कई बार औपचारिक साहित्यिक गोष्ठियों में भी नहीं होतां हैं। यहाँ तक कि शाम को रसरंजन भी हुआ और साहित्यकारों का रसरंजन  जैसा होता है वैसा ही हुआ। ये पूरी जमात शादी कम साहित्यिक गोष्ठी के तमीज में ज्यादा थी।  खैर शाम को हम उनसे मिलने गए। सब में मैं सबसे छोटा था। अतः थोड़ा संकुचित और दूर -दूर था । समला प्रसाद जी सामने आए, अच्छा खासा कद। ऊपर की तरफ काढ़े गए ज्यादातर सफेद और कुछ काले बाल। बड़ी आँखें जिनमें बेहतर दुनिया के स्वप्न के लिए पर्याप्त जगह। आवज में बुलंदगी। उनको देखकर मेरे दिमाग में सबसे पहले निराला का ख्याल आया। सोचा निराला ऐसे ही दिखते रहे होंगे। हम सबमें ज्यादातर उनके शिष्य थे। शिष्यों के साथ  उनका पुत्रवत प्रेम साफ झलक रहा था । हम सब लोगों से चर्चा में वे मसगूल हो गए। वहाँ पर भी प्रगतिशील लेखक संघ की गतिविधियों और संगठनात्मक मजबूती पर चर्चा जारी हो गयी। वे भूल गए की उनके यहाँ शादी है। फिर किसी बहुत जरूरी काम के लिए उनके परिवार का कोई सदस्य आया और उनको ले गया।
            उन दिमों वे कला परिषद में थे वसुधा का पुनर्प्रकाशन शुरू हो गया था। कड़ी दोपहरी में हम उनसे मिलने कलापरिषद गए । पहुँचते ही चाय पानी की व्यवस्था के बाद वसुधा की बात हुई। मैंने आग्रह किया कि पाँच कापी मुझे भेज दें। भेजना क्या उन्होंने तुरंत सारी व्यवस्था करके वसुधा की प्रतियों का एक बंडल मेरे साथ लगा दिया। कुछ महीनों तक मैं वसुधा बेचता रहा फिर मेरी अपनी व्यस्तता और लोगों की अरूचि के कारण। वेचना मुश्किल हो गया। मैंने वसुधा के नए अंक न भेजने का निवेदन भी किया लेकिन अंक आने बंद नहीं हुए। वसुधा के बहुत सारे अंक मेरे पास जमा हो गए। जिनका पैसा भी नहीं भेज पाया। इस दौरान एक कार्यक्रम में कमला जी से मुलाकात हो गयी। तो उन्होंने टोका कि तुमने बहुत दिनों से पैसा भी नहीं भिजवाया और मेरे पोस्टकार्ड का जवाब भी नहीं दिया। मैने सच -सच बता दिया कि लोग खरीदना नहीं चाहते हैं और मेरे पास समय नहीं है कि उनको दे कर दस बार पैसा मांगने जाउँ।  मेरी बात उनको अच्छी नहीं लगी। उनकी मेरी बहस हो गयी। उसके बाद वे बोले ठीक है , वसुधा की जितनी प्रतियाँ बची हैं और जी हिसाब बाकी है करके भेज दो। मैंने उनके निर्देशानुसार काम कर दिया और मानकर चल रहा था कि अब उनसे बातचीत बंद ही हो गयी। लेकिन एक कार्यक्रम के दौरान भोपाल में मुलाकात हुई तो फिर वे उसी पुरानी आत्मियता से मिले। एक बार फिर मैं उनके व्यक्तित्व के आगे नतमस्तक हुआ।

            इस तरह से बहुत सारी मुलाकतों की स्मृतियाँ हैं। लेकिन पिछले दो तीन वर्षों से प्रलेश का जो छिछालेदर चल रहा था, उससे वे बहुत आहत थे। हर मुलाकात में वैचारिक आंदोलनों कमजोर पड़ने पर वे चिन्ता व्यक्त कर रहे थे।  अंतिम बार मैं उनसे भोपाल के चिरायु हास्पिटल में  मिला था। वह कद्दावर शरीर पिछले बीस वर्षों की मुलाकात में पहली बार कमजोर और खामोश दिखाई दिए। इस खमोशी को तोड़ती हुई उनकी स्वप्निल आँखों में बहुत सारे स्वप्न अभी भी तैर रहे थे, और पूछ रहे थे कि क्या मेरी मौत के साथ मेरे सपने भी मर जाऐंगे। मर जाएंगी वे सारी उम्मीदें ? हर मिलनेवालों से वे इन सवालों को साझा कर रहे थे। संगठन और वैचारिक आंदोलन  के कार्कर्ता की तरह से उन्होने अपना  पूरा जीवन झोंक दिया और अंतिम समय तक पूरी पीढ़ी तैयार कर गए। जो उनके सपनों को साकार करने में सक्षम है। इसलिए वे हमारे बीच में हमेशा बने रहेंगे। उनका मूर्त सभी युवा साथियों में विधटित हो गया है। अब हम सब के क्रिया कलापों और संधर्षों में कमला प्रसाद जी जीवित हैं। ुनका जीवन और विस्तृत और अमूर्त हो गया है। इस अंधेरे के खिलाफ सूरज में तब्दील हो चुके कमला प्रसाद जी को याद करना, एक वैज्ञानिक समाज के स्वप्न जैसा है।


प्रदीप मिश्र, दिव्याँश ७२ए  सुदर्शन नगर, अन्नपूर्णा नगर, इन्दैर-४५२००९  .प्र
मो. -  ९४२५३१४१२६

Tuesday, 22 March 2011

ये कौन सा दयार है


विचार सिंह घुड़ चढ़े आज वेहद नाराज थे। बार-बार दुष्यंत कुमार की शेर दोहरा हे थे - "सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं / मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए। मुझे देखते ही खूब जोर से चिल्लाए तुम बुद्धी जीवियों ने इस देश को डुबा दिया। जहाँ सोने की चिढ़िया करती थी बसेरा वहाँ अमरीका के कौवे काँव-काँव कर रहे हैं, और चीन की बिल्ली तो बेधड़क घूम रही है। जो बचा खुचा है उसे पकिस्तान के स्यार नोंच रहे हैं। नेता तो अब इस देश में रहे नहीं और तुम बुद्धीजीवी लोग तो सरकारी पुरस्कारों और पूंजीपतियों के अनुदान पर मदहोश  हो। अभी हाल में सुना है कि लेखकों में डालर का घुन भी लग गया है। सबके सब हमारे प्यारे देश को निपटाने में लगे हो। गद्दार हो तुम सब गद्दार।" कहते ह्ए वे गुटके की पीक थूकते हुए अपनी साइकिल पर सवार हुए और मेरा जवाब सुने बगैर आगे बड़ गए। मुझे समझ में आ रहा था। अभी - अभी हमने अपने गण तंत्र का ६२ वां उत्सव मानाया है और विचीर सिंह जी हर १५ अगस्त और २६ जनवरी के १५ दिन पहले से एक महीने बाद तक  अत्यंत उत्साहित रहते हैं। इस दौरान वे आजादी से लेकर अभी तक की पूरी यात्रा के विश्लेषण करते रहते हैं। उनकी नाराजगी हमारे देश की आम जनता की आवाज में होती है। इसलिए उनको गम्भीरता सुनना जरूरी होता है। आज भी वे जो कुछ कह कर गए उसमें दम तो था। सचमुच दिन प्रतिदिन हम अपने सोरकारों से मुक्त होते जा रहे हैं। क्या गणतंत्र दिवस का मतलब सिर्फ इतना ही है कि डोर का खिंचना और झण्डे का फहर जाना। सैल्युट दागना और भाषणबाजी करना और फिर पार्टी-सार्टी  कर लेना। यहाँ पर एक सवाल और खड़ा होता है कि क्यों होनी चाहिए इन राष्ट्र त्यौहारों पर छुट्टियाँ ? क्या जब इन छुट्टियों को बारे में निर्णय लिया गया होगा उसके पीछे यही पार्टी-सार्टी , पिकनिक-सिकनिक था या कुछ और ? कम से कम इन उत्सवों पर हम सबको अपना भी मूल्यांकन करना चाहिए कि हम कितने नागरिक बचे और पिछले वर्षभर में बतौर नागरिक जो जिम्मेदारियाँ अपने देश के प्रति थीं, उनको किस हद तक हम निभा पाए ?  मुझे लगता है कि इस कटघरे में अगर खड़ा करें तो सबसे ज्यादा संदेहास्पद स्थिती हमारे समय के बुद्धीजीवियों की होगी। खैर यह सब सोचता हुआ मैं यादव के पान ठेले पर पहुँचा ही था और गुटके का डोज लेकर मुँह में डाला ही था कि विचार सिंह जी वापस पहँच गए। लगभग लड़खड़ते हुए साइकिल को स्टैण्ड पर लगाए और झूमते हुए मेरे पास आए और मेरी आंखों में आँख डलकर पूछा - "क्यों जनाब कुछ समझ में आया। बहुत बड़े कवि बने फिरते हो ना  तो सुनों मंगलेश डबराल ने क्या लिखा है- एक सरल वाक्य बचाना मेरा उद्देश्य है /मसलन कि हम इंसान हैं /मैं चाहता हूँ इस वाक्य की सच्चाई बची रहे / सड़क पर जो नारा सुनाई देरहा है /वह बचा रहे अपने अर्थ के साथ /मैं चाहता हूँ निराशा बची रहे /जो फिर से उम्मीद पैदा करती है /अपने लिए  /शब्द बचे रहें /जो चिड़ियों की तरह कभी पकड़ में नहीं आते /प्रेम में बचकानापन बचा रहे /कवियों में बची रहे थोड़ी सी लज्जा....." इस बार वे पूरी ताकत से खड़े रहे और मेरी आँखों में आँख डालकर मेरे जवाब का इन्तजार कर हे थे और मेरे अंदर चन्द्रकांत देवताले की पंक्तियाँ गुँज रही थी- एक दिन मांगनी होगी हमें माफी।
mishra508@gmail.com

