Monday, 21 December, 2009

दमन की घट्टी पीस रही इंसान

आज देश बहुत ही बुरी स्थिति से गुज़र रहा है, और इसकी वजह देश की जनता बिल्कुल नहीं हैं। देश को इस बुरी स्थिति में घसीट लाने वाले वे लोग हैं, जिन पर पिछले बाँसठ बरसों से जनता भरोसा करती आयी है। कभी-कभी उनके चेहरे, नाम और झण्डे भलेही बदले हों, पर नीतियाँ थोड़े-बहुत हेर-फेर के साथ वही की वही रही हैं। यही वजह है कि देश की प्रगति का पहिया छः-सात प्रतिशत की विकास दर से आगे गुड़कने का नाम नहीं ले रहा है। कुछ प्रतिशत लोगों के पास ज़रूर गाड़ियों की संख्या और बैंक बैलेंस बढ़ गया है। लेकिन वह तबका जो देश के विकास की गाड़ी के पहिये में अपने ख़ून में भीगा ‘बोळा’ लगाता है, ताकि पहिया आसानी से गुड़के और गाड़ी में बैठी सरकार के पेट का पानी भी न हिले। लेकिन अब ‘बोळा’ देने वाले की नसों में लगातार ख़ून कम पड़ रहा है। वह गाड़ी के पहिये में ‘बोळा’ लगाने वाला बोलने लगा है। क्योंकि विकास की गाड़ी उसकी गर्दन और पेट पर से गुज़रने को आतुर है, जिससे वह सहमत नहीं, और उसकी असहमति से सरकार सहमत नहीं ।

पिछले उन्नीस-बीस बरसों में देश और दुनिया की आर्थिक नीतियों में जो बदलाव आये हैं, उसकी वजह से निम्न और निम्न मद्यवर्ग की जनता को बहुत कुछ सहना-भोगना पड़ा है। सैकड़ों की तादात में सरकारी कारखाने बंद हुए, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे महत्त्वपूर्ण विभाग भी निजी हाथों में चले गये और डाक विभाग आदि जैसे कई सरकारी विभागों में छंटनी चालू है, नयी भर्ती बंद है। बड़े शहरों में लोगों को पानी वितरण का काम भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सौंपने का षडयंत्र ज़ोर-शोर से चल रहा है। डॉक्टर दवाई निमित लेने के साथ बिसलरी का पानी पीने की सलाह भी देने लगे हैं।

गाँवों में रहने वाले किसान भाइयों के लिए खेती करना मुश्किल होता जा रहा है। सुनियोजित ढंग से पारंपरिक बीजों को जैनेटिक बीजों द्वारा खो किया जा रहा है। खेती करना लगातार घाटे का सौदा साबित हो रहा है। जन विरोधी सरकारी नीतियों के चलते किसान साहूकारों और बैंकों के कर्ज़ के ज़ाल में फंसते जा रहे हैं। लोग समय-समय पर सरकार की इन जन विरोधी नीतियों का जबरदस्त ढंग से विरोध करते रहे हैं। अब तक उपलब्ध जानकारी के मुताबिक देश भर में एक लाख अस्सी हज़ार से ज़्यादा किसानों ने अपनी जान गँवाकर अपना विरोध दर्ज़ कराया है। लेकिन सरकार ने न उनके विरोध को और न ही गुहार को तवज्जो दी। सरकार की ठगोरी और दमन कारी नीतियाँ अभी भी ज़ारी है, और ज़ारी है किसान का मरना भी। कहीं किसान ख़ुद विवश होकर फाँसी के फँदे पर झूल रहा है। कहीं सरकार ख़ुद उन्हें विकास विरोधी कहकर, और भी कई-कई नाम देकर अपनी पुलिस से मरवा रही है। याद करें- सिंगूर, नंदीग्रम, (प.बंगाल) दादरी, घोड़ी बछेड़ा (उ.प्र.) कलिंग नगर (उड़ीसा) जैसी अनेक जगहों पर जबरन भूमि अधिग्रहण की त्रासद और बर्बर घटनाओं की कहानियाँ। मेहंदी खेड़ा, मुलताई (म.प्र.) के किसानों द्वारा अपने हक़ की माँग करने पर, सरकार द्वारा छलनी की गयी उनकी ज़िंदगियों, अनाथ बच्चों और बेवा औरतों की कहानियाँ। कोयल कारो, बरगी, मान, इंदिरा सागर, सरदार सरोवर जैसी अनेक बाँध परियोजनाओं से उजड़ी ज़िंदगियों की कहानियाँ। यहाँ मैं कहना चाहता हूँ कि सरकार की नीति… नीति नहीं, अनीति है। जो हर बार विकास का स्वांग रचकर आती है और ग़रीबों के विस्थापन से शुरू होती है। यूँ तो पिछले बाँसठ बरसों में आदिवासी, दलित, किसान और मज़दूरों की लाशों पर कई कल्याणकारी योजनाओं की नीव रखी गई, लेकिन पिछले उन्नीस-बीस बरसों में दमन की गति बेतहाशा बढ़ी है। आप इतिहास के पन्ने पलटेंगे तो देखेंगे कि कितना ख़ून बिखरा है पन्नों पर।
अगर आप इतिहास के इन लहूलुहान पन्नों को नहीं पलटना चाहते, तो छोड़िए.. मत पलटिये। चलिए … वर्तमान से ही रूबरू हो लीजिए। आज देश के अनेक हिस्सों में सरकार द्वारा कई दमनात्मक कार्यवाही की जा रही है। सरकार कहती है कि वह यह सब विकास के लिए कर रही है। कुछ लोग जो खाये-पीये अघाये हैं, वे भी सरकार के सुर में सुर मिलाकर कहते हैं कि विकास तो ज़रूरी है और होना चाहिए। साथ में यह भी कहते हैं कि विकास की क़ीमत किसी न किसी को तो चुकानी पड़ती है !

