Sunday, 27 July, 2008

तुम्हे प्यार करते हुए


तुम्हे प्यार करते हुए


तुम्हारे आकाश में
जिद्दी परिंदे की तरह उड़ रहा हूँ
जानता हूँ लौट आना है इस दुनिया में
जिसे मैं चाहता हूँ तुम्हे प्यार करते हुए

यहाँ करोड़ों चीजों के कसमसाने की आवाज
उनके टूटने बिखरने का सिलसिला
बनाता है जगह हमारे बीच
अलग नहीं है तुम्हे प्यार करना
और इस दुनिया में चोट खाकर संभलना
अलग नहीं है हमारे सपने, चाहतें और नाराजगियाँ

तुमसे रूठता हूँ
तब यही आपाधापी में
चेहरों को उलझते मुस्कुराते देख
भर उठता हूँ समुन्द्र की तरह
जैसे तुम्हारे प्यार में

ऐसा भी तो होता है कि
खिलाफ लगने लगता है सबकुछ
तब मिलती हो तुम
उस अंतिम दरख्त की तरह
जहाँ हजारों चिंचियाती चिड़ियाओं से
भर उठती है पृथ्वी

तुम्हे प्यार करते हुए
मैं चाहता हूँ यह पृथ्वी ।


- नीलोत्पल, उज्जैन
- मो. 09826732121


पड़ोस


खारिज हो रही है अब यह धारणा
कि पड़ोस अच्छा होना चाहिए

वक्त जरूरत काम होने पर
मिल जाती है मदद
और परेशानियाँ हो जाती हैं हल
जैसा पहले होता था
धनिया मिर्च और
आलू प्याज से लेकर
रूपये पैसों तक का
हो जाता था लेन-देन

कई बार तो छोटी-मोटी बात पर
झगड़ लेते थे पड़ोसी
सभ्यता और प्रबंधन के
इस महान युग में
अब किसी को किसी से
कुछ भी लेना देना नहीं

न धनिया मिर्च न आलू प्याज
न रूपया पैसा
अब किसी के भी घर
अनायास ही खत्म नहीं होती शक्कर
कि कटोरी लेकर
भागना पड़े पड़ोसी के यहाँ

अब हँसी,प्रेम,गुस्सा,जलन
और झगड़ा भी नहीं रहा पड़ोसियों के बीच
चारो और फैल गया है एक निर्वात
जिसमें छाई है शुष्क उदासीनता और कठोरता

पड़ोस अच्छा होने या न होने से
अब कोई फर्क नहीं पड़ता।


- राजेश सक्सेना, उज्जैन
- मो. न. +919425108734


पिता की मृत्यु पर बेटी का रूदन


आप पेड़ थे और छांव नहीं थी मेरे जीवन में
पत्ते की तरह गिरी आपकी देह से पीलापन लिए
देखो झांककर मेरी आत्मा का रंग हो गया है गहरा नीला
कभी पलटकर देखा नहीं आपने
नहीं किया याद
आप मुझसे लड़ते रहे समाज से लड़ने के बजाय
मैं धरती के किनारे पर खड़ी क्या कहती आपसे
धकेल दी गई मैं, ऐसी जगह गिरी
जहाँ मां की कोख जितनी जगह भी नहीं मिली

आप थे इस दुनिया में
तब भी मेरे लिए नहीं थी धरती
और माँ से धरती होने का हक छीन लिया गया है कब से
छटपटा रही थी हवा में
देह की खोह में सन्नाटा रौंद रहा था मुझे
और अपनी मिट्टी किसे कहूं, किसे देश
कोई नहीं आया था मुझे थामने

जीवन जितना जटिल
कितने छिलके निकालेंगे दुःखों के
उसके बाद सुख क्या भरोसा
कौन से छिलके की परत कब आंसुओं में डुबो दे
हमारी सिसकियों से अपने ही कानों के पर्दे फट जायें
हृदय का पारा कब नाभी में उतर आये

मोह दुश्मन है सबका
मौत आपकी नहीं मेरी हुई है
हुई है तमाम स्त्रियों की
यह आपकी बेटी विलाप कर रही है निर्जीव देह पर