Tuesday, 25 January 2011

गिद्ध शाकाहारी नहीं होते


आधी शताब्दी से ज़्यादा दिनों तक
आज़ाद रहने के बाद
मैं जिस जगह खड़ा हूँ
वहाँ की ज़मीन दलदल में बदल रही है
और आसमान गिद्धों के कब्जे में है

लोकतन्त्र की लोक को
सावधान की मुद्रा में खड़ा कर दिया गया है
हारमोनियम पर एक शासक का
स्वागतगान बज रहा है

जब जयगान
तीन बार गा लिया जाएगा
तब बटेंगी मिठाइयाँ
मिठाइयाँ लेकर

जब लोग लौट रहे होंगे घर

झपटे मारेंगे गिध्द

गिध्द शाकाहारी नहीं होते हैं
फिर क्या खायेंगे वे
शुन्यकाल के इस प्रश्न पर
देश की संसद मौन है

( 26 जनवरी हमारे लिए श्रेष्ठ उत्सव का दिन है। एक भारतीय होने और नागरिकता बोध के इस उत्सव पर सारे देशवासियों को बधाई। इस समय लोग कश्मीर के लाल चौक पर झण्डावंदन के लिए एक युवा नेता कूच कर गए हैं और इस कूच के कारण जो अशान्ति और समस्याएं जन्म ले रहीं हैं वे भी हम सबके सामने है। यहाँ पर एक बात तो ठीक है कि कश्मीर हमारा अभिन्न अंग है और हमारी आजादी और लोकतंत्र के सम्मान में लाल चौक पर झण्डा फहरना चाहिए। लेकिन जिस तरीके से यह पूरा मूहीस चल रहा है, वह देश और झण्डे का सम्मान कम अपने वोट बैंक की राजनीति ज्यादा दिख रहा है। हमारे देश की राजनीति को का दृष्टि मिलेगी और कब सारे राजनीतिज्ञ अपने दायित्वबोध को समझेंगे। ऐसा न हो यह स्वप्न भोर से पहले टूट जाऐ। हमें एक ऐसा देश चाहिए जहाँ लोकतंत्र और नागरिक बहैसियत रहते हों। खैर एक मेरी समसामयिक कविता दिख गयी सो लगा दिया। पढ़ें और विचार दें।-  प्रदीप मिश्र, दिव्याँश ७२ए सुदर्शन नगर, अन्नपूर्णारोड, इन्दौर-४५२००९ (म.प्र), भारत.,फोन ०९१-०७३१-२४८५३२७, मो. ०९४२५३१४१२६, मेल – mishra508@yahoo.co.in, )

Monday, 24 January 2011

डॉ0 विनायक सेन की सजा के खिलाफ


(हमारे देश की प्रशासनिक व्यवस्था की क्रूरता और राजनीतिक पार्टियों द्वारा उनके दुरूपयोग का ज्वलंत उदाहरण डॉ. विनायक सेन प्रकरण हैं। लोकतांत्रिक मूल्यों का उपहास , देश का अपमान है। जिसे कोई भी सजग नागरिक स्वीकार नहीं करेगा। हम सब इसका विरोध कर रहे हैं। देश के हर हिस्से का बुद्धीजीवी इसका विरोध कर रहा है। इस संदर्भ में इन्दौर में भी विरोध दर्ज हुआ। आज भी स्थानीय शहीद भवन में एक विरोध प्रस्ताव रखा गया है, जिसमें नगर के सारे बुद्धीजीवी एकत्रित होंगे। फिलहाल यहाँ पर देश के दूसरे हिस्से में हुए विरोध प्रदर्शनों की रपट दी जारी है। इसको अशोक पाण्डेय के ब्लाग से मारा है। मुझे लगता है, इस प्रकरण में देश के हर सजग नागरिक को शामिल होना चाहिए। इस उद्देश्य से अपने पाठकों के लिए यहाँ पर दे रहा हूँ - प्रदीप मिश्र)

छत्तीसगढ़ की निचली अदालत द्वारा विख्यात मानवाधिकारवादी व जनचिकित्सक डॉ0 विनायक सेन को दिये उम्रकैद की सजा के खिलाफ तथा उनकी रिहाई की माँग को लेकर जन संस्कृति मंच (जसम) की ओर से 2 जनवरी 2011 को लखनऊ के शहीद स्मारक पर विरोध प्रदर्शन व सभा का आयोजन किया गया। इसके माध्यम से लखनऊ के लेखकों, संस्कृतिकर्मियों, नागरिक अधिकार व जन आंदोलनों से जुड़े कार्यकर्ताओं ने विनायक सेन की सजा पर अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि इस तरह का फैसला हमारे बचे.खुचे जनतंत्र का गला घोटना है, यह नागरिक आजादी और लोकतंत्र पर हमला है। इसलिए विनायक सेन की रिहाई का आंदोलन लोकतंत्र को बचाने का संघर्ष है।


प्रदर्शनकारी लेखकों व कलाकारों के हाथों में प्ले कार्ड्स थे जिनमें सीखचों में बन्द विनायक सेन की तस्वारें थीं और उन पर लिखा था ‘कॉरपोरेट पूँजी का खेल, विनायक सेन को भेजे जेल’,विनायक सेन को रिहा करो’ आदि। इस अवसर पर जन कलाकार परिषद के कलाकारों ने शंकर शैलेन्द्र का गीत ‘भगत सिंह इस बार न लेना काया भारतवासी की, देशभ्क्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फाँसी की’ और दुष्यन्त की गजल ‘हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए’ गाकर अपना विरोध जताया।

जन संस्कृति मंच द्वारा आयोजित इस विरोध प्रदर्शन के माध्यम से माँग की गई कि डा0 विनायक सेन को रिहा किया जाय, आपरेशन ग्रीनहंट व सलवा जुडुम को बन्द किया जाय, छत्तीसगढ़ जनसुरक्षा कानून और इसी तरह के अन्य जन विरोधी कानूनों को खत्म किया जाय और इन्हीं कानूनों के तहत उम्रकैद की सजा पाये नारायण सन्याल और पीयूष गुहा को रिहा किया जाय।