तो भैय्या मैं मानता हूँ कि विकास ज़रूरी है और चहुंमुखी विकास होना चाहिये। विकास के लिए क़ीमत भी चुकानी पड़ती है, तो चुकायी जानी चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि यह क़ीमत कौन चुकाये ? और कोई एक ही बार-बार क्यों चुकाये ? आदिवासी, दलित, किसान, और मज़दूर तो हमेशा ही क़ीमत चुकाते आयें हैं। तो इस बार क्यों नहीं ऎसा किया जाये कि शहर की चकाचक कॉलोनियों में रहने वालों को क़ीमत चुकाने का मौक़ा दिया जाये ? जहाँ-जहाँ से बाँध, खदानों, कारखानों और सरकार एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियों की योजनाओं की वजह से जंगल, पहाड़, गाँव, घर, झोपड़े से आदिवासी, दलित, किसान और मज़दूर को विस्थापित किया जा रहा हैं, उन सभी विस्थापितों को इन चकाचक कॉलोनियों में बसाया जाये। और चकाचक कॉलोनी वालों की संपत्ति भी जंगल, पहाड़, गाँव से विस्थापितों के नाम कर दी जाये। और चकाचक कॉलोनी वालों को वह मुआवज़ा दिया जाये, जो आदिवासियों और अन्य विस्थापितों को सरकार देती है या देने का ढोंग करती है। अगर ऎसा हो तो, शायद चकाचक कॉलोनी में रहने वालों को विकास के बदले चुकाई जाने वाली क़ीमत का असल महत्त्व समझ में आये ! और यह शुरुआत दक्षिण उड़ीसा की नियमगीरी पहाड़ियों से खदेड़े जाने वाले आदिवासियों को बसा कर भी की जा सकती है !

सरकार ने आदिवासियों से जंगल, पहाड़ मुक्त कराने के लिए आॉपरेशन ग्रीन हंट का एलान किया है। इस काम को ज़ल्दी से ज़ल्दी पूरा किया जा सके इसलिए ग्रेहाउंड्स, कोबरा, स्कार्पियन यानी खूँखार कुत्ते, कोबरा साँप और बिच्छू के नाम से ख़ास पुलिस दस्ते बनाये हैं। लेकिन विश्व बैंक के भूतपूर्व अधिकारी और हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री डाक्साब मनमोहन सिंहजी और वेदांता के भूतपूर्व ग़ैर कार्यकारी निदेशक एवं हमारे वर्तमान गृहमंत्री जी को कैसे, और भला कौन समझायें कि आदिवासी साँप, बिच्छू और कुत्तों से नहीं डरते हैं। साँप, बिच्छू को कुचलना और कुत्ते का मुँह अपने तीरों से भरना उन्हें बहुत अच्छे से आता है। शायद एकलव्य की कहानी तो आपने भी पढ़ी-सुनी होगी !