चित्कार पहुंच रही है ब्रह्माण्ड में
जहां पहले से मौजूद हैं कई बेटियों का हाहाकार
और कोई सुन नहीं पा रहा है।

-बहादुर पटेल, देवास म.प्र.
-मो. 09827340666

(पिछले दिनों प्रलेस, इन्दोर इकाई ने तीन युवा कवियो का काव्य पाठ आयोजित किया था। उनकी एक-एक कविताएं आपके लिए भी – प्रदीप मिश्र)

Saturday, 26 July, 2008

हिजाबों से दूर रहने वाला शायर – अहमदफ़राज़


तू खुदा है न मेंरा ईश्क फरिश्तों जैसा
दोनो इन्साँ हैं तो क्यों इतने हिजाबों में मिलें

इन्सान को इन्सान से इन्सान के सलीके से मिलाने की बात करता ये शेर दुनिया के सबसे मशहूर और मकबूल शायरों में से एक अहमद फ़राज़ का है।

१९४७ में भारत को आज़ादी तो मिल गई पर विभाजन की बुरी कीमत पर। अब क्या क्या बाँटा जा सकता था। भूगोल और उसमें बसी आबादी को धर्म और मज़हब के नाम पर अलग कर दिया गया किन्तु आसमान! वो तो आज भी सबका है। ज़रा सरहद पर जाकर देखो, यहाँ से वहाँ का और वहाँ से यहाँ का आसमान बराबर दिखता है। पंछी बिना पासपोर्ट और वीज़ा के सरहद पार करते है। धर्म के आधार पर ज़मीन को बाँट कर दो देश तो बट गऐ पर सौभाग्य से विभाजन के ठेकेदार भाषा, साहित्य और कला के विभाजित नहीं कर पाए। साहित्य किसी भी देश का हो, पैरवी शोषितों की ही करेगा, गुण इन्सानियत के ही गाऐगा, नग्में मुहब्बत के ही गुनगुनाएगा।

आज़ादी के नाम पर बटवारे के बाद भले ही फ़राज़ पाकिस्तान में रह गऐ किन्तु भारतीयों के दिल से नही निकले। बकौल अशोक वाजपेयी -- `उनकी कविता जितनी पाकिस्तानी है उतनी ही भारतीय' (फ़राज़ की शायरी - खानाबदोश में अशोक वाजपेयी की भूमिका से)। सही भी है क्यों कि ऊर्दू तो हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दोनो की साँझी विरासत है। फ़राज़ की शायरी इन्सानी जेहन व रिश्तों की बारिक जटिलता को बडे सलीके से बयान करती है। और जब तक दुनिया कायम है ये मसले ख़त्म नहीं हो सकते। इसलिये फ़राज़ की शायरी प्रासंगिक थी, है और हमेशा रहेगी।

फ़राज़ निरे शायर ही नहीं, लोकतान्त्रिक मूल्यों के कट्टर समर्थक रहे। इसीलिये उन्होने २००४ मे मिला `हिलाले-इम्तियाज़ अवॉर्ड' २००६ में पाकिस्तानी सरकार को वापस लौटा दिया।

अपने फ़न के उस्ताद शायर फ़राज़ इन दिनों गम्भीर रूप से बीमार हैं। उनका शिकागो में इलाज चल रहा है। आइये, हम सब उनके जल्द स्वस्थ होने की शुभकामना करते हुऐ उनकी ये दो गज़लें पढ़ें। ये गज़लें उनकी दस किताबों के एक मुकम्मल संग्रह में छपी अप्रकाशित गज़लों से ली गई हैं।