इस विरोध प्रदर्शन में जनवादी लेखक संघ, एपवा, पी यू सी एल, इंकलाबी नौजवान सभा, अलग दुनिया, आइसा, दिशा, अमुक आर्टिस्ट ग्रुप, आवाज आदि के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इस मौके पर हुई विरोध सभा को रामजी राय, अजय सिंह, शिवमूर्ति, ताहिरा हसन, गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव, रमेश दीक्षित, सुभाष चन्द्र कुशवाहा, राजेश कुमार, के0 के0 पाण्डेय, भगवान स्वरूप कटियार, चन्द्रेश्वर, वंदना मिश्र, के0 के0 वत्स, कल्पना पाण्डेय, बी0 एन0 गौड़, सुरेश पंजम, आदियोग, बालमुकुन्द धूरिया, अनिल मिश्र ‘गुरूजी’, विमला किशोर, जानकी प्रसाद गौड़, के0 के0 शुक्ला, महेश आदि ने सम्बोधित किया। सभा का संचालन जसम के संयोजक कौशल किशोर ने किया

वक्ताओं ने कहा कि जिन कानूनों के आधार पर विनायक सेन को सजा दी गई है, वे कानून ही कानून की बुनियाद के खिलाफ हैं। इनमें कई कानून अंग्रेजों के बनाये हैं जिनका उद्देश्य ही आजादी के आंदोलन को कुचलना था। आज उन्हीं कानूनों तथा छŸाीसगढ़ में लागू दमनकारी कानूनों का सहारा लेकर विनायक सेन पर राजद्रोह व राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने की साजिश का आरोप लगाया गया है और इसके आधार पर उन्हें सजा दी गई है। गौरतलब है कि अपने आरोपों के पक्ष में पुलिस द्वारा जो साक्ष्य पेश किये गये, वे गढ़े हुए थे और अपने आरोपों को सिद्ध कर पाने वह असफल रही है। अगर इन आरोपों को आधार बना दिया जाय तो लोकतांत्रिक विरोध की हर आवाज पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया जा सकता है।

वक्ताओं ने इस बात पर गहरी चिन्ता व्यक्त की कि न्यायालयों के फैसले भी राजनीतिक होने लगे हैं। भोपाल गैस काँड और अयोध्या के सम्बन्ध में आये कोर्ट के फैसले ने न्यायपालिका के चेहरे का पर्दाफाश कर दिया है। विनायक सेन के सम्बन्ध में आया फैसला नजीर बन सकता है जिसके आधार पर विरोध की आवाज को दबाया जायेगा। अरुंघती राय पर भी इसी तरह की धारायें लगाकर मंकदमा दर्ज किया गया है। इस प्रदेश में भी सामाजिक कार्यकर्ता सीमा आजाद को एक साल से जेल में बन्द रखा गया है।

वक्ताओं का कहना था कि जब भ्रष्टाचारी, घोटालेबाज, माफिया व अपराधी सरकार को सुशोभित कर रहे हों वहाँ आदिवासियों, जनजातियों को स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराने जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए संघर्ष करने तथा सलवा जुडुम से लेकर सरकार के जनविरोधी कार्यों का विरोध करने वाले डॉ सेन पर दमनकारी कानून का सहारा लेकर आजीवन कारावास की सजा देने का एक मात्र मकसद जनता के प्रतिरोध की आवाज को कुचल देना है। इसीलिए आज विनायक सेन प्रतिरोध की संस्कृति और इंसाफ व लोकतंत्र की लड़ाई के प्रतीक बन गये हैं।

जसम के इस प्रदर्शन के माध्यम से यह घोषणा भी की गई कि डा0 विनायक सेन की रिहाई के लिए विभिन्न संगठनो को लेकर रिहाई समिति बनाई जायेगी तथा यह समिति विविध आंदोलनात्क कार्यक्रमों के द्वारा जनमत तैयार करेगी।
- कौशल किशोर

Saturday, 11 December 2010

कॉमरेड लागू को लाल सलाम

ख्वाब मरते नहीं
मरने का मतलब क्या होता है? कोई मर गया, माने क्या मर गया? क्या मेरे दिल में उसके लिए जो इज्जत थी, वो मर गई? क्या उसके लिए, मेरे कॉमरेड के लिए मेरा प्यार मर गया? क्या उसके शिद्दत से किए गए कामों की यादें मर गयीं? क्या उसकी मेहनत, उसका श्रम और उससे हुए कारनामे मर गए? एक नायक की तरह जी गयी जिंदगी की वो सारी छाप क्या बगैर निशान छोड़े मिट गयी? क्या ये सब खत्‍म हो गया? मैं जानता हूँ कि उसका जो बेहतरीन है, वो मेरे भीतर कभी नहीं मरेगा। मुझे लगता है कि हम ये मानने की हड़बड़ी में रहते हैं कि ‘वो नहीं रहा।' इसी हड़बड़ाहट में हम ये भी जल्द भूल जाते हैं कि अगर हम एक इंसान की जिंदगी की जिंदादिली, सच्चाई की जीत के लिए उठायी गयीं उसकी बेतहाशा तकलीफों और उसकी खुशियों को स्मृति से ओझल न होने देना चाहें, तो वो कभी नहीं मरता। हम भूल जाते हैं कि हर चीज जिंदा दिलों में जिंदा रहती है।
मक्सिम गोर्की की ‘माँ' से

क्सर जया अपने अज्जी-अब्बू को याद करते हुए एक अफ्रीकी कहावत का जिक्र करती है कि जब तक किसी को कोई न कोई याद करने वाला रहता है, तब तक उस इंसान की जिंदगी पूरी तरह खत्म नहीं होती। कॉमरेड अनंत लागू ने इन अर्थों में कई लोगों को उनके निधन के बाद भी जीवित रखा, उनकी यादों को जीवित रखकर। और जब वे खुद इस दुनिया से गये तो अपने आपको अनेक दिलों और जिंदगियों में थोड़ा-थोड़ा बाँट कर गये। लागूजी के निधन के एक-दो महीने पहले ही प्रभु जोशीजी ने कहा था कि विनीत तुम कॉमरेड अनंत लागू का एक इंटरव्‍यू दूरदर्शन के लिए कर दो। मैं लागू जी से मिला तो उन्हें बताया कि प्रभु जोशी ऐसा चाहते हैं। मेरे ऐसा कहते ही उनकी मस्ती की जगह एक संकोच आ गया और वे अपने ही भीतर सिमट गये। कुछ बोले नहीं, बस मुस्‍कुरा दिये। उस मुस्‍कुराहट को मैं पहचानता हूँ। वैसी मुस्कान 87 बरस की उम्र में भी बच्चे सी ईमानदारी के साथ कॉमरेड अनंत लागू की और उनकी छः दशक पुरानी दोस्त पेरीन दाजी की पहचान रही है। ये लोग वैसे चहक-चहक कर किस्से दर किस्से सुनाते जाएँगे लेकिन जैसे ही आपने कहा कि कॉमरेड ये तो बहुत बड़ा कारनामा है, ये तो जरूरी इतिहास है, इन्हें तो रिकॉर्ड करना चाहिए, वैसे ही वो अपने आप में एक संकोची और बेहद विनम्र मुस्‍कुराहट के पीछे छिप जाते हैं।
बहुत कम लोग ऐसे हैं जो किसी पद की वजह से विद्वान मान लिए जाते हैं और वाकई में भी वे विद्वान होते हों। उनमें भी लागूजी जैसे लोग तो और भी दुर्लभ जिन्होंने अपने भीतर तमाम ज्ञान होने के बावजूद अपने आपको कभी किसी के भी सामने महत्त्वपूर्ण जाहिर नहीं किया। न केवल जाहिर नहीं किया बल्कि सच में कभी माना भी नहीं। प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ाव के समय से ही मैं उन्हें देखता आ रहा था, लेकिन उनसे नजदीक से मिलने और उन्हें नजदीक से जानने का अवसर संदर्भ केन्द्र की गतिविधियों की सक्रियता के साथ ही हुआ था।