फोर्स के जवान जो आदिवासियों, किसानों और मज़दूरों का ख़ात्मा करने निकल पड़े हैं। उन जवानों में अस्सी से नब्बे फिसदी जवान गाँव में से किसानों और नीचले तबके के परिवारों से आते हैं। जो फोर्स के वरिष्ठ अधिकारी और गृहमंत्री साहब के एक आदेश पर अपनी जान की बाजी लगा देतें हैं। वरिष्ठ अधिकारी और गृहमंत्री साहब ने उन जवानों के दस्तों के नाम खूँखार कुत्ते, साँप और बिच्छू के दस्ते रखे हैं। ज़रा इस बात पर ग़ौर करे जनाब ! यदि जवानों के मग़ज़ में किसी ने यह बात ठीक से बैठाल दी, कि आप ने उनके ऎसे नाम रखे हैं, जो सभ्य समाज में कतई सम्माननीय विशेषण नहीं हैं, और इस बात से उनका भेजा घूम गया तो…, तो क्या कुछ हो सकता है ! शायद बंदूक की नाल जंगल, पहाड़, गाँव, झोपड़ों की बजाय दूसरी तरफ़ ही घूम जाये !

जब एक जवान किसी भी फोर्स में भर्ती होता है। प्रशिक्षण पूर्ण होने पर वह शपथ लेता है कि देश की आन, बान और शान की रक्षा करेगा। देश की रक्षा में उसे अपने प्राण भी न्यौछावर करना पड़े तो वह पीछे नहीं हटेगा। ऎसी शपथ से बँधे जवान की अगर कोई आँखें खोल दे कि उसे जिस आॉपरेशन ग्रीनहंट पर भेजा जा रहा है, वह किसी भी दृष्टि से देश हित में नहीं है। उनसे जो काम कराया जा रहा है, वह देशभक्ति भी नहीं है। बल्कि फोर्स के जवानों को मुगांबो जैसे कई चरित्र मिलकर छल रहे हैं। देशभक्ति की शपथ लेने वाले हाथों से ही सुनियोजित षडयंत्र के तहत देशभक्तों का ख़ात्मा करवाकर, देश को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मालिकों की सोने की थालियों में कैक के छोटे-छोटे पिस की तरह परोसाया जाने वाला है। तब… कल्पना कीजिए.. तब क्या हो सकता है ? क्या है देश के मानी जनाब ? रायसीना टिले पर खड़ी एक ईमारत.. और उसमें बैठने वाले चंद काले दिल वाले सफ़ेद पोश ! नहीं…! देश के मानी एक अरब से ज़्यादा धड़कती ज़िन्दगियाँ हैं। उन्हें अनदेखा, अनसुना कर देश के जंगलों, पहाड़ियों और नदियों का सौदा मत करिये ! कहीं ऎसा न हो कि जैसा आपने कहा- आॉपरेशन ग्रीनहंट, ये अरब से ज़्यादा आबादी यह कहने को विवश हो जाये कि आॉपरेशन रायसीना टिला क्लीन। इतिहास गवाह है। जब-जब आबादी की बाढ़ आयी है। अच्छी-अच्छी सत्ताओं और व्यवस्थाओं के पाये उखड़ गये हैं।

2004 में वित्त मंत्री का पद सम्भालने के पश्चात भले ही चिदंबरम साहब वेदांता के ग़ैर कार्यकारी निदेशक नहीं रहे हों, लेकिन उनकी कार्यप्रणाली से और उनकी बातों और निर्णयों से स्पष्ट लगता है कि वे आज भी वेदांता और उसकी तरह की पूँजीपति कंपनियों के हितों को ध्यान में रखकर सोच रहे हैं। आज मित्तल, टाटा, जिंदल, एस्सार, रिलायंस, पास्को, विलिटॉन, बी.एस. पी. और टिंटो ही नहीं, ऎसी सैकड़ों कंपनियाँ हैं जो देश के जंगल, पहाड़ के गर्भ में छुपे बॉक्साइड, कोयला, गैस, तेल आदि खनिज एवं प्राकृतिक संपदा पर अपनी गिद्ध दृष्टि गड़ाये बैठी हैं। कंपनियाँ उस भू्गर्भिय और प्राकृतिक संपदा को हर हाल और हर क़ीमत पर हथियाना चाहती हैं, फिर चाहे वह क़ीमत लाखों ग़रीबों की ज़िंदगियाँ ही क्यों न हों ?

आज पुलिस और सलवा जुडुम के लोग गोली चलाये या अपने हक़ की लड़ाई लड़ने वाले गोली दागे, मरने वाला एक ही वर्ग का होता है। कभी कोई पूँजपति या फिर मंत्री नहीं मरता है। पूँजपति और मंत्री मिलकर संविधान, क़ानून को धत्ता बताते हुए ग़रीबों का सफाया करने में लगे हुए हैं। इन कार्पोरेटियों ने केवल सरकार को ही अपने खिसे में नहीं रख लिया है, बल्कि इन्होंने प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रानिक मीडिया का भी खिस्या गरम कर रखा है। इसिलिए ज़्यादातर मीडिया कार्पोरेटियों के ही प्रचार-प्रसार में लगा है। ग़रीबों के मुद्दों को कोई अख़बार या चैनल दबंगता नहीं रख रहा है, क्योंकि ग़रीब उन्हें कुछ दे नहीं सकते हैं। मीडिया अपनी नैतिकता खोता जा रहा है।

