Saturday 4 October 2014

मंगलयान की मंगलमय यात्रा
                                                                  -प्रदीप मिश्र

भारत नें मंगलयान को सफलता पूर्वक प्रक्षेपित करके पूरी दुनिया को अपनी वैज्ञानिक क्षमता के सामने हतप्रभ कर दिया है। आज हम इस महत्वपूर्ण उपलब्धि को समझने का प्रयास करेंगे। सबसे पहले मंगल ग्रह का एक संक्षिप्त परिचय जान लेते हैं। जिसके बारे संस्कृत शास्त्रों में कहा गया है।
धरणीगर्भसंभूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम् |
कुमारं शक्तिहस्तं तं मङ्गलं प्रणमाम्यहम्||
अर्थात
धरती के गर्भ से जन्म लेनेवाले,
जो विद्युत के समान कांन्तिवान हैं,
जो युवा हैं और हाथ में भाला लिए हुए हैं
ऐसे मंगल को मैं प्रणाम करता हूँ।
मंगल ग्रह के बारे में इस तरह के बहुत सारे श्लोक भारतीय जीवन के दैनंदिनी में प्रचलित हैं। भारतीय जनमानस में मंगल ग्रह वैदिक काल से ही चिह्नित है। सिर्फ भारत ही नहीं विश्व के अनेक देशों में मंगल चिर परिचित है।
भारतीय मंगलयान यात्रा पर चर्चा करने से पहले आइए मंगल के बारे में पूर्व में हुए खोजों, अभियानों और तथ्यों पर एक नजर डाल लेते हैं। खगोल अध्ययनों के अनुसार मंगल सौरमंडल में सूर्य से चौथा ग्रह है। पृथ्वी से इसकी आभा रक्तिम दिखाई देती है, जिस वजह से इसे "लाल ग्रह" के नाम से भी जाना जाता है। सौरमंडल में ग्रह दो प्रकार के होते हैं – एक "स्थलीय ग्रह" जिनमें ज़मीन होती है और दूसरे "गैसीय ग्रह" जिनमें अधिकतर गैस ही गैस होती है। पृथ्वी की तरह, मंगल भी एक स्थलीय धरातल वाला ग्रह है। इसका वातावरण विरल है। इसकी सतह की बनावट पृथ्वी के ज्वालामुखियों, घाटियों, रेगिस्तान और ध्रुवीय बर्फीली चोटियों की याद दिलाती है। हमारे सौरमंडल का सबसे अधिक ऊँचा पर्वत, ओलम्पस मोन्स मंगल पर ही स्थित है। अपनी भौगोलिक विशेषताओं के अलावा, मंगल का घूर्णन काल और मौसमी चक्र भी पृथ्वी के समान हैं। यहाँ पर गुरूत्वाकर्षण बल 3.71 मीटर प्रति सेकण्ड स्क्वायर है। इसके सतह का क्षेत्रफल 14.48 करोड़ किलोमीटर स्केवायर है। इसकी त्रिच्या 3390 किलोमीटर है। सूर्य से इसकी दूरी लगभग 22.79 करोड़ किलोमीटर है तथा पृथ्वी से यह लगभग 65 करोड़ किलोमीटर है। आज तक के प्रमुख मंगल अभियानों को संक्षिप्त रूप से देखें तो-
मंगल ग्रह की पहली सफल उड़ान १४-१५ जुलाई १९६५ को नासा द्वारा भेजी गई मेरिनर ४ थी। १४ नवम्बर १९७१ को मेरिनर ९, पहला अंतरिक्ष यान बना जिसने परिक्रमा के लिए मंगल की कक्षा में प्रवेश किया। दो सोवियत यान, २७ नवम्बर 1971 को मार्स २ और ३ दिसम्बर 1971 को मार्स ३ ने मंगल की सतह पर सर्वप्रथम सफलतापूर्वक कदम रखा, परन्तु उतरने के चंद सेकंडों के भीतर ही दोनों का संचार बंद हो गए। १९७५ में नासा