जब तक वे स्वस्थ रहे तब तक पहले तो अपनी छोटी सी दुपहिया पर ही कार्यक्रमों में और मीटिंगों में पहुँचते रहे। बाद में भी संदर्भ की मीटिंगों में कभी शिन्त्रे जी तो कभी, श्रोत्रिय जी या उनकी दिशा में रहने वाले किसी न किसी का साथ लेकर और अगर कोई साथ नहीं मिला तो आटो रिक्शा करके भी आते रहे। प्रगतिशील लेखक संघ की मीटिंगों में कभी देवतालेजी के घर, बाद में निलोसेजी के घर भी वे अनेक दफा आये। और ऐसा भी नहीं कि आकर उन्हें कुछ मशविरा देना या अपनी उपस्थिति का अहसास करवाना जरूरी ही हो, कई बार डेढ़-दो घंटे की पूरी मीटिंग में सिर्फ सुनकर, बगैर कुछ भी बोले वे वापस लौट जाते थे। जो पुराने लोग थे या जिन्हें लागूजी या देश, प्रदेश या शहर में कम्युनिस्टों के संघर्षों की कुछ जानकारी थी और मध्यवर्गीय साहित्य, कविता, कहानी के पार जमीनी लड़ाइयों के प्रति कुछ सम्मान था, वे ही लागूजी की सहज चुप्पी के पीछे छिपी गंभीरता का मर्म समझ पाते थे, बाकी तो अनेक के लिए वे सिर्फ एक बुजुर्ग उपस्थिति भर रहते थे और लागूजी को इससे कोई ऐतराज भी कभी नहीं रहा। उनका स्‍वभाव सहज स्वीकार का था। वे अपने आपको कभी किसी पर थोपते नहीं थे।
जब संदर्भ केन्द्र की गतिविधियाँ तेज हुईं तो वे अक्सर संदर्भ पर आया करते थे। तभी उनके घर मेरा भी जाना-आना शुरू हुआ। संदर्भ और नौजवान फेडरेशन के साथी आनंद शिन्त्रे के वो नाना भी थे और इप्टा व नाटकों में सक्रिय अजय के पिता भी, तो शुरू में उनसे सहज संकोच रहता था लेकिन इस संकोच को खुद कॉमरेड लागू ने और रहा-सहा आनंद व अजय ने भी तोड़ा। आनंद अक्सर उनसे कॉमरेड संबोधन से ही बात करता था। उनकी उपस्थिति में एक वरिष्ठ की गरिमा रहती थी लेकिन भारीपन हर्गिज नहीं।
तमाम दफा उन्होंने मुँहजबानी कुसुमाग्रज की कविताएँ, शंकराचार्य के श्‍लोक और लोक शाहीर अमर शेख के पोवाड़ा, अन्ना भाऊ साठे के किस्से सुनाये। मुझे साहित्य से राजनीति में दाखिला पाने वाला समझकर वो सोचते थे कि मैं ने तो इन सब के बारे में, और इनका लिखा हुआ पढ़ा ही होगा जबकि मेरे लिए बस इन सबके नाम ही जाने पहचाने थे।
कॉमरेड लागू सब सुना कर फिर जैसे चैतन्य होते हुए कहते थे कि तुम्हें तो ये सब मालूम ही होगा, और मैं संकोच में हाँ-हूँ कर देता था। पहली दफा जब मैंने उन्हें किसी मसले पर गंभीरता से लंबी व्याख्या में दाखिल होते देखा, वो वक्‍त था संदर्भ केन्द्र की एक गोष्ठी का जिसमें लागूजी ने मुंबई की कपड़ा मिल मजदूरों की यूनियन व कम्युनिस्ट पार्टी में 1920 के दशक की हड़ताल के दौरान अम्बेडकर व कॉमरेड डाँगे के मतभेदों की वजहों पर रोशनी डाली थी।
जया को तो वे बहुत प्यार से हमेशा ही ये बताते थे कि तुम्हारी माँ को 1 मई 1975 को मैंने ही पार्टी का मेंबर बनवाया था। तुम्हारी माँ बहुत जबर्दस्त महिला थीं........... और फिर उनके किस्से शुरू हो जाते थे कि कैसे 40 के दशक में होलकर कॉलेज के भीतर स्‍टूडेंट फेडरेशन में वे इन्‍दु मेहता, जो तब इन्‍दु पाटकर थीं, और जया के पिता आनंदसिंह मेहता के संपर्क में आये और फिर वो संबंध लगातार बना रहा। हर बार जया उनसे मिलकर कहती कि कॉमरेड लागू से मिलकर लगता है कि मेरे अज्जी और अब्बू यहीं नजदीक ही हैं।
उनके जन्मदिन पर एक बार जया ने उन्हें एक शर्ट उपहार में दी तो बहुत खुश हुए। उसके चंद रोज बाद ही कपड़ा मिल मजदूरों पर डॉक्‍यूमेंट्री बनाने के सिलसिले में हम उनका इंटरव्यू करने गये। तस्लीम और मैं कैमरा संभाल रहे थे और जया उनसे सवाल कर रही थी। चलते इंटरव्यू के बीच अचानक याद आयी बात से बीच में ही बोले, देखो मैंने तुम्हारी गिफ्ट की हुई शर्ट पहनी है। दो पल तो हमें लगा कि शायद इंटरव्यू से संबंधित ही कोई बात है। जब हम समझे और हमने कैमरा रोका तब तक वे वापस अपनी याददाश्त के रास्ते पर सधे कदमों से बढ़ चले। उस दिन उन्होंने पार्टी का इंदौर में बनना और रानीपुरा में 1946 में मजदूरों के जुलूस पर गोली चलना, मौशीबाई का मजदूरों की लड़ाई को समर्थन देना, भगवानभाई बागी का लाल झण्डे का गाना और भी तमाम 60-65 बरस पुरानी बातें इतनी साफ याद्दाश्त के साथ बतायीं कि सन ही नहीं तारीखें भी उन्हें याद थीं। तब भी उनकी उम्र 83-84 की तो रही ही होगी, लेकिन याद्दाश्त ऐसी कि मानो कल की ही बात सुना रहे हों। तभी उनसे ये सुनकर मुझे रोमांच हो आया था कि कम्युनिस्ट पार्टी का जब मध्य प्रदेश (तत्कालीन मध्य भारत) में गठन हुआ तो इंदौर में बाकायदा पार्टी की सदस्यता के लिए इंटरव्‍यू लिये गये थे।
याद्दाश्त उनकी आखिर तक बिलकुल दुरूस्त थी। इसी बरस की होली के दिन शाम को जया ने कहा कि चलो कॉमरेड लागू से होली मिलने चलते हैं। तब दाजी काकी (पेरीन दाजी) भी जया के घर पर ही थीं। वो बोलीं कि मैं जो किताब दाजी पर लिख रही हूँ, उसमें मुझे कुछ तारीखें और बातें धुँधली सी ही याद आ रही हैं, उनके बारे में सही-सही लागू साहब ही बता सकते हैं, तो मैं भी चलती हूँ। हमारी साथी सारिका भी तैयार हो गयी और मेरी पत्नी अनु और बेटा कार्तिक भी। कॉमरेड दशरथ को भी फोन करके बुला लिया। सब लोग बगैर किसी पूर्व सूचना के जा धमके लागू जी के घर। उनकी बहू सुलभा घर पर ही थी, लागूजी भी थे और इत्तफाक से भोपाल जा बसे सुलभा के पिता और पुराने कॉमरेड श्रोत्रियजी भी आये हुए थे। हम सब को आया देखकर कॉमरेड लागू बहुत खुश हुए। फिर चलीं आजादी के पहले की, आजादी के बाद की, हड़तालों, गिरफ्तारियों, संघर्षों, कामयाबियों और नाकामियों की बातें। उनसे बातें करना किसी एन्साइक्‍लोपीडिया को कहीं से भी पढ़ने जैसा आनंद और ज्ञान देता था।
लागू जी की जबर्दस्त याद्दाश्त के किस्से अनेक हैं। कपड़ा मिलों या मजदूर राजनीति से संबंधित इंदौर की कोई पुरानी जानकारी की तस्दीक करनी हो तो नईदुनिया से भी लागूजी को फोन किया जाता था। उनकी याद्दाश्त का आलम ये था कि जब 2005-2006 में प्रलेसं के संस्थापक बन्ने भाई उर्फ सज्जाद जहीर का जन्म शताब्दी वर्ष हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में मनाया जा रहा था तो उसी कड़ी में इंदौर में आयोजित कार्यक्रम में उनकी बेटी नूर जहीर को हमने बुलाया था। कार्यक्रम में लागूजी भी आये थे। कार्यक्रम के दौरान हमने नूर जहीर से लागूजी का परिचय करवाया तो अपनी बेटी की तरह आशीर्वाद और प्यार देने के बाद लागूजी ने बन्ने भाई की एक नज्म नूर जहीर को सुनाते हुए कहा कि ये बन्ने भाई ने (मुझे याद नहीं कि उन्होंने कौन सा सन्‌ बताया था लेकिन मेरे ख्‍याल से पचास के दशक का कोई सन था) किसी सभा में सुनायी थी जिसमें लागूजी भी शरीक हुए थे। नूर के चेहरे पर हैरत, ताज्‍जुब और खुशी के मिले-जुले जज्बात थे। वो बोलीं कि इस नज्म का ये हिस्सा कहीं मिल नहीं रहा था और इन बुजुर्गवार को पचास-साठ बरस पहले की मुँहजबानी सुनी नज्म अब तक याद है। ये सुनकर लागूजी हमेशा की तरह संकोची मुस्‍कुराहट के पीछे सिकुड़ गये।