उम्र गुज़री है कहाँ यूँ ही गुज़ारा हुआ था
वरना जो माल गिरह में था वो हारा हुआ था

ये भी तस्लीम है कि हम दुश्मने जाँ थे अपने
ये भी सच है कि उधर का भी इशारा हुआ था

हमने उस हुस्न के दरिया का तमाशा देखा
वो जो प्यासा भी न था प्यास का मारा हुआ था

पहने फिरती है जिसे नाज़ से लैला-ऐ-बहार१
पैरहन२ वो मेरी जानाँ३ का उतारा हुआ था

हम कि दुश्मन का भी अहसास नहीं भूलते
तू अदावत४ में हमें और भी प्यारा हुआ था

हम जो खुश खुश नज़र आते हैं बहुत गम़ज़दा हैं
तू न आया था तो ये खोल उतारा हुआ था

बाज़ औकात तो महसूस ये होता है `फ़राज़'
जैसे जो वक्त गुज़रता है गुज़ारा हुआ था

१. बहार का मौसम या बहार की जान २. लिबास ३. महबूबा ४. शत्रुता


गुफतगू अच्छी लगी ज़ौके नज़र अच्छा लगा
मुद्दतों के बाद कोई हमसफ़र अच्छा लगा

दिल का दुख जाना तो दिल का मस्अला है पर हमें
उसका हँस देना हमारे हाल पर अच्छा लगा

इस तरह की बे-सरो-सामानियों के बावजूद
आज वो आया तो मुझको अपना घर अच्छा लगा

क्या बुरा था गऱ पड़ा रहता तेरी दहलीज़ पर
तू ही बतला क्या तुझे वो दर--बदर अच्छा लगा

कौन मक्तल में न पहुँचा कौन ज़ालिम था जिसे
तेरे कातिल से ज़ियादा अपना सर अच्छा लगा

हम भी क़ायल हैं वफ़ा-ऐ-उस्तवारी१ के मगर
कोई पूछे कौन किसको उम्र भर अच्छा लगा

`मीर' की मानिन्द गरचे ज़ीस्त करता था `फ़राज़'
हमको वो आशुफ़्ता-खू२ शायर मगर अच्छा लगा

१. स्थायी प्रेम २. पागल, बद-दिमाग

-प्रदीप कान्त, फोन. 0731-2320041
(इन दिनों हमारे अजीम शायर अहमदफ़राज़ बीमार चल रहे हैं। साथी प्रदीप कांत भी शायरी करते हैं। पेश है उनकी कलम से चन्द शब्द -प्रदीप मिश्र
पुनश्च- इस आलेख को अपलोड कर रहा था इसी बीच हिन्दी के वरिष्ट कवि चन्द्रकान्त देवताले का फोन आ गया। बात चीत में उनको जब पता चला कि अहमदफ़राज़ पर आलेख दे रहा हूँ, तो वे बहुत प्रसन्न हुए और अपनी स्मृति का एक कतरा थमा गए -
लगभग दो साल पहल जब मैं साहित्य अकादेमी के एक कार्यक्रम में कविता पढ़ने गया था तो वहाँ पर अहमदफ़राज़ भी बतौर कवि शामिल थे। उनके साथ कविता पाठ एक उत्तेजना भरा अनुभव था । जब वे कविता पाठ कर रहे थे तो ऐसा लग रहा था कि सचमुच एक बड़ा कवि भाषा,देश और सरहद से परे होता है। मैं उनके यथाशीघ्र स्वस्थ होने की कामना करता हूँ।
- चन्द्रकांत देवताले)