ने वाइकिंग कार्यक्रम की शुरूआत की, जिसमें दो कक्षीय यान शामिल थे, प्रत्येक में एक एक लैंडर थे और दोनों लैंडर १९७६ में सफलतापूर्वक मंगल का धरती पर उतरे थे। वाइकिंग १ छः वर्ष के लिए औरवाइकिंग २ तीन वर्ष के लिए परिचालक बने रहे। वाइकिंग लैंडरों ने मंगल के जीवंत परिदृश्य प्रसारित किये जिनके चित्र आज भी वैज्ञानिकों को मंगल ग्रह के बारे में शोध हेतु सहायता प्रदान कर रहे हैं।
मंगल पर प्रक्षेपित अंतरिक्ष यानों में ज्यादातर या तो दो-तिहाई अभियान पूरा होने या फिर शुरुआत में ही किसी ना किसी तरीके से विफल हो गए। अभियान की विफलता के लिए आमतौर पर तकनीकी समस्याओं को जिम्मेदार माना जाता है । 

 इतनी सारी असफलाताओं के बाद धरती पर बैठे वैज्ञानिकों को यह तो समझ में आ गया कि मंगल और धरती में बहुत समानता है और वहाँ पर भी जीवन होने की पूरी संभावना है। साथ ही यह भी प्रमाणित हुआ कि यह कार्य अत्यंत कठिन है। जिसमें हाथ डालना यानि असफलता को आमंत्रित करना है। लेकिन भारत सरकार को अपने वैज्ञानिकों पर पूरा भरोसा था अतः 3 अगस्त 2012 को (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केन्द्र) जिसे संक्षिप्त में इसरो कहते है की मंगलयान परियोजना को स्वीकृति दे दी गयी। इसके लिये 2011-12 के बजट में ही धन का आवंटन भी किया गया । भारत के अंतरिक्ष वैज्ञानिक अपने लक्ष्य को साधने में लग गए। उनके सामने एक चुनौती तो मंगल पर पहुँचने की तकनीकी जटिलता की थी ही, साथ ही उनको यह भी अहसास था कि वे एक विकासशील देश के नागरिक हैं। जहाँ आर्थिक सीमाएं भी हैं। भारतीय वैज्ञानिकों ने देशी तकनीक विकसित करके और गुरूत्वाकर्ष बल का उपयोग करके अपेक्षाकृत कम ईंधन के खर्च पर चलने वाली योजना का निर्माण किया। इसे कहना जितना आसान है, वास्तव में घटित करना उतना ही कठिन। आखिर वह दिन भी आया जब भारतीय वैज्ञानिकों ने मंगलयान के 300 दिन का यात्रा की घोषणा कर दी।
5 नवंबर 2013 को मंगलवार के दिन में दोपहर भारतीय समय अनुसार 2:38 पर श्रीहरिकोटा (आंध्र प्रदेश) के सतीश धवन अन्तरिक्ष केन्द्र से ध्रुवीय प्रक्षेपण यान पीएसएलवी सी-25 द्वारा मंगलयान को प्रक्षेपित किया गया। 3:20 अपराह्न के निर्धारित समय पर पीएसएलवी-सी 25 के चौथे चरण से अलग होने के उपरांत यान पृथ्वी की कक्षा में पहुँच गया और इसके सोलर पैनलों और डिश आकार के एंटीना ने कामयाबी से काम करना शुरू कर दिया था।
5 नवम्बर से 01 दिसम्बर 2013 तक यह पृथ्वी की कक्षा में घूमता रहा तथा कक्षा (ऑर्बिट) सामंजस्य से जुड़े 6 महत्वपूर्ण प्रचालन या ऑपरेशनों को पूरा किया। इसरो की योजना पृथ्वी की गुरुत्वीय क्षमता का भरपूर इस्तेमाल करके मंगलयान को पलायन वेग देने की थी। यह काफी धैर्य का काम था और इसे छह किस्तों में 01 दिसम्बर 2013 तक सफलता पूर्वक पूरा कर लिया गया। आइए इस क्रम को थोड़ा विस्तार से जाने।