23 सितम्‍बर 1922 को महाराष्ट्र के सांगली जिले में जन्में श्री अनंत लागू अध्ययन के लिए 1937 में अपनी मौसी के पास ग्वालियर आ गये थे। गुलामी के हालात और अंग्रेजों की हुकूमत उनकी बेचैनी और कुछ कर गुजरने का शुरुआती सबब बने। देश की आजादी के लिए उनका युवा खून खौलने लगा। जोश और जज्बातों के साथ जो उनके पारंपरिक पारिवारिक संस्कारों को आकर्षित करने वाला संगठन लगा, वो था उस वक्त ग्वालियर में सक्रिय राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ। वहाँ उनके साथी थे श्री गोरे, जो बाद में मेजर गोरे के नाम से जाने गए और कुशाभाऊ ठाकरे।
वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़कर दरअसल देश की आजादी के संघर्ष का हिस्सा बनना चाहते थे लेकिन जल्द ही उनकी समझ में आ गया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का देश सिर्फ हिंदुओं का देश है। एक दफा मैंने उनसे पूछा कि फिर आप आर.एस.एस. से अलग क्यों हुए, तो बोले कि उनके पास मेरे इस सवाल का कोई जवाब नहीं था कि इंसान इंसान का शोषण क्यों करता है ?
ग्वालियर का एक किस्सा लागू साहब बहुत उत्‍साह से सुनाते थे। सन 1940 की घटना थी। वे वहाँ कॉलेज में पढ़ते थे और जैसा कि वो दौर था, आजादी के आंदोलन में कुछ कर गुजरने का जोश उनमें भी उछालें मारता था। शायद दूसरों से थोड़ा ज्यादा ही, क्योंकि वे पहलवानी भी करते थे। तो एक दिन अंग्रेज सरकार की तरफ से कॉलेज में कुछ ऐसे कार्यक्रम का फरमान आ गया जिससे देश की इज्‍जत की परवाह करने वाले इन नौजवानों को अपमान महसूस हुआ। उन नौजवानों ने तय किया कि कार्यक्रम के पहले की रात में कॉलेज के अंदर विरोध के तौर पर परचे-पोस्‍टर तो चिपकाये ही जाएँ, साथ ही कॉलेज के भीतर फहराने वाले दासता के प्रतीक यूनियन जैक को भी उतार लिया जाए और कॉलेज प्रांगण में लगी जॉर्ज पंचम की मूर्ति को भी कुछ सबक सिखया जाए। मौके के इंतजार में ये लोग कॉलेज बंद होने के पहले कॉलेज में ही छिप गये। रात में पोस्‍टर वगैरह चिपकाने के बाद जब खम्‍भे पर से यूनियन जैक उतार लिया तो लागूजी और उनके साथियों ने उसे फाड़कर उसकी लंगोट बनायी और उसे पहनकर झंडे के खंभे पर मलखम्‍भ किया। जॉर्ज पंचम की मूर्ति के नाक-कान भी तोड़ लिये गए।
किसी भेदिये की करतूत से लागूजी और उनके साथियों का नाम कॉलेज के प्रिंसिपल के पास तक पहुँच गया। लागूजी को जानने वाले जानते हैं कि उन्हें गुस्‍से में या आपा खोते शायद ही कभी किसी ने देखा हो। वो अपनी बात पर दृढ़ रहते हुए भी लहजे में सख्‍त या अभद्र कभी नहीं होते
ग्वालियर में आर.एस.एस. से जुड़ने के बाद बहुत जल्द ही उसकी नफरत और पूर्वाग्रही विचारधारा की वजह से उससे विमुख होने लगे थे। आर.एस.एस. के किसी बड़े पदाधिकारी की ग्वालियर यात्राा के दौरान स्‍थानीय नेताओं ने उससे लागूजी की शिकायत की कि लागू आजकल कम्युनिस्ट विचारधारा के असर में जा रहा है। उन्होंने लागूजी की थाह लेने के लिए विशेष बैठक के लिए बुलाया। लागूजी बताते थे कि उस बैठक के बाद मेरे दिल में ये बात और पुख्‍ता हो गयी कि मेरे सवालों के जवाब आर.एस.एस. या हिन्‍दू महासभा के पास नहीं हैं, और न ही इन लोगों को मनुष्‍य द्वारा मनुष्‍य के शोषण की वजहों की कोई समझ है।
कॉमरेड लागू ने स्‍टेंसिल काटने और छापने की कला ग्वालियर में ही सीख ली थी। इससे वो और उनके साथी अंग्रेजों के खिलाफ परचे बनाकर विक्‍टोरिया कॉलेज और अन्‍य जगहों पर चिपकाया करते थे। एक बार तो किसी अध्‍यापक ने उनके हाथ में स्‍याही देख कर उन पर शक कर ही लिया था कि कॉमरेड लागू के भोले चेहरे को देखकर उनके बहाने पर यकीन कर उन्हें छोड़ दिया।...तो उनके अंग्रेज प्रिंसिपल मिस्‍टर एम. ए. इंगिलश ने (प्रिंसिपल का नाम वो खासतौर पर याद करके दो बार बताते थे) ने उनके विनम्र लहजे से धोखा खाते हुए उन्हें लालच दिया कि तुम तो बहुत सभ्‍य और शरीफ हो, अगर तुम बाकी लोगों के खिलाफ गवाही दे दो और बाकियों के नाम बता दो तो तुम्हें कोई सजा नहीं दी जाएगी। उस पर लागूजी ने जो जवाब उस अंग्रेज प्रिंसिपल को दिया, वो न मुझे भूलता है और न उस अंग्रेज प्रिंसिपल मिस्‍टर एम. ए. इंगिलश को कभी भूला होगा। उन्होंने कहा - क्‍या बगैर बदतमीजी किये आप मुझे सजा नहीं देंगे? नतीजा ये हुआ कि वो कॉलेज से बर्खास्‍त हुए। ग्वालियर में तो कहीं पढ़ सकना मुमकिन नहीं रहा था। अंग्रेजी राज विरोधी गतिविधियों में उनकी संलग्‍नता के चलते पुलिस उनके पीछे पड़ी थी और वे पुलिस से बचते हुए ग्वालियर से किसी और रिश्‍तेदार के यहाँ उज्‍जैन पहुँच गए।
इस बीच उनका परिचय कम्युनिस्ट विचारधारा के साथ हुआ जो तर्कप्रिय लागूजी को अपने सवालों का सही जवाब सुझाती महसूस हुई। लगातार अध्‍ययन, मनन और गहन विचार-विमर्श से तथा अंततः साने गुरूजी की सलाह से प्रेरित होकर उन्होंने आर.एस.एस. को पूरी तरह त्‍याग कर वामपंथ की राह अपनायी और अंत तक इस पर एक मजबूत साधक और सिपाही की भाँति डटे रहे।
लागूजी जो बने, उसमें उनके दोस्‍तों, सही मशविरा देने वाले परिजनों और साथी कॉमरेडों की भूमिका निस्‍संदेह महत्त्वपूर्ण थी। ग्वालियर से उज्‍जैन आने पर लागूजी कॉमरेड दिवाकर के संपर्क में आए। वैचारिक तौर पर तो उनका मन व मस्‍तिष्‍क मार्क्‍सवाद से प्रभावित हो रहा था लेकिन तब तक व्‍यावहारिक मार्क्‍सवाद से उनका साबका नहीं हुआ था। ये मौका दिया उन्हें कॉमरेड दिवाकर ने जो उस वक्‍त उज्‍जैन में ही स्‍टेट पीपुल्‍स काँग्रेस के नाम पर कम्युनिस्ट संगठन बनाने का काम कर थे। कॉमरेड दिवाकर ने ही बाद में लागूजी की क्षमता को भाँपकर उन्हें इन्‍दौर भेजा ताकि कपड़ा मिल मजदूरों के बीच कम्युनिस्ट संगठन को मजबूत बनाया जा सके।
जनवरी 1940 से इंदौर से बना उनका रिश्‍ता फिर कभी टूटा नहीं। इंदौर में ही चालीस के दशक में कॉमरेड अनंत लागू को होलकरों के बोराडे़ सरदार घराने की लड़की मालती से पे्रम हुआ और 1943 में मुंबई जाकर उन्होंने शादी कर ली। राजपरिवार से ताल्‍लुक रखने वाली उनकी जीवनसंगिनी ने अपने पति को देश और दुनिया की बड़ी जिम्‍मेदारियाँ निभाने के लिए मुक्‍त किया और खुद पूरी उम्र नौकरी करके बच्‍चों, परिवार और पति की भी जिम्‍मेदारी संभाली। आजादी के पहले और आजादी के बाद भी वे मजदूर आंदोलनों का नेतृत्‍व करते हुए कई बार जेल गये व पुलिस की ज्‍यादतियाँ सहीं, पर अपने दृढ़ कम्युनिस्ट विश्‍वासों से कभी डिगे नहीं।