Wednesday, 23 July, 2008

हमारे समय से उम्मीद

अभी कल ही संसद की भयानक और शर्मसार करनेवाली कार्यवाही से रूबरू हुआ और आज समय के उम्मीद पर कुछ कहना अत्यन्त कठिन है। क्योंकि हम जिस वर्तमान में जी रहे हैं, उसका भविष्य मनुष्यों का भविष्य नहीं है। कुछ अजीब किस्म की सभ्यता की तरफ बढ़ रहे हैं, जहाँ सामने आता हुआ, मनुष्य रूपयों की शक्ल में दिखाई देगा। जितने का नोट उतनी इज्जत। तकनीकी विकास इतने चरम पर पङुँच जाएगा कि बस्तर के बीहड़ में बैठा हुआ आदिवासी किसान भी इन्टरनेट से खेती की आधुनिकतम तकनीकें डाउनलोड करेगा और अपनी पैदावार दोगुना-तीनगुना कर लेगा। फिर अमेरिका या फ्रांस के किसी मण्डी में बेचकर डालर कमाएगा। मजदूर एयर कण्डीशन्ड वातावरण में काम करते हुए भूल जाएगा कि पसीना क्या होता है। चारो तरफ रूपये ही रुपये बिखरे पड़े होंगे। भविष्य में किसी को लाटरी खुलने की खुशी में दिल का दौरा नहीं पड़ेगा। सामाजिक और नैतिक मूल्यों को मापने का पैमाना भी अत्यन्त आधुनिक तकनिक से निर्मित होगा उसके लिए भी परमाणु करार जैसा कुछ विकास से लबालब करार किसी विकसित देश से हो जाएगा। यहाँ के कस्बे, गांव टोले भी न्युयार्क और लंदन जैसे दिखाई दैंगे। इसलिए चिन्तित होने की कोई जरूरत नहीं है। हम अपनी आंख पर काली पट्टी बाँध कर किसी एयरकण्डीशन्ड कमरे में बैठा दिए गए हैं और हमें बताया जा रहा है कि यह पुरवाई बह रही है। हमें वहां की ठण्डक में सचमुच पुरवाई महसूस हो रही है। अब इससे ज्यादा विकास क्या चहिए।
किसी महानगर में बैठे कुल जमा दस-बारह प्रतिशत अतिआधुनिक समाज के विकास को देखते हुए अगर यह कल्पना किया जा रहा है कि हमारा भविष्य बहुत अच्छा है और हम दौड़ में सबसे आगे हैं, तो यह आत्महत्या का जुगाड़ है। वास्तव में ताकत, अतिचारिता और पैसे के आधार पर निर्धारित हो रहे आज के सामाजिक मूल्य निश्चित रूप से हमें अमरीका और फ्रांस की जीवनशैली तक पहुँचा दैंगे। खरीदने की क्षमता हमारे पास आ जाएगी, लेकिन तब तक हमसे हमारा देश, हमारी भाषा और संस्कृति कितनी पीछे छूट चुकी होगी, इसकी कल्पना दिल दहला देती है। मेरा कहना है कि पूरे विश्व को आज बैठकर सोचना चहिए कि जिस विकास और आधुनिकता की बात हो रही है, जिस उन्नत तकनीक की बात हो रही है और जिस तरह की जीवनशैली का स्वप्न आंखों में बोया जा रहा है। क्या यह सबकुछ सही दिशा में है। क्या विज्ञान का विकास उसी दिशा में हो रहा है, जिस दिशा की कामना के साथ हमने इसे हाथों-हाथ लिया। अगर बहुत जल्दी मूल्यांकन की मानवीयप्रणाली नहीं विकसित हुई तो हमें अफसोस के साथ कहना पड़ेगा कि अपने आज को देखते हुई सिर्फ एक उम्मीद है, कि आत्महत्या को नैसर्गिक मौत की तरह स्वीकार कर लिया जाएगा।
आज के बहुमान्य मूल्यों के आधार पर देखें तो कोई उल्लेखनीय और सुखद उम्मीद नहीं है। लेकिन ऐसा नहीं है कि सबकुछ गड़बड़ ही है, हाशिए पर बैठी कुछ चीजें जो भले ही हाँफ रहीं हैं, लेकिन इस बुरे को अच्छे में बदलने की कुव्वत रखतीं हैं। जब तक अपने खेत में खटते हुए किसान दिखाई दे रहे हैं, माथे से पसीना पोंछते हुए मजदूर दिखाई दे रहे हैं, राजनीति में कुछ पढ़े-लिखे युवा दिखाई दे रहे हैं, समाज में बेचैन और चिन्तित बुद्धिजीवी दिखाई दे रहे हैं और विरोध बचा हुआ है, तब तक बहुत अच्छे भविष्य की कल्पना की जा सकती है। इस संदर्भ में मेरी एक कविता शायद समीचीन हो –
उम्मीद
आज फिर टरका दिया सेठ ने
पिछले दो महीने से करा रहा है बेगार
फिर भी उसे उम्मीद है पगार की