7 नवंबर 2013 को भारतीय समयानुसार एक बजकर 17 मिनट पर मंगलयान की कक्षा को ऊँचा किया गया। इसके लिए बैंगलुरू के पी‍न्‍या स्थित इसरो के अंतरिक्ष यान नियंत्रण केंद्र से अंतरिक्ष यान के 440 न्‍यूटन लिक्विड इंजन को 416 सेकेंडों तक चलाया गया जिसके परिणामस्वरूप पृथ्‍वी से मंगलयान का शिरोबिन्‍दु (पृथ्‍वी से अधिकतम दूरी पर‍ स्थित बिन्‍दु) 28,825 किलोमीटर तक ऊँचा हो गया, जबकि पृथ्‍वी से उसका निकटतम बिन्‍दु 252 किलोमीटर हो गया।
11 नवंबर 2013 को नियोजित चौथे चरण में शिरोबिन्‍दु को 130 मीटर प्रति सेकंड की गति देकर लगभग 1 लाख किलोमीटर तक ऊँचा करने की योजना थी, किंतु लिक्विड इंजिन में खराबी आ गई। परिणामतः इसे मात्र 35 मीटर प्रति सेकंड की गति देकर 71,623 से 78,276 किलोमीटर ही किया जा सका। इस चरण को पूरा करने के लिए एक पूरक प्रक्रिया 12 नवम्बर को सुबह 0500 बजे पुनः दोहराई गई। और 12 नवंबर 2013 को एक बार फिर मंगलवार मंगलयान के लिए मंगलमय सिद्ध हुआ। सुबह 05 बजकर 03 मिनट पर 303.8 सेकंड तक इंजन दागकर यान को 78,276 से 118,642 किलोमीटर शिरोबिन्‍दु की कक्षा पर सफलतापूर्वक पहुंचा दिया गया।
16 नवम्बर 2013 को पांचवीं और अंतिम प्रक्रिया में सुबह 01:27 पर 243.5 सेकंड तक इंजन चालूकर के यान को 1,92,874 किलोमीटर के शिरोबिंदु तक उठा दिया। इस प्रकार यह चरण भी पूरा हुआ।
30 नवंबर की रात एवं 1 दिसंबर की मध्यरात्रि को 00:49 पर मंगलयान को मार्स ट्रांसफर ट्रेजेक्‍टरी में प्रविष्‍ट करा दिया गया, इस प्रक्रिया को ट्रांस मार्स इंजेक्शन (टीएमआई) ऑपरेशन का नाम दिया गया।
यह इसकी 20 करोड़ किलोमीटर से ज्यादा लम्बी यात्रा शुरूआत थी जिसमें नौ महीने से भी ज्यादा का समय लगना था और वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती इसके अन्तिम चरण में यान को बिल्कुल सटीक तौर पर धीमा करने की थी ताकि मंगल ग्रह अपने छोटे गुरुत्व बल के जरिये इसे अपने उपग्रह के रूप में स्वीकार करने को तैयार हो जाये। इसरो प्रमुख डॉ० के राधाकृष्णन ने कहा कि मंगल अभियान की परीक्षा में हम पास हुए या फेल, यह 24 सितम्बर को ही पता चलेगा।
22 सितम्बर 2014 को एमओएम या मार्स आर्बिटल मिशन को मंगलयान ने मंगल के गुरुत्वीय क्षेत्र में प्रवेश किया । लगभग 300 दिन की संपूर्ण यात्रा के दौरान सुषुप्ति में पड़े रहने के बाद मंगलयान के मुख्य इंजन 440 न्यूटन लिक्विड एपोजी मोटर को 4 सेकंड्स तक चलाकर अंतिम परीक्षण एवं अंतिम पथ संशोधन का कार्य सफलतापूर्वक पूरा किया गया। और भारतीय वैज्ञानिक आस्वस्त हो गए की अब सफलता उनका कदम चूमनेवाली है।