उनके अध्‍ययन और संगठन की क्षमता को देखते हुए जब तत्कालीन मध्य भारत में पहली बार कम्युनिस्ट पार्टी का गठन हुआ तो 1943 में कॉमरेड लागू सहित कॉमरेड दिवाकर, कॉमरेड लक्ष्‍मण खंडकर, कॉमरेड टेम्‍बे, कॉमरेड उर्ध्‍वरेषे और कॉमरेड वैद्य; सिर्फ इन 6 लोगों को ही तमाम साक्षात्‍कारों के बाद पार्टी की सदस्यता दी गयी थी।
लागूजी ने मुंबई जाकर शादी तो कर ली लेकिन फिर कुछ वक्‍त बाद इंदौर वापस आ गये। नयी-नयी गृहस्‍थी की गाड़ी अपने स्‍वाभिमानी स्‍वभाव के साथ चलाने की कोशिश की लेकिन बहुत मुश्‍किलें आयीं। इंदौर के मिशन अस्‍पताल में पुताई का काम करने लगे। दो-चार दिन ही हुए थे कि किसी ने उन्हें पहचान लिया कि ये तो लागू है, कम्युनिस्ट! और उन्हें खड़े पाँव निकाल दिया गया। नौकरियों से निकालने के किस्से उनके बहुत थे। आज जहाँ राज टॉवर है, उस जमाने में वहाँ रेशम मिल हुआ करती थी। वहाँ वो किसी फर्जी नाम से साँचे चलाने का काम करने लगे। हफ्‍ता मुश्‍किल से बीता होगा कि कारखाने की जाँच के लिए आये लेबर इंस्‍पेक्‍टर की नजर लागूजी पर पड़ गयी और उसने तुरंत सेठ से कहकर लागूजी को बाहर करवा दिया। आज ये माहौल नहीं रहा लेकिन उस वक्‍त में कम्युनिस्ट होना वाकई बहुत बड़े साहस का काम होता था।
आजादी के ठीक पहले द्वितीय विश्‍वयुद्ध के दौरान कपड़ा मिल मजदूरों की तनख्‍वाहों में कटौती, बोनस और ओवरटाइम न देने संबंधी मसले, और विश्‍वयुद्ध खत्‍म होने मजदूरों की छँटनियों के खिलाफ इंदौर में कम्युनिस्ट जोरदार आंदोलन कर रहे थे। सन्‌ 1946 में 12 दिन लंबी चली एक ऐसी ही हड़ताल से परेशान होकर होलकर सरकार ने दमन का शिकंजा तेजी से कसा। तमाम कम्युनिस्ट नेताओं की धरपकड़ का दौर चला और नतीजा ये हुआ कि लगभग सभी वरिष्ठ नेता पकड़कर जेल में डाल दिये गये। सन 1946 में ही होमी दाजी भी कम्युनिस्ट पार्टी के मेम्‍बर बने थे, उसके पहले तक वो छात्रा संगठन में सक्रिय थे। दाजी साहब के बारे में लागूजी अक्सर बताते थे कि दाजी के पढ़े-लिखे होने, उनके लंबे कद और आकर्षक व्‍यक्‍तित्‍व, आक्रामक, चुटीली किन्‍तु तर्कसंगत वक्‍तृत्‍व कला और शोषण के खिलाफ जमीनी कार्रवाइयों की वजह से दाजी मजदूर वर्ग व मध्यम वर्ग दोनों में समान रूप से जल्द लोकप्रिय हो गए। इसलिए 1946 में जब पार्टी के सभी वरिष्ठ नेता गिरफ्‍तार कर लिए गए तो अपेक्षाकृत युवा होमी दाजी को पार्टी और एटक की कमान सौंपी गयी जिसे आगे उन्होंने और बुलंदियाँ दीं।
कॉमरेड दाजी छात्रा संगठन ए.आई.एस.एफ. में थे। उन्हें मजदूर संगठन एटक से जोड़ने और कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्‍य बनाने वाले कॉमरेड लागू ही थे। पेरीन काकी ने लागूजी के निधन पर कहा था, ‘अगर लागू न होते तो दाजी भी न होते।' बाद में कॉमरेड लागू ने ही कॉमरेड दलाल, कॉमरेड सरमंडल, कॉमरेड भगवान भाई बागी, कॉमरेड इंदु मेहता आदि विलक्षण प्रतिभा और प्रतिबद्धता वाले लोगों को संगठन से जोड़ा।
आजादी के बाद भी कम्युनिस्टों के लिए न संघर्ष खत्‍म हुआ था और न ही संकट। नेहरूजी अपनी तमाम प्रगतिशीलता के बावजूद कम्युनिस्टों को और उनकी धारदार ट्रेड यूनियनों को न दबा पाये थे और न ही उन्हें मिश्रित अर्थव्‍यवस्‍था के लुभावने नारे से बहला पाये थे।
आजादी के बाद सारे देश में कम्युनिस्ट पार्टी पर लगे प्रतिबंध हटा लिए गए थे लेकिन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की कलकत्ता काँफ्रेंस (28 फरवरी से 6 मार्च 1948) में पार्टी ने आजाद भारत की बुर्जुआ सरकार के खिलाफ आक्रामक संघर्ष की लाइन अपनायी थी। इस वजह से देश के कई हिस्‍सों में कम्युनिस्ट पार्टी व एटक प्रतिबंधित थी। इन्‍दौर में भी ये प्रतिबंध लागू थे। ये प्रतिबंध इन्‍दौर में भारतीय गणतंत्रा की घोषणा के साथ 26 जनवरी 1950 को खत्‍म हुए। इस दौरान लागूजी सहित सभी कम्युनिस्ट नेता लगातार जेल के अंदर-बाहर होते रहे। लागूजी बताते थे कि अनेक पुलिसवाले और जेलवाले तो उनके साथ बहुत सम्मान से पेश आते थे।
आजादी के पहले और आजादी के बाद कई बार लागूजी गिरफ्‍तार हुए और कई बार पुलिस को उन्होंने चकमा दिया। एक किस्सा वो सुनाते थे कि जब उन्हें गिरफ्तार करने घर पर पुलिस आयी तो वो पीछे की खिड़की से कूदकाद कर पड़ोस के घर में जा पहुँचे जो किसी वोहरा महानुभाव का घर था। पुलिस तलाश करते-करते उन वोहरा सज्जन के घर तक जा पहुँची। उन वोहरा सज्जन ने लागूजी को बुर्का पहनाकर घर की महिलाओं के साथ रसोई में अंदर कर दिया और पर्दा डाल दिया। पुलिस बाकी घर की तलाशी लेकर जब रसोई की तलाशी लेने आगे बढ़ी तो उन सज्जन ने एतराज किया कि हमारे घर की महिलाएँ पर्दे में रहती हैं और आप भीतर दाखिल होकर उनकी बेइज्जती नहीं कर सकते। तब भी पुलिस न मानी तो उन्होंने इसरार किया कि अच्छा, वो बुर्का नहीं हटाएँगी, आप दूर से ही देख लीजिए। पुलिसवाले मान गये और बुर्कानशीं लागूजी गिरफ्‍तार होने से बच गए। अनेक मुस्‍लिमों और वोहरा समुदाय के लोगों से उनके नजदीकी संबंध आखिर तक बने रहे। स्वयं डॉ.असगर अली इंजीनीयर जब भी इन्दौर आते तो संदर्भ केन्द्र पर कॉमरेड लागू, कॉमरेड दलाल, कॉमरेड शिन्त्रे, कॉमरेड श्रोत्रिय, श्री जसबीर चावला आदि जरूर इकट्‌ठे होते। लागूजी के निधन की सूचना जब मैंने डॉ.असगर अली इंजीनीयर को मैसेज के जरिये दी तो तत्‍काल ही उनका फोन आया। उनकी आवाज एक मजबूत और इतने पुराने साथी के जाने के रंज से भीगी हुई थी।
