Saturday, 29 November, 2008

भोर सृजन संवाद अंक छः


नाम : प्रमोद कुमार
जन्म : ३ जनवरी १९५७, बिहार,सीवान जिले, के बिलासपुर गाँव में ।
शिक्षा : बी०एससी०,
सम्प्रति: स्वतंत्र लेखन एवं आई० एस० ओ० कंसलटेंट।
सृजन: पहला लेख १९७२ में। लगभग एक दर्जन लेख प्रकाशित। पहली कविता १९७७ में छपी तब से कविताओं का निरंतर प्रकाशन। रंगकर्म एवं मजदूर आंदोलनों में सक्रिय। १९८४ से जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय परिषद में शामिल तथा जलेस गोरखपुर इकाई के सचिव।
सम्पर्क: क्वार्टर न० ई १२०,फर्टिलाइज़र कालोनी, गोरखपुर-२७३००७
फोन न० ०५५१ २२६१८१५, ०९४५०८८३४१६, ०९४१५३१३५३५
ई मेल- pramodkumarsri@ymail.com,
pramodkumarpkpk@gmail.com

मित्रों इस बार प्रमोद कुमार की कविताएँ आप के सामने हैं। इन कविताओं में हमारा समय धड़क रहा है। इस धड़कन में भविष्य की छवियाँ शामिल हैं। जिनको देखकर एक ऐसा जीवन विवेक अर्जित होता है, जिसके सहारे हम अपनो स्वनों को साकार कर सकते हैं। हॉं,हॉं, हाथी को पढ़ते हुए हमें हमारी भाषा में हो रही सेंधमारी दिखाई देती है, तो बड़े होमवर्क को पढ़ते हुए उन औजारों का पता चलता है जो हमारी अभिव्यक्ति पर घात लगाए बैठे हैं। दिल्ली में तथा अनिवासी भारतीयों का शहर को पढ़तो हुए हम उन अतिक्रमणों से परिचित होते हैं, जो जीना मुहाल कर देंगी। जरा-जरा का जीवन, मेहनत का फार्मूला, मेरा दु:ख तथा एक जेब में कविताओं के माध्यम से कवि उस जीवन शैली की तरफ इशारा करता है, जहाँ विवेकपूर्ण चिन्तन जरूरी हो गया है। एक स्त्री का लिखना कविता तो सचमुच स्त्री विमर्श में बड़े कैनवास की कविता है।
प्रमोद कुमार की कविताओं को पढ़ना अपने समय के साथ संघर्षरत जीवन से परिचित होना है। उनके संवेदना संसार में समाज के सारे कोने-अंतरे अपने अस्तित्व के साथ उपस्थित होते हैं और ऐलान करते हैं, कि हम हैं तभी यह दुनिया इतनी खूबसूरत है। लगभग दो संग्रह भर की कविताओं को प्रकाशन के बाद और लगातार कई दशकों से हिन्दी कविता में अपनी उपस्थिती दर्ज करवाते रहने के बाद भी अगर प्रमोद कुमार की कविताओं का संकलन हमारे बीच में नहीं है तो यह हमारी साहित्य बिरादरी में व्याप्त सत्तात्मक प्रवृतियों का नाकारात्मक प्रभाव ही है। हमें इन नकारात्मक प्रवृत्तियों से बचना चाहिए और इमानदारी से अच्छे को अच्छा कहने की ताकत रखनी चहिए। अपने समय और समाज को पूरी इमानदारी से प्रस्तुत करती इन कविताओं के साथ आपके सामने भोर का छठवा अंक है। समय की किल्लत में यह चिन्दी भर जुगाड़ आपके सामने है। आप सबकी प्रतिक्रियायें हमारा मार्गनिर्देशन करेंगी। - प्रदीप मिश्र

हॉं,हॉं, हाथी !

हाथी, हाथी !
हाथी को पास से देखने-समझने का उत्साह,

उमंग में बच्चे चारों ओर उछलते-कूदते,
हाथी को सुंघ लेते बूढ़े
बोलने लगते बच्चों-से,

एक दिन एक भविष्य-वक्ता
अंधी-बहरी मुद्रा में
घुस आया इलाके में
और डॉंटते हुए बोला-नो !
नो, नो ! हाथी नहीं, एलिफैंट देखो,

बच्चों के पास हाथी थे
लेकिन उन्हें देखना था एलिफैंट,

बच्चे खड़े हो गये सावधान की फौजी मुद्रा में,
बूढ़ों का बचपन सो गया
पेट बॉंधकर,
वहॉं से हाथी निकल गया तेजी से,