हर तारीख़ पर
कुछ न कुछ ऐसा होता है कि
अगली तारीख़ पड़ जाती है
जज-वकील और प्रतिवादी
सबके सब मिले हुए हैं
फिर भी उसे उम्मीद है
एक दिन जीत जाएगा
अन्याय के ख़िलाफ़ मुकदमा

तीन साल से सूखा पड़ रहा है
फिर भी किसानों को उम्मीद है
बरसात होगी
लहलहाऐंगे खेत

आदमियों से ज़्यादा लाठियाँ हैं
विकास के मुद्दों से ज़्यादा घोटाले
जीवन से ज़्यादा मृत्यु के उदघोष
सेवा से ज़्यादा स्वार्थ
फिर भी वोट डाल रहा है वह
उसे उम्मीद है, आऐंगे अच्छे दिन भी

अख़बार के पन्नों पर नज़र पड़ते ही
बढ़ जाता है चेहरे का पीलापन
फिर भी हर सुबह
अख़बार के पन्नों को पलटते हुए
उम्मीद होती है उन ख़बरों की
जिनके इंतज़ार में कट गए जीवन के साठ बरस

उम्मीद की इस परंपरा को शुभकामनाऐं
उनको सबसे ज़्यादा
जो उम्मीद की इस बुझती हुई लौ को
अपने हथेलियों की आड़ में सहेजे हुए हैं।
प्रदीप मिश्र, दिव्यांश 72ए सुदर्शन नगर, अन्नपूर्णा रोड इन्दौर-452009 (म.प्र.)
मो. 9425314126
(हमारे मित्र श्री अवधेश जी को किसी काम के लिए हमारे समय की उम्मीद पर कुछ विचार चहिए था। लिखा उनके लिए था, लेकिन आप सब भी इस विषय पर कुछ मगजमारी करें। इसलिए यहाँ पर भी- प्रदीप मिश्र)

Sunday, 20 July, 2008

अधिकारी-नेता-कलर्क सबने



मेघराज


(एक)

गृहणियों ने घर के सामानों को
धूप दिखाकर जतना दिया है
छतों की मरम्मत पूरी हो चुकी है
नाले-नालियों की सफाई का
टेंडर पास हो गया है
अधिकारी-नेता-कलर्क सबने
अपना हिस्सा तय कर लिया है
और तुम हो कि
आने का नाम ही नहीं ले रहे हो

चक्कर क्या है मेघराज
कहीं सटोरियों का जादू
तुम पर भी तो नहीं चल गया
क्रिकेट से कम लोकप्रिय तुम भी नहीं हो

आओ मेघराज
तुम्हारे इंतजार में बुढ़ा रही है धरती
खेतों में फसलों की मौत का मातम है
किसान कर्ज और भूख की भय से
आत्महत्या कर रहें हैं

आओ मेघराज इससे पहले कि
अकाल के गिध्द बैठने लगें मुँडेर पर ।

(दो)

मेघराज तुम पहली बार आए थे
तब धरती जल रही थी विरह वेदना में
और तुम बरसे इतना झमाझम
कि उसकी कोख हरी हो गई

मेघराज तुम आए थे कालीदास के पास
तब वे बंजर जमीन पर कुदाल चला रहे थे
तुम्हारे बरसते ही उफन पड़ी उर्वरा
उन्होंने रचा इतना मनोरम प्रकृति

मेघराज तुम तब भी आए थे
जब जंगल में लगी थी आग
असफल हो गए थे मनुष्यों के सारे जुगाड़
जंगल के जीवन में मची हुई थी हाहाकार

और अपनी बूंदों से
पी गए थे तुम सारी आग

मेघराज हम उसी जंगल के जीव हैं
जब भी देखते हैं तुम्हारी तरफ
हमारा जीवन हराभरा हो जाता है

आओ मेघराज
कि बहुत कम नमी बची है
हमारी आँखों में
हमारा सारा पानी पी गया सूरज

आओ मेघराज
नहीं तो हम आ जाऐंगे तुम्हारे पास
उजड़ जाएगी तुम्हारी धरती की कोख।
-प्रदीप मिश्र मो.9425314126