इंदौर में छात्रा आंदोलन को संगठित करने से लेकर शुरू हुई 1940 से उनकी यात्रा लगातार संघर्षों के नये-नये दस्तावेज रचती रही। कपड़ा मिलों के मजदूरों का आंदोलन हो या बैंक, एल.आई.सी., कारखाना कर्मचारियों के मसले, कॉमरेड लागू एक कुशल संगठक की तरह मजदूरों-कर्मचारियों को एकजुट करते गये। जैसी आजादी आयी थी, उसमें जाहिर था कि अंग्रेजों से अपना मुल्क भले हमें मिल गया हो लेकिन गरीबों के हक की लड़ाई अभी दूर तक लड़ी जानी थी। इंदौर में सबसे बड़ी तादाद कपड़ा मिल मजदूरों की थी और अनेक मजदूरों की तो तीसरी पीढ़ी कपड़ा मिलों में काम कर रही थी। उनकी आबादी बढ़ चुकी थी और उनके रहन-सहन का कोई पर्याप्त बंदोबस्त न मिल मालिकों ने किया था, न सरकार ने। इसके साथ ही और उद्योग-धंधों में लगे मजदूरों की छत का भी सवाल था। इन मसलों को लेकर इंदौर के कम्युनिस्टों ने न केवल लड़ाई लड़ी, बल्कि ऐसे उदाहरण कायम किये कि सरकारी अधिकारियों को भी उनकी प्रशंसा पर मजबूर होना पड़ा। कॉमरेड लक्ष्मण खंडकर के नेतृत्व में कॉमरेडों ने इंदौर के मिल मजदूरों को साथ लेकर पूरी तरह कानूनी तौर पर सहकारी संस्था से मिल मजदूरों के लिए सुव्यवस्थित आवास बनवाये। लेकिन हर जगह कानून और सरकार साथ नहीं देने वाले थे, इसलिए मेहनतकश गरीबों-मजदूरों को साथ लेकर अनेक जगह सरकारी जमीनों पर गरीबों के आवास के लिए जमीन पर कब्जा किया गया। लागूजी वैसे तो हर संघर्ष का अहम हिस्सा थे लेकिन सर्वहारा नगर के मामले में कई बार उनकी पुलिस से भी झड़पें हुईं। आखिरकार जब तत्कालीन प्रशासनिक अधिकारी श्री एम.एन. बुच ने सर्वहारा नगर की योजना को लागूजी के साथ देखा-समझा तो उन्होंने न केवल उसे कानूनी हैसियत दिलाने में भूमिका निभायी बल्कि लागूजी की कॉलोनी की योजना और व्यवस्था से प्रभावित होकर प्रशंसा भी की।
आजाद भारत में जनतांत्रिक तरीकों से संघर्ष में विश्वास रखते हुए वे नगर निगम और विधान सभा का चुनाव भी लड़े। चुनावों में हार के बावजूद उनके प्रतिद्वंद्वी उनका सम्मान करते थे और उनकी प्रतिष्ठा को किसी चुनावी हार ने कभी धूमिल नहीं किया। जो काम उन्होंने अपने लिए चुना उसमें कामयाबी-नाकामी से ज्यादा उस काम को ठीक से करना अहम था जिस पर उनका विश्वास था।
जानने वाले बताते हैं कि जवानी के दिनों में लागूजी को उन्होंने साइकल पर पार्टी का साहित्य, अखबार व पुस्तिकाऐं चौराहों पर बेचते देखा था। तब आम मजदूर भी और आम मध्यवर्गीय भी पार्टी का साहित्य गंभीरता से पढ़ा करता था। बाद में भी इंदौर की भीड़-भाड़ भरी सड़कों पर 80 बरस के लागूजी अपने स्कूटर से पार्टी के अखबार ‘मुक्ति संघर्ष', और पार्टी की मराठी पत्रिका ‘युगांतर' आदि के स्थायी सदस्यों को खुद अखबार और पत्रिका पहुँचाया करते थे। इसके पीछे उनका फलसफा ये था कि इस बहाने से पार्टी के कॉमरेडों व हमदर्दों से व्यक्तिगत संपर्क बना रहता है। शायद सन 2004 के आसपास उनका एक्सीडेंट हुआ था जिसके बाद उन्होंने अपना स्‍कूटर चलाना बंद कर दिया था। लेकिन
“जेल रोड पर एक गली में छोटे से कमरे में हम लोग मीटिंग करते थे। बाद में हमने उस गली का नाम ही लाल गली रख दिया था,” एक ने बताया। दूसरे ने तुरंत ही उसमें जोड़ा, “मीटिंग में पहले जाकर झाड़ू लगाते थे, दरी बिछाते थे, माइक लगाते थे और फिर हाथ-मुँह धोकर हममें से ही कोई भाषण दे देता था, कोई अध्‍यक्षता कर लेता था।” ये बातें करने वाले दोनों सज्जन कोई और नहीं, जननेता कॉमरेड होमी दाजी और इन्दौर में कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में से एक कॉमरेड अनंत लागू थे। ये शायद 5 सितंबर 2007 की बात है, जब मैं लागू जी को लेकर दाजी काका के जन्मदिन पर उनके पास आया था। दोनों बुजुर्गों को बोलने में मुश्किल आती थी। दाजी काका की जुबान लकवे के बाद से ऐंठ गयी थी, इसलिए वे जो बोलते थे, उसमें उन्हें काफी ताकत लगती थी, और थोड़ा अतिरिक्त प्रयास सुनने वाले को भी करना पड़ता था। लागू साहब को अस्थमा की शिकायत होने से उन्हें बोलने में और हमें समझने में मेहनत लगती थी। फिर भी दोनों पुराने दोस्त करीब-करीब 60 बरस पुरानी घटनाओं को बिल्‍कुल सहज अंदाज में याद कर रहे थे। उनके झुर्रियों भरे चेहरे के नीचे से झाँकता एक निष्‍कलुष, मासूम और उत्‍साही चेहरा दिख रहा था। हमारी आँखें खुशी के मारे गीली हो रहीं थीं। काकी, यानी कॉमरेड पेरीन दाजी, यानी होमी दाजी की जीवन संगिनी उन दोनों बच्‍चों नुमा बुजुर्गों को खुश होता देखकर हमसे बोलीं  “इनका यही टॉनिक है। तुम लोग आकर दुनिया जहान की बातें करते हो तो ये जिंदगी में रुचि लेने लगते हैं, वर्ना सुस्त रहते हैं।” (‘मजदूरों के संगठित संघर्षों के अपराजित प्रतीकः कॉमरेड होमी दाजी' लेख का अंश )
अक्सर वे फोन पर अखबार की पहुँच की पूछताछ और उसके सुविधानुसार भुगतान की याद दिलाते रहते थे। सुनने में ये काम छोटा लगता है लेकिन यही उस वक्त के कॉमरेड्स की खासियत थी कि उन्होंने जो काम लिया, वो उसे पूरी शिद्दत और जिम्मेदारी से करते थे।
सत्तर वर्षों तक मजदूरों के अधिकारों और इस दुनिया को शोषणविहीन समाज में बदलने के अनथक संघर्ष में लगी रही कॉमरेड अनंत लागू की महायात्रा 3 अप्रैल 2010 को थम गयी। अंग्रेजों के दमन के खिलाफ 1940 से आरंभ किये अपने आंदोलन को आजादी के बाद भी कॉमरेड अनंत लागू ने देश के भीतर मजदूरों व शोषितों के अधिकारों के लिए जारी रखा। इंदौर, अविभाजित मध्य प्रदेश, मध्य भारत में लगातार सक्रिय रहकर उन्होंने कम्युनिस्ट आंदोलन का मजबूत आधार तैयार किया व आखिरी वक्त तक देश के, समाज के आखिरी इंसान की फिक्र करते हुए 87 वर्ष की आयु में इस संसार को अलविदा कहा। उनकी देह, उनके दोस्त कॉमरेड होमी दाजी की ही भाँति कपड़ा मिल श्रमिक क्षेत्रा के श्मशान में अग्नि को समर्पित की गयी। दोनों कॉमरेड्‌स ने अपने जीवन को ही नहीं, अपनी मृत्यु को भी कई मायनों में अनुकरणीय बनाया। आडम्बरों से जीवन भर दूर रहे कॉमरेड लागू ने इसकी हिदायत जीते जी ही दे दी थी कि मेरी मृत्यु के बाद कोई शोकसभा न की जाए। वे शबिदों की जुगाली में नहीं, असल में लोगों को उस रास्ते पर चलते देखना चाहते थे जहाँ उस व्यवस्था का अंत हो जिसमें इंसान ही इंसान का शोषण करता है।
ईमानदारी, प्रतिबद्धता और शोषणविहीन दुनिया का ख्वाब उन्होंने प्रदेश में अनेक युवाओं को विरासत में दिया। उनके शांत व्यक्तित्व के भीतर गहन ज्ञान का सोता बहता था और वे प्रगतिशील लेखक संघ व इप्टा जैसे संगठनों से भी एक दिग्‍दर्शक की तरह सतत जुड़े रहे थे। कॉमरेड लागू ने अपनी देह त्याग दी, लेकिन उनकी सतत संघर्ष की कहानियाँ व लगातार जिंदादिल रहने की उनकी ताकत हमें याद दिलाती रहेगी कि ख्वाब मरते नहीं। .....कॉमरेड लागू को हम सभी का लाल सलाम।
 विनीत तिवारी
मेरी भी आभा है इसमें
नये गगन में नया सूर्य जो चमक रहा है
यह विशाल भूखण्‍ड आज जो दमक रहा है
मेरी भी आभा है इसमें
भीनी-भीनी खुशबू वाले
रंग-बिरंगे
यह जो इतने फूल खिले हैं
कल इनको मेरे प्राणों ने नहलाया था
कल इनको मेरे सपनों ने सहलाया था
पकी सुनहली फसलों से जो
अबकी यह खलिहान भर गया
मेरी रग-रग के शोणित की बूँदें इसमें मुसकाती हैं
नये गगन में नया सूर्य जो चमक रहा है
यह विशाल भूखण्‍ड आज जो दमक रहा है
मेरी भी आभा है इसमें
- नागार्जुन
संदर्भ केन्द्र, इन्दौर
संपर्कः 09893192740] 09425096544] 0731&2566153
bZesy% sandarbhcommune@yahoo.com, comvineet@gmail.com