वहॉं से एलिफैंट बार- बार गुजरा
लेकिन, उन बच्चों के जीवन में
हाथी फिर कभी नहीं आया ।

बड़े होमवर्क

अब नहीं उगते सरकंडे
तुम नहीं गढ़ सकते
अपनी लिखावट सुधारने वाली कलम,
तुम्हें बाजार की कलम से लिखना हैं
और बचानी हैं अपनी लिखावट,

घर बहुत छोटा हो गया
दादा दादी नहीं अंट सकते तुम्हारे साथ
तुम नहीं सुन सकते उनसे कोई कहानी,
तुम्हें वही देखना हैं जो दिखता है टी.वी. पर
और रचनी है अच्छी कहानी ।

दिल्ली में

कुछ बच्चे हँस रहे हैं दिल्ली में
आए गये होंगे किसी गाँव से
या बिहार से,

यहाँ लान में उगाये
बढ़ाये और छाँटे जाते हैं पेड़
और फुटपाथ पर आदमी

चलने में इतना सम्हलना पड़ता है कि
रास्ते में छूट जाता है अपना रास्ता,
घर से घर लेकर निकला आदमी
बाज़ार से सिर पर बाज़ार लादे
लौटता है
पहचान नहीं पाते अपने बच्चों को।



अनिवासी भारतीयों का शहर

गोरखपुर बहुत पीछे है लखनऊ से
लखनऊ दिल्ली से
दिल्ली बहुत पीछे अमेरिका से,

ओह, यह शहर इतना पीछे है
और हमें बहुत आगे जाना है अमेरिका तक,
बड़ी बेचैनी है
यही बेचैनी है यहॉं

एक यह बेचैनी चला रही है शहर को
इसे दूर करने में कोई कुछ भी करे
स्वीकार है इसे,

जल्द से जल्द कोई तकनीक लाओ
स्कूल से अस्पताल तक
घर से बाजार तक
सारे रास्ते खोलो कि
कोई बड़ा रास्ता निवेश हो,
घट सके समय
अमेरिका पहुंचने का,

यह शहर उमस से अपने भीतर भरा है
लोग खरोच रहे अपनी चमड़ी से पहचान के दागों को
पपड़ी-सी नोंच रहें स्मृतियॉं,

चौबीसों घंटे सारे अंग व्यस्त हैं
यहॉँ खुली आँखें वहाँ देख रहीं
पॉंव उसके आकाश में चल रहे

उसके गठरों में सारे हाथ बँधे हैँ

यहाँ जो ठहाके हैं
वहाँ के ठहाके हैं
रुदन जो सुनायी दे रही
वहीं की है

इस शहर के तड़पते कैलेण्डर में
जो चमकीले चिन्ह हैं
वे वहॉं के उत्सव हैं

मित्रों,रोज पसरता
यह शहर
उन लोगों का एक छोटा शहर है
जो इस देश में रहते हुए
अनिवासी भारतीय हैं ।

जरा-जरा का जीवन

कहीं कोई आदमी देखा
बना काम भर
जरा-सा आदमी,

दानवो के बीच
जरा-सा दानव,
दर्शकों में जरा-सा दर्शक
खेलों में जरा-सा खिलाड़ी,

मंदिरों में जरा-सा आस्तिक
गोष्ठियों में जरा-सा नास्तिक,
देश के लिए जरा-सा नागरिक
अखबारों में जरा-सा समाचार,

बच्चों के लिए जरा-सा पिता
औरत के लिए जरा-सा मर्द,
जरा-सा व्रत, जरा-सा प्रसाद,

इस जरा-जरा से मिला
एक बहुत लम्बा
जरा-जरा का जीवन


एक स्त्री का लिखना
उसे सादे कागज कम
पहले से लिखे-लिखाये अधिक दिये गये ,

अभ्यास के लिए बार-बार
उसे दो अक्षरों का पति दिया गया
यह तो कलम का अपना मिजाज था
और उसकी अंगुलियों का उत्साह भी , कि
अभ्यास के लिए दिया गया घर भी कम पड़ गया

उसे दोहरी मेहनत पड़ी
वह पहले से लिखे को मिटाती
फिर अपना लिखने की
कुछ जगह बनाती ।

मिटाने-बनाने के जोर में
कहीं-कहीं तो कागज सीमा के पार चला जाता
एकदम पतला अगोचर हो जाता कहीं
कहीं एकदम खुरदरा
उस पर स्याही ऐसी पसरती कि
अनेक शब्द दूसरी भाषा के लगने लगते
कहीं-कहीं अनलिखा भी
सबको आर-पार दिख जाता ,