कुछ ईमानदार वेबसाइटों पर पढ़ने में तो यह भी आता रहता है कि कई अख़बारों, टी.वी. चैनलों का पूरा-पूरा ख़र्चा धन्नासेठ ही चला रहे हैं। कई एन.जी.ओ. इन्हीं के दिये फण्ड से चल रहे हैं। खादी का कुर्ता और जींस पहन कंधे पर लैपटॉप का बैग लटकाये घुमने वाले, कभी जंगल, पहाड़, नदी, आदिवासी, दलित, स्त्री, ग़रीबी, खेत, किसान, स्वास्थ्य, शिक्षा, साम्प्रदायिकता, संस्कृति जैसे आदि मुद्दों पर सर्वे करने वालों में से कई इन्हीं कंपनियों द्वारा खड़ी की गई फन्डिग एजेन्सियों से फण्ड लेकर काम कर रहे हैं। कुछ तो बातचीत में बेशर्मी से खुलेआम इस बात को स्वीकार करते हैं। कुछ से सवाल करो तो वे छद्म वामपंथी, प्रगतिशील और जनवादी मुखौटा लगा लेते हैं और सवाल पूछने वाले को ही कटघरे में खड़ा कर देते हैं। तर्क़ देते हैं कि पैसा तो बस पैसा होता है। काला होता है, न सफ़ेद होता है। पैसा किससे लिया यह महत्त्व की बात नहीं, महत्त्व की बात यह है कि उसका उपयोग क्या कर रहे हैं ! असल में वे इस तर्क़ का उपयोग अपनी करतूतों पर पर्दा डालने के लिए ही करते हैं। लेकिन फन्डिग एजेन्सियों को भेजी जाने वाली उनकी रिपोर्टें इस तरक के चिंदे-चिंदे कर देती हैं। ऎसे ही छद्म वामपंथियों, प्रगतिशीलों, जनवादियों और एन.जी.ओ. ने पिछले उन्नीस-बीस बरस में वामपंथ को कितना नुकसान पहुँचाया है, यह वर्तमान में देखने को मिल भी रहा है। वामपंथी आंदलोनों को सबसे ज़्यादा नुकसान उनके भीतर मौजूद छद्म वामपंथियों ने ही पहुँचाया है।

अगर सरकार सचीमुची की ईमानदार है और देश का विकास करना चाहती है, तो मुझे नहीं लगता कि कोई सरकार के विकास में रोड़े अटकाने को फुर्सत में बैठा है। लेकिन सरकार विकास चाहती है, यह बात देश को समझाये तो सही। विकास की शर्त प्रत्येक का मुक्त विकास होना चाहिए। विकास का मतलब किसी भी व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण करना होना चाहिए। विकास व्यक्ति को मार कर कैसे किया जा सकता है ? विकास बदूंक की नाल से संभव है ! ऎसा कभी नहीं सुना-पढ़ा.. हाँ.. यह ज़रूर पढ़ा कि बंदूक की नाल ने साम्राज्यवादी, तानाशाह सत्ता को एक से अधिक बार उखाड़ फेंका है।

आज देश के अलग-अलग हिस्सों में कहीं शांति के नाम पर, कहीं विकास के नाम पर सरकार जो दमन की घट्टी (पत्थर की चक्की) चला रही है, उसमें सिर्फ़ और सिर्फ़ आदिवासी, दलित,किसान, मज़दूर, बच्चे,और औरतें ही पिसे जा रहे हैं। लेकिन सरकार की नज़र में ये लोग हिंसक हैं। हिंसक वो नहीं, जो विधान सभा में हिन्दी बोलने पर थप्पड़ मारते हैं और जो बाबरी, गुजरात और कंधमाल जैसे कांड करते हैं। सरकार उनका कुछ नहीं कर पाती है, लेकिन ग़रीब अपना हक़ माँगती है, तो उन्हें हिंसक कहकर कुचलने लगती है। सरकार को अपना यह दृष्टिदोष दूर करने की ज़रूरत है। अगर देश में लोकतंत्र है, तो असहमति के स्वर को भी सम्मान से सुनना चाहिए, न कि कुचलना चाहिए। क्या कभी सरकार द्वारा चलायी जा रही यह दमन की घट्टी रुकेगी ! क्या कभी टूटेंगे इस घट्टी के पुड़ ! और क्या वामपंथी आँदोलनकारी विरोध का ढोंग करना बंद कर, सच में साम्राज्यवादी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने की कोई सांगठनिक मुहिम छेड़ने का कभी मन बनायेंगे ?