(मित्रों कॉमरेड लागु को याद रखना और उनके रास्ते पर चलते रहना एक सच्चे मनुष्य की जरूरत है। मेरी उनसे दो-चार मुलाकातें भर हैं। लेकिन मैं उनके व्यक्तित्व का मूरीद रहा हूँ। अचानक विनीत का यह आलेख हाथ लग गया। सोचा आप सब से साझा करूँ। - प्रदीप मिश्र)

Monday, 11 October 2010

विश्व में पहली बार जो भाषा रिकार्ड हुई थी वह संस्कृत थी

HMV had once published a pamphlet giving the history of gramophone record. Gramophone was invented by *Thomas Alva Edison* in the 19th century. Edison, who had invented many other gadgets like electric light and the motion picture camera, had become a legend even in his own time. When He invented the gramophone record, which could record human voice,he wanted to record the voice of an eminent scholar on his first piece. For that he chose Prof. Max Muller. He wrote to him "I want to meet you and record your voice. When should I come?" Max Muller who had great respect for Edison asked him to come on a day when most of the scholars of Europe would be gathering in England. Accordingly, Edison took a ship and went to England. He was introduced to the audience. All cheered Edison's presence. Later at the request of Edison Max Muller came on the stage and spoke in front of the instrument. Then Edison went back to his laboratory and by afternoon came back with a disc. He played the gramophone disc from his instrument. The audience was thrilled to hear the voice of Max Muller from the instrument.They were glad that voices of great persons like Max Muller could be stored for the benefit of posterity. After several rounds of applause and congratulations to Edison, Max Muller addressed the scholars "You heard my original voice in the morning and the same voice in the afternoon. Do you understand what I said in the morning or what you heard in the afternoon?". The audience including many European scholars fell silent because they could not understand the language in which Max Muller had spoken. Max Muller then explained that the language he spoke was *Sanskrit* and it was *Rig Veda*. This was the first recorded public version on the gramophone plate. Why did Max Muller choose this? Addressing the audience he said, "Vedas are the oldest text of the human race. And *Agni Meele Purohitam* is the first verse of Rig Veda. In the most primordial time when the people of Europe were jumping like Chimpanzees, from tree to tree, when they did not know how to cover their bodies, did not know agriculture and lived by hunting and lived in caves, Indians had attained high civilization and they gave to the world universal philosophies 
(यह मेल पुनर्वसु ने अपने पिता को लिखा। कहीं से मुझे मिल गया तो मैंने टीप लिया। आप सबको पढ़ाने को लोभ संवरण संवरण नहीं कर पाया, अतः प्रस्तुत कर रही हूँ। मित्रों पुनर्वसु जोशी अमेरिका के एरिजोना में नैंनों तकनीक पर शोध कर रहे हैं। पिछले दिनों अपने शोध और व्याख्यानों के लिए काफी चर्चित रहें। यह मेंल भी मुझे उनके एक बड़े शोध पत्र की तरह दिखाई दे रहा है। मैं इसे आइने की उन तथा कथित भारतीय विद्वानों को दिखाना चहता हूँ। जो रोज सुबह किसी पाश्चात देश से आयातित आइने में अपना चेहरा देखते गर्व से फूलते हुए बुद-बुदाते हैं- Thanks MOM-DAD you have done great JOB. I am good hybrid. I like hybrid, I love to be hybrid and want to see my next generation more hybrid. कृपया इनको दोगला न कहा जाए।- प्रदीप मिश्र)

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