अगर आपको उसका लिखना
और लिखा हुआ समझना है तो
लिखने का उसका यह इतिहास
पहले समझना आवश्यक है


मेहनत का फार्मूला

साइकिल में खाने का डिब्बा बाँधे
चींटियों की-सी कतार में वे आते हैं शहर ।


मकड़ी के जाले-से बिछे शहर के रास्ते
छिन्न-भिन्न कर देते हैं कतार को
वहाँ मशीनों का जनतंत्र
हाथ-पाँव के बहुमत के लिए कभी
मुख्यमार्ग नहीं छोड़ता ।

यहाँ की शुभ लाभ लिखती घड़ियाँ
इनकी ओर उलटी पड़ जाती हैं,
समय पकड़ने की यहाँ की होड़ में
वे दिन भर नाखूनी जाँचों से गुजरते
कददू-सा ताज़ा दिखने की कोशिश में
अपनी सारी भूख को दाँतों से कूँच डालतें हैं,

शहर उन्हें खाने के डिब्बे से
एक पल भी बाहर नहीं आने देता
वह उनके बच्चों से मिली उनकी सारी खुशियों को
अपने इंजन में ईंधन-सा चुआ लेता है
औरतों की दी उनकी छाँह से
अपनी नंगी भट्ठियों पर पर्दा डाल लेता है ,

अपने सवालों के जबाव खोजता
एकटक रास्ता जोहता है उनका परिवार,
अपने लोगों में लौटते हैं वे उन बच्चों की तरह
फार्मूलों के सही प्रयोग के बाद भी
जिनके उत्तर गलत निकल आते हैं ।



एक जेब में

ढोयें कितनी मिट्टी
भर लें कितनी हवा
किस कोने रखें धूप
कैसे बचायें नमी !


अपने किस कोने से झाड़ें
गाँव जाने का किराया
हुक्का-पानी चलाने,
तोड़ें बच्चों के कितने गुल्लक
देशाटन के लिये !

हाथ से फिसलते खेसरा-खतौनी पर
रखें कौन सा पेपर-वेट,
अगली फसल़ के लिये
उजड़ते बखार में सजोयें
कौन से महान बीज,


बापू की तस्वीर के लिये
कच्ची दीवार पर
कितनी गहरी ठोकें सत्यवादी कील
एक सिकुड़ते घर में
बच्चों को कैसे पढायें
फैलते संसार का मानचित्र,
दूर की दिल्ली पर न छोडें
तो किस ज़मीन पर
लगायें अपना प्रिय तिरंगा !


हमारी जेब में
सिकोड़ दी गयीं हमारी जड़ें,
हम क्या पसरें
कैसे फूलें-फलें,
लम्बे-चौड़े आसमान को खोखला न कहें
तो बस ऊपर ताक-ताक
स्वाति की किस बूँद के लिये
छूँछे दुलार को
मानते रहें मोती अपना !


मेरा दु:ख


मेरे अपने दु:ख ने
मुझे संसार भर का दु:ख दिया
इसके लिए
उसने मुझे दिया एक भरा पूरा संसार भी,

मेरा दुख कभी बौना न था
बचपन में ही उसने मुझे चंदा मामा दिया
कभी टूटने वाला खिलौना नहीं दिया,

माँ के दु:ख ने मुझे इंसान बनाया
पिता के दु:ख ने
शैतान होने से रोका
पत्नी के दु:ख ने पैदा की
मेरे भीतर एक बड़ी स्त्री
बदल गया सुख का मापदण्ड,

दु:ख ने मुझे कुछ भी कम नहीं दिया
बिक रही एक लड़की की ऑंखों की चमक ने
उड़ेल दिया मुझ पर पूरे बाजार का दु:ख,
एक हिन्दू के दु:ख ने
खड़ा कर दिया
मुझे मंदिर के मेले में अकेला,

मेरे खेतो में कभी पानी नहीं रुका
चारों ओर उपजे दु:ख ने
नहीं उठाने दी मुझे अपनी मेड़,

मेरे घर में एक ही सुख है
कि यहॉं सबका दु:ख एक है
दु:ख ने घर में एक ही थाली दी
और उस थाली पर
एक साथ बैठा कर
मुझे दिये अनेक भाई ।

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