शांति का आधार न्याय के सिवा क्या हो सकता है ? लेकिन हमारी सरकार के पास देने को न्याय ही तो नहीं है। उससे कुछ भी माँगों रोटी, कपड़ा, मकान, काम, हक़, या फिर न्याय। लेकिन अफसोस सरकार के पास देने को सिर्फ़ एक ही चीज़ है और वह गोली है। सरकार मुर्दा शांति स्थापित करना चाहती है, इसलिए एक बड़ी संख्या सरकार के कुतर्क़ों से असहमत हैं। असहमति का स्वर मणिपुर, काश्मीर, झारखण्ड, उ.प्र., प. बंगाल, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, म.प्र. की नर्मदा पट्टी और कहाँ-कहाँ नहीं गूँज रहा है। बंद और कसी मुट्ठियाँ आसमान में लहरा रही हैं। सबके अपने-अपने मुद्दे और हक़ के सवाल हैं।

जब से श्रीलंका की सेना ने लिट्टे का सफाया किया है। सरकार को भी वही धुन सवार है कि किसी तरह अपने पक्ष में जनमत बनाकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों की राह में रोड़े अटकाने वालों का, संवैधानिक अधिकारों की वकालत करने वालों का सफाया किया जाये। लेकिन सच में सरकार सफाया कर सकती है ! क्योंकि दमन कारी नीतियों से असहमत केवल माओवादी, नक्शलवादी, जन आँदलनकारी, और कुछ बुद्धिजीवी ही नहीं हैं, बल्कि देश की साठ से सत्तर प्रतिशत आबादी असहमत है। पर अभी वह असंगठित हैं। लेकिन जैसे ही सरकार असहमति के स्वर का सफाया करने को क़दम उठायेगी, यह साठ-सत्तर प्रतिशत अबादी एकजुट होने लगेगी और ये सरकार की हर गोली के सामने मिलेगी।

हमारे देश की सरकार काश्मीर सहित हर मुद्दे पर पाकिस्तान से बात करने को राज़ी है। चीन से बात करने को प्रयास रत है, बल्कि एक पाँव पर खड़ी है। लेकिन देश के भीतर देश हित में उठते असहमति के स्वर को न सुनने को तैयार है, न बातचीत के माध्यम से हल खोजने को राज़ी है। बल्कि देश में उठते असहमति के हर स्वर को ही सदा-सदा के लिए खामोश कर देना चाहती है। आज मुर्दा शांति स्थापित करना ही पूँजीपतियों और सरकार के हित में है। इनके हित से ऊपर सरकार की नज़र में शायद देश भी नहीं है। एक बार … सिर्फ़ एक बार एकजुट होकर सोचो इस व्यवस्था का पहिया चलाने वालों… चुपचाप गोली खाकर मुर्दा शांति स्थापित करने वालों का सहयोग करने के पक्ष में हो या संघर्ष के पक्ष में। अपना पक्ष और लक्ष्य तय करो। क्योंकि दमन की घट्टी इंसान पीस रही है। किसी की बारी आज तो किसी की कल है।

सत्यनारायण पटेल
बिजूका फ़िल्म क्लब
एम-2 /199, अयोध्या नगरी,
इन्दौर-11 (म.प्र.)
ssattu2007@gmail.com,
bizooka2009.blogspot.com