( मित्रों इस समय बरसात के रिमझिम के लिए टकटकी लगाए महाराष्ट्र और म.प्र. के किसानो की आँख पथरा रही है। उनकी आवाज में मैं अपनी कविता को शामिल करने की गरज से यहाँ रखा रहा हूँ। हमारी मित्र मण्डली के प्रदीप कांत ने इस कविता की संवेदना को और गहन करने के लिए विशेषरूप से इस फोटो को उपलब्ध कराया है। प्रदीपकांत राजा रामन्ना प्रगत प्रौद्यौगिकी केन्द्र में युवा वैज्ञानिक हैं। इनकी गजलों का एक संग्रह तैयार है। इन दिनों फोटोग्राफी में हाथ अजमा रहे हैं। फोन. 0731-2320041) )

Friday, 11 July, 2008

मानव सभ्यता का विकास -2

प्राचीन संस्कृतियों में भारत की सिन्धु घाटी की सभ्यता का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है। ``मोहेज्जोदड़ो और सिन्धु घाटी की सभ्यता`` (१९३१) में सर जॉन मार्शल ने लिखा है कि पुरातत्व की खोज से चौथी सहस्त्राब्दी ई. पू. के जीवन का ही पता चलता है ``लेकिन मोहेज्जोदड़ो में ही पहले के और कई नगर एक-दूसरे के नीचे दफनाये पड़े हैं और उन तक अभी फावड़े की पहुँच नहीं हुई।`` सिन्ध और बलूचिस्तान में और नगरों के मिलने की संभावना बतलाई गई है। मार्शल के अनुसार हड़प्पा और मोहेज्जोदड़ो में वैसी संस्कृति मिली हैं, वह काफी दिनों से विकसित होती रही होगी। वह ``भारत की धरती पर काफी रूढ़िगत हो चुकी थी और उसके पीछे कई हजार वर्ष का मानव- श्रम निहित होना चाहिए।`` इससे सिद्ध होता है कि सिन्धुघाटी की संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से है और यदि वह मिस्त्र की संस्कृति से पहले की नहीं है तो उसकी समकालीन अवश्य है। (पृष्ठ ३४-३५)
सिन्धुघाटी की संस्कृति का प्रभाव न केवल भारत पर वरन् अन्य देशों पर भी पड़ा। गॉर्डन चाइल्ड के शब्दों में यहाँ के विज्ञान का प्रभाव पश्चिम के विज्ञान पर पड़ा और इसलिए हमारे लिए वह ``ब्रौंज एज`` की संस्कृति नष्ट नहीं हुई वरन् हमारे न जानते हुए भी उसका काम आगे प्रगति का रहा है। (पृष्ठ ३७)
ऐंगेल्स के अनुसार यह बर्बर अवस्था की तीसरी और ऊँची मंजिल है जो सभ्यता के आरम्भ से घुलमिल जाती है। इस अवस्था की संस्कृति के निर्माण में एशिया की प्रमुख भूमिका है। अफ्रीका और अमरीका में यह संस्कृति विकसित हुई। यूरोप की देन अभी नगण्य है। (पृष्ठ ३७-३८)
इन प्राचीन समाजों के गर्भ में जो श्रम-विभाजन और वर्ग-विभाजन क्रमश: विकसित होता है, वह सामंती समाज की विशेषता है। हमें वर्ग-विभाजन का यह रूप नहीं मिलता कि समाज में एक ओर तो केवल दास हों और दूसरी और दासों के स्वामी हों। युद्ध आदि से दास प्राप्त होते है, उनसे उन्हीं लोगों की शक्ति बढ़ती है जो शेष समाज को यानी अपने सगोत्रियों को निर्धन बनाते जा रहे हैं और पूरे कबीले की अधिकांश भूमि अपने अधिकार में करते जाते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि सम्पत्तिशाली वर्ग के हित में जब राज्यसत्ता का जन्म होता है, त बवह केवल दासों का दमन करने के लिए नहीं होती वरन् समाज के ``स्वतंत्र`` किन्तु निर्धन सदस्यों के विरूद्ध भी उसका उपयोग होता है। (पृष्ठ ३८)
........शेष अगली बार
(हिन्दी साहित्य में रामविलास शर्मा जी को इसलिए हमेशा याद किया जाएगा क्योंकि वे पहले समीक्षक हैं, जिन्होंने हिन्दी समीक्षा को व्यापक अर्थों में सामाजिक मूल्यों से जोड़ा है। न केवल जोड़ा है बल्कि उस पगडण्डी का निर्माण भी किया है, जिसपर भविष्य की समीक्षा को चलना होगा। अन्यथा हिन्दी समीक्षा अपनी दयनीय स्थिती से कभी भी उबर नहीं पाएगी। इस संदर्भ में इन्दौर के राकेश शर्मा ने रामविलास जी पर बहुत गम्भीरता से अध्ययन किया है। वे उनकी पुस्तकों से वे अंश जो वर्तमान समय की जिरह में प्रासंगिक हैं, हमारे लिए निकाल कर दे रहे हैं। हम एक सिलसिला शुरू कर रहे हैं, जिसकी दूसरी कड़ी आपके सामने है, जिसमें रामविलास शर्मा जी की पुस्तक मानव सभ्यता का विकास से निकाले गए अंश हैं। पढ़ें और विचारों का घमासान करें। - प्रदीप मिश्र)