24 सितम्बर 2014 की  सुबह 7 बज कर 17 मिनट पर 440 न्यूटन लिक्विड एपोजी मोटर (एलएएम) यान को मंगल की कक्षा में प्रवेश कराने वाले थ्रस्टर्स के साथ सक्रिय किया गया जिससे यान की गति को 22.1 किमी प्रति सेकंड से घटा कर 4.4 किमी प्रति सेकंड करके मंगल ग्रह की कक्षा में सफलतापूर्वक प्रविष्ट कर दिया गया । जिस समय यान मंगल की कक्षा में प्रविष्ट हुआ उस समय पृथ्वी तक इसके संकेतों को पहुंचने में लगभग 12 मिनट 28 सेकंड का समय लगा। ये संकेत नासा के कैनबरा और गोल्डस्टोन स्थित डीप स्पेस नेटवर्क स्टेशनों ने ग्रहण किए और आंकड़े रीयल टाइम पर यहां इसरो स्टेशन पर भेजे गए।
यह कार्य संपन्न होते ही सभी वैज्ञानिक खुशी से झूम उठे। भारत दुनिया का पहला ऐसा देश बन गया है जिसने पहले ही प्रयास में अपना मंगल अभियान पूरा कर लिया। इस ऐतिहासिक घटना का गवाह बनने के लिए भारतीय प्रधानमंत्री बैंगलोर के इसरो केंद्र में मौजूद रहे। उनकी मौजूदगी और संबल ने भी भारतीय वैज्ञानिकों को उत्साह से भर दिया था और वे इस इस असम्भव जैसे लगनेवाले कार्य को सम्भव कर दिखाए। इसरो के वैज्ञानिकों को बधाई देते हुए माननीय प्रधानमंत्री जी ने कहा, "आज इतिहास बना है। हमने लगभग असंभव कर दिखाया है। मैं सभी भारतीयों और इसरो वैज्ञानिकों को मुबारक देता हूं। कम साधनों के बावजूद ये कामयाबी वैज्ञानिकों के पुरुषार्थ के कारण मिली है।"
अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने भी ट्विटर पर इसरो को बधाई दी है.
भारत ने इस मिशन पर करीब 450 करोड़ रुपए खर्च किए है, जो बाकी देशों के अभियानों की तुलना में सबसे बहुत ज्यादा कम है। माननीय प्रधानमंत्री जी ने सही तुलना की है कि आज हमें आटो से यात्रा करने में 10 रूपए प्रति किलोमीटर खर्च करने पड़ते हैं, जबकि मंगलयान पर प्रति किलोमीटर यात्रा का खर्च सिर्फ 7 रूपए आया।
अब सवाल उठता है कि इस अभियान से क्या प्राप्त होगा।
अगर सब ठीक रहा तो मंगलयान छह महीनों तक मंगल ग्रह के वातावरण का अध्ययन करेगा।
ये मीथेन गैस का पता लगाएगा, साथ ही रहस्य बने हुए ब्रह्मांड के उस सवाल का भी पता लगाएगा कि क्या हम इस ब्रह्मांड में अकेले हैं? इस मिशन से मंगल ग्रह के बारे में ढेरों अन्य जानकारियां हासिल होंगी ।  यह भी  पता चल पाएगा कि क्या  इस ग्रह के गर्भ में खनिज छिपे हैं, क्या यहां बैक्टीरिया का भी वास है।
कक्षा में स्थापित होने के कुछ ही घंटों में यान ने मंगल ग्रह की ली गई तस्वीरें भेजनी शुरू कर दी है। एक संयोग ही कहिए कि इस मंगल यात्रा में मंगलवार दिन का भी योगदान रहा। यानि मंगलवार ने मंगलयान की यात्रा को मंगलमय कर दिया।


प्रदीप मिश्र
दिव्याँश 72ए सुदर्शन नगर, अन्नपूर्णा नगर, पोस्ट- सुदामानगर, इन्दौर – 452009 (म.प्र.)

मो. 09425314126

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