Monday, 30 November, 2009

भाषा की लड़ाई की आड़ में


कांग्रेस को नये नये दैत्य पैदा करने और उनसे खेलने का पुराना शोक है। ये दैत्य पहले तो उसके अपने अंदर की कलह से पैदा होते और उन्हीं से निपटने के काम आते थे। चाहे भिण्डरांवाले हों या बाल ठाकरे। लेकिन इस बार मनसे का नया दैत्य उसने शिवसेना की काट के लिए पैदा किया है। महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव में इस कार्ड से कांग्रेस ने शिवसेना को किनारे लगा दिया है। लेकिन हर दैत्य हमेशा अपने मालिक का कहा नहीं मानता। एक दिन वह मालिक से आजाद होने लगता है और तब वह अपने ही मालिक को खाने लगता है। मालिक जब पकड़ में नहीं आता तो वह मालिक के चमचों का शिकार करता है और जब उनसे भी पेट नहीं भरता तो वह निर्दोष जनता का खून बहाने लगता है। इस बार के महाराष्ट्र चुनाव में मनसे की आड़ में कांग्रेस ने शिवसेना को किनारे लगा दिया है। लेकिन राज ठाकरे की म न से अब अपने मास्टर से अलग होने को कसमसा रही है। उसे पता है कि शिवसेना का शेर बूढ़ा हो चुका है और जिस शावक को जंगल का राज सौंपा गया है वह गीदड़ों का दूध पीकर पला है। राज ठाकरे सिर्फ मुंबई में कुछ सीट प्राप्त करने से संतुष्ट होने वाले नहीं है। उन्हें महाराष्ट्र की सत्ता चाहिये। इसके लिए वह वे सारे हथकण्डे अपनायेंगे जो कभी शिवसेना ने अपनाये थे। पहला ट्रेलर दिखाया जा चुका है। पूरी फिल्म दिखाई जाना बाकी है। जिस समय महाराष्ट्र निर्माण सेना के नव निर्वाचित बांके अबु आजमी को हिन्दी में शपथ लेने से रोकने के लिए उनका माइक तोड़ रहे थे, उन पर प्रहार कर रहे थे तब शिवसेना और भाजपा चुप थी। इस चुप्पी ने खेल को थोड़ा और अधिक दिलचस्प बना दिया है। भाजपा और शिवसेना कांग्रेस के खेल को जानती है। कांग्रेस को एक न एक दिन राज ठाकरे से अपने हाथ खींचना ही पड़ेंगे और उस दिन राज ठाकरे को अपने लिए नये सहोदरों की जरूरत होगी। भाजपा ने संघ के फासिस्ट सोच से धैर्य का पाठ तो पढ़ा ही है।

राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नव निर्वाचित बाहुबलियों की हरकत ने हिन्दी भाषा समाज के स्वाभिमान को बहुत आहत किया है। यह सब इस बात से भी आहत हुआ है कि म न से ने अंग्रेजी में शपथ लेने वालों को नहीं रोका। सिर्फ हिन्दी में शपथ लेने का विरोध किया। आहत स्वाभिमान हिन्दी क्षेत्र में भी उपद्रव की राजनीति को जन्म देगा। छुटपुट घटनाएं प्रतिक्रिया स्वरूप उत्तरप्रदेश में हुई भी हैं। लेकिन भाषा की राजनीति की मूल गड़बड़ कहां है, इस पर आज भी कोई बात करने को तैयार नहीं है, और अगर बात कर भी रहा है तो उसको सुधारने को कोई तैयार नहीं है। सोचा जाना चाहिए कि हमेशा हिन्दी का ही विरोध क्यों होता है? हिन्दी की स्थिति स्वयं हिन्दी प्रदेश में कोई बहुत अच्छी नहीं है। हिन्दी प्रदेश में भी हिन्दी का नहीं अंग्रेजी का ही वर्चस्व कायम है। चाहे तमिलनाडु हो, बंगाल हो, पंजाब हो या अब महाराष्ट्र हर जगह हिन्दी का विरोध होता है। छत्तीसगढ़ जब मध्यप्रदेश से अलग हुआ तो उसने भी हिन्दी की जगह छत्तीसगढ़ी को प्रमुखता देने का आग्रह किया। पिछले दिनों तो हिन्दी क्षेत्र के दलितों तक ने यह कहा कि दलितों को अपनी मुक्ति के लिए अंग्रेजी-माता को अपनाना चाहिए। हिन्दी दिवस की जगह अंग्रेजी माता का दिवस मनाया जाना चाहिए। राष्ट्रीय राजनीति में हिन्दी क्षेत्र का वर्चस्व हिन्दी भाषा के प्रति अन्य भाषा-भाषियों में एक भय पैदा करता है। हिन्दी उसे एक साम्राज्यवादी-विस्तारवादी-भाषा की तरह नजर आती है, जो मौका मिलते ही उनके अस्तित्व को नष्ट कर देगी। यह भय बहुत हवाई नहीं है। इसके कुछ ठोस कारण है। स्वयं हिन्दी क्षेत्र ने अपने इलाकों की बोलियों को बचाने और विकसित करने के लिए कोई बहुत ठोस कदम नहीं उठाये। मध्यप्रदेश में ही पांच सौ से अधिक जनबोलियां दम तोड़ चुकी है। बोलियों के साथ जुड़ी संस्कृतियों के संरक्षण की कोशिशें भी नाकाफी ही कहीं जायेंगी। और इन सबके मूल में है हिन्दी क्षेत्र की शिक्षा प्रणाली में त्रिभाषा के साथ किया गया व्यवहार। हिन्दी क्षेत्र ने बहुत मक्कारी के साथ तीसरी भाषा के रूप में संस्कृत को अपने यहां लागू कर दिया। उसने अपने क्षेत्र के स्कूलों में किसी प्रांतीय भाषा को सीखने का प्रावाधान पैदा नहीं किया। अगर हिन्दी क्षेत्र चाहता तो वह अपने सारे स्कूलों को बाईस भागों में बांटकर भारत की सारी भाषाये तीसरी भाषा के रूप में पढ़ा सकता था। पर उसने ऐसा नहीं किया। आज आपको हिन्दी के ऐसे अनेक विद्वान मिल जायेंगे जो तमिल भाषी या बंगला और मराठी भाषी हों या अन्य किसी भारतीय भाषा के हों, पर क्या हम एक ऐसे विद्वान का नाम पता कर सकते हैं जो मूलतः हिन्दी भाषी हो पर वह किसी अन्य भारतीय भाषा का विद्वान हो? अपने अहंकार से बाहर आये बिना हम महाराष्ट्र विधानसभा में हुई घटना की पुनरावृत्ति को नहीं रोक पाएंगे। समय आ गया है जब प्रदेश की शिक्षा नीति में भाषा के सवाल पर आमूल चूल परिवर्तन किया जाना जरूरी है।