Tuesday, 8 July, 2008

मानव सभ्यता का विकास

मनुष्य ने युगों-युगों तक अपार यातनाएँ सहकर आज की सभ्यता को जन्म दिया है। यातना अधिकांश जनता के भाग्य में पड़ी, उस यातना से सुख उठाना थोड़े-से सम्पत्तिशाली लोगों के हाथ में रहा। यह युग मानव-समाज के विकास में एक विराट परिवर्तन का युग है। शोषण और ध्वंस की शक्तियाँ अपना विनाश सामने देख रही हैं। वे संसार की बहुसंख्यक जनता का नाश करके उस घड़ी को टालना चाहती हैं। शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व और पंचशील के सिद्धांत उन्हें प्रिय नहीं लगते, व्यवहार में प्रतिदिन वे इन सिद्धांतों को तोड़ती हैं। साथ ही स्थायी शांति और शोषणहीन व्यवस्था कायम करने वाली शक्तियाँ अदम्य वेग से आगे बढ़ रही हैं। विजय इन्हीं प्रगतिशील शक्तियों की होगी। वह देश जो दो सौ वर्ष पहले संसार के किसी भी देश से पिछड़ा हुआ न था, शीघ्र ही अपना ऐतिहासिक स्थान प्राप्त करेगा और मानव-सभ्यता के विकास में अपने इतिहास के अनुरूप ही योग देगा। यह विश्वास सामाजिक विकास के वैज्ञानिक अध्ययन से पुष्ट होता है। (पृष्ठ ११)
एक अर्थ में मनुष्य श्रम द्वारा ही पशु से मनुष्य बना है। पशु-अवस्था से निकले हुए मनुष्य को लाखों वर्ष हो चुके और उस अवस्था का ठीक काल-निर्णय करना सम्भव नहीं है। लेकिन पशु-जीवन से निकलते-निकलते उसे लाखों वर्ष लगे होंगे, इसमें संदेह नहीं। उसकी सभ्यता का इतिहास उसके पशुजीवन के इतिहास के समय को देखते हुए बहुत छोटा है। (पृष्ठ १५)
मानव चेतना बाह्य जगत की वस्तुगत सत्ता को ठीक-ठीक नहीं समझती, इसलिए मनुष्य कल्पना करता है कि वह जादू-टोने से, जंतर-मंतर से या आगे चलकर योग-बल से, उसे इच्छानुसार बदल लेगा। (पृष्ठ २२)
मातृसत्ताक गोत्रों में किसी व्यक्ति की अपनी वस्तुएँ उसके न रहने पर उसके मामा, भांजे और भाई पाते हैं। उसकी अपनी संतान उन्हें नहीं पाती। नारी की वारिस उसकी अपनी संतान, उसकी बहने और उसकी बहनों की सन्तान होती है। इस तरह गोत्र की उत्पत्ति गोत्र में ही रहती है। मातृसत्ताक विरासत का यह ढंग बहुत दिनों तक प्राचीन मिस्त्र में चलता रहा जहाँ राज परिवार में बहन-भाई इसलिए शादी करते थे कि अपने गोत्र की सम्पत्ति बाहर न जाय। (पृष्ठ २३)

इस संस्कृति के विनाश का श्रेय यूरोप की ``सभ्यता`` को है। अमरीकी आदिवासियों के विनाश का इतिहास अच्छी तरह प्रकट करता है कि यूरोप के लुटेरे वहाँ किस तरह की सभ्यता फैलाने गये थे। इसमें सन्देह नहीं कि यूरोप निवासी वहाँ न पहुँचते तो पेरू और मेक्सिको के लोग सभ्यता की अगल मंजिलों की तरफ बढ़ते। फॉस्टर ने ठीक लिखा है कि इनमें शासक वर्ग और राज्यसत्ता के निर्माण के लक्षण मिलते हैं। अज्तेक और इंका लोगों ने दूसरे कबीलों को जीत कर अपना राज्य-विस्तार किया था और उन कबीलों से दास, सैनिक, नरमेध के लिए बलि प्राप्त करते थे। फॉस्टर ने लिखा है, ``जब स्पेन के लोग अमरीका पहुँचें, तब दिखता है कि इंका और अज्तेक लोग वैसे ही समाज का विकास करने में लगे हुए थे, जैसे प्राचीन ग्रीस और रोम के लोग।`` इससे सिद्ध होता है कि सामाजिक विकास के नियम अमरीकी आदिवासियों पर वैसे ही लागू होते हैं जैसे यूरोप के ``सभ्य आर्यों`` पर। (पृष्ठ ३२)
ईसा से लगभग पाँच हजार साल पहले मिस्त्र की प्राचीन संस्कृति का विकास हुआ। नील नदी की बाढ़ के कारण यहाँ की उर्वर धरती में जिस संस्कृति का विकास हुआ, उसका गहरा असर भुमध्यसागर के प्रदेशों पर पड़ा। यह प्राचीन संस्कृति बर्बर और अर्ध-बर्बर अवस्था की है। लोहे के औजार बनना अभी शुरू नहीं हुए। तांबा और कांसा मुख्य धातुएँ हैं। खेती (अर्थात् बागववनी) पहले हाथ से होती थी, फिर कुदाल को जुए से बाँधकर कर्षण द्वारा ``कृषि`` होने लगी। बागों के बदले क्षेत्रों को जोत-बो कर ``खेती`` होने लगी। जुए में बँधा हुआ कुदाल हल बना और बैल उसे खींचने लगे। इस तरह मनुष्य ने पशुओं के योग से अपने श्रम और उत्पादन की शक्ति बढ़ाई। (पृष्ठ ३२-३३)
........शेष अगली बार
(हिन्दी साहित्य में रामविलास शर्मा जी को इसलिए हमेशा याद किया जाएगा क्योंकि वे पहले समीक्षक हैं, जिन्होंने हिन्दी समीक्षा को व्यापक अर्थों में सामाजिक मूल्यों से जोड़ा है। न केवल जोड़ा है बल्कि उस पगडण्डी का निर्माण भी किया है, जिसपर भविष्य की समीक्षा को चलना होगा। अन्यथा हिन्दी समीक्षा अपनी दयनीय स्थिती से कभी भी उबर नहीं पाएगी। इस संदर्भ में इन्दौर के राकेश शर्मा ने रामविलास जी पर बहुत गम्भीरता से अध्ययन किया है। वे उनकी पुस्तकों से वे अंश जो वर्तमान समय की जिरह में प्रासंगिक हैं, हमारे लिए निकाल कर दे रहे हैं। हम एक सिलसिला शुरू कर रहे हैं, जिसकी पहली कड़ी आपके सामने है, जिसमें रामविलास शर्मा जी की पुस्तक मानव सभ्यता का विकास से निकाले गए अंश हैं। पढ़ें और विचारों का घमासान करें। - प्रदीप मिश्र)

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