राजेश जोशी

( यह आलेख हमारे समय के अत्यंत महत्वपूर्ण कवि राजेश जोशी ने लिखा है, जो पाक्षिक लोकजतन में अंकः इक्कीस, 16 से 30 नवम्बर 2009 में छपा है। जनवादी लेखक संघ, इन्दौर के ब्लाग पर मैंने देखा और चुरा लिया। आप सब पढ़े और चर्चा करें। - प्रदीप मिश्र)

Sunday, 18 October, 2009

दीपक

(एक)
मिट्टी धरती से
कपास खेतों से
तेल श्रमिकों से
और आग सूर्य से लिया उधार
मनुष्यों ने बनाया दीपक
जिसके जलते ही
घोर अंधकार में भी
जगमगाने लगी पृथ्वी
लो हो गयी दिवाली।

(दो)
न जाने कौन सी धुन है
जो जलाए रखती है इसको
जलता रहता है
अंधेरे के खिलाफ
अंधेरा जिसके भय से सूरज भी डूब जाता है
लेकिन दीपक है कि
जलता ही रहता है
और भोर हो जाती है।

(तीन)
उसने अपनी स्लेट पर लिखा - अ
लपलपायी दीपक की लौ
उसने अपनी स्लेट पर लिखा - ज्ञ
और दीपक बुझ गया
क्योंकि उसकी आग
बच्चे के दिल में पहुँच गयी थी
अब बच्चा देख सकता था
अंधेरा में भी सबकुछ साफ-साफ ।


(सभी मित्रों को दिवाली की शुभकामानाएँ - प्रदीप मिश्र)

Friday, 21 August, 2009

जिन्ना तो सिर्फ मिस्टर जिन्ना थे

क्या यह जरूरी है कि मोहम्मद अली जिन्ना को हम देवता मानें या दानव ! देव और दानव के परे क्या कोई अन्य श्रेणी नहीं है, जिसमें गांधी, जिन्ना और सावरकर जैसे लोगों को रखा जा सके? क्या अपने इतिहास के प्रति हम थोड़े निस्संग, थोड़े निष्पक्ष, थोड़े तटस्थ हो सकते हैं? यदि साठ साल बाद भी हम में यह परिपक्वता नहीं आ सकी तो क्या हम किसी दिन अपने इतिहास को दोहराने पर मजबूर नहीं हो जाएंगे? यदि साठ-सत्तर साल पहले हम जिन्ना के समकालीन हुए होते तो शायद हमारे दिल भी उसी हिकारत से भरे होते, जिससे नेहरू और पटेल के भरे हुए थे| यहां हम यह नहीं भूलें कि उस समय एक गांधी नाम का आदमी भी था, जो जिन्ना को क़ायदे-आज़म (महान नेता) बोलता था, भारतमाता का 'महान बेटा' बताता था और जिसे भारत का प्रधानमंत्री पद भी देने को तैयार था| क्या गांधी को पता नहीं था कि जिन्ना के सांप्रदायिक भाषणों की वजह से ही खून की नदियां बही थीं, लाखों परिवार बेघर हुए थे और भारतमाता का सीना चीरा गया था? इसके बावजूद घृणा का रेला गांधी को अपने साथ बहा न सका| शायद इसीलिए वे महात्मा कहलाए| हमारी पीढ़ी जिन्ना को महात्मा के चश्मे से देखे, यह जरूरी नहीं है लेकिन जरूरी यह है कि हम उन कारणों में उतरें, जिनके चलते भारतवादी जिन्ना पाकिस्तानवादी जिन्ना बन गए|
पूंजाभाई झीनाभाई के बेटे मोहम्मद अली ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि वे पाकिस्तान के पिता बनेंगे| जिसकी मां का नाम मिठूबाई और पत्नी का नाम रतनबाई हो, जिसे न नमाज़ पढ़ना आती हो न उर्दू, जो गाय और सूअर के मांस में फर्क न करता हो, जो रोज़ दाढ़ी बनाता हो और जिसे दाढ़ीवाले मुल्लाओं में से बदबू आती हो, जो अपने आपको 'मुसलमान' कहे जाने पर भड़क उठता हो, भला ऐसा आदमी औरंगजेब के बाद मुसलमानों का सबसे बड़ा रहनुमा कैसे बन गया? जो आदमी सेंट्रल एसेम्बली में 1925 में खड़े होकर दहाड़ता हो कि ''मैं भारतीय हॅूं, पहले भी, बाद में भी और अंत में भी'', जो मुसलमानों का गोपालकृष्ण गोखले-जैसा नरम नेता बनना अपना जीवन-लक्ष्य समझता रहा हो, जो तुर्की के खलीफा को बचाने के गांधीवादी आंदोलन को पोंगा-पंथी मानता हो, जो मुसलमानों के पृथक मतदान और पृथक निर्वाचन-क्षेत्रों का विरोध करता रहा हो, जिसने मज़हब और राजनीति के घालमेल के गांधी, मौलाना मोहम्मद अली और आगा खान के प्रयत्नों को सदा रद्द किया हो, जिसने बाल गंगाधर तिलक की छोटी-सी अवमानना के लिए वॉयसराय विलिंगडन को मुंबई में नकेल पहना दी हो, 'रंगीला रसूल' के प्रकाशक महाशय राजपाल के हत्यारे अब्दुल क्रय्यूम को फांसी पर लटकाने का जिसने समर्थन किया हो, लाहौर के शहीदगंज गुरुद्वारे के विवाद में जिसने सिखों को न्याय दिलवाने में कोई क़सर न छोड़ी हो, 1933 में जिसने 'पाकिस्तान' शब्द के निर्माता चौधरी रहमत अली की मज़ाक उड़ाई हो और उनकी डिनर पार्टी का बहिष्कार किया हो, कट्टरपंथी मुल्लाओं ने जिसे 'क़ातिल-ए-आज़म' और 'क़ाफिर-ए-आज़म' का खिताब दिया हो, सरोजिनी नायडू ने जिसे 'हिंदू-मुस्लिम एकता का राजदूत' कहा हो, जिसने मुंबई के अपने मुस्लिम मतदाताओं को 1934 के चुनाव में दो-टूक शब्दों में कहा हो, ''मैं भारतीय पहले हूं, मुसलमान बाद में'', जिसे चुनाव जिताने के लिए हिंदू मित्रों ने कारों के काफिले खड़े कर दिए हों, जलियांवाला बाग और भगतसिंह के मामले में जब गांधी जैसे नेता हकला रहे थे, जिस बेरिस्टर ने एसेम्बली को हिला दिया हो, 1938 तक जिस नेता का रसोइया हिंदू हो, ड्राइवर सिख हो, आशुलिपिक मलयाली ब्राह्रमण हो, रक्षा-अधिकारी गोरखा हिंदू हो, जिसके पार्टी-अखबार का संपादक ईसाई हो और जिसका निजी डॉक्टर पारसी हो, उस मोहम्मद अली जिन्ना ने यह कहना कैसे शुरू कर दिया कि एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं| एक भारत में दो क़ौमें साथ-साथ नहीं रह सकतीं| हिंदू और मुसलमान बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक नहीं, दो राष्ट्र हैं, दो इतिहास हैं, दो परम्पराएं हैं, दो जीवन-पद्घतियां हैं| उनकी दो भाषाएं हैं, दो भूषा हैं, दो भोजन हैं, दो भवन हैं, दो कानून हैं, दो केलेंडर हैं, दो रुझान हैं, दो महत्वाकांक्षाएं हैं, दो लक्ष्य हैं| उनका भला इसी में है कि वे एक-दूसरे के मातहत न रहें| अलग-अलग रहें| जिन्ना के अनुसार अलगाव का यह बीज भारत-भूमि में उसी दिन पड़ गया, जिस दिन कोई पहला भारतीय मुसलमान बना| मज़हब के नाम पर दुनिया के सबसे पहले और शायद आखिरी राष्ट्र का निर्माण हुआ और उसका नाम है, पाकिस्तान ! इस पाकिस्तान के एकमात्र जनक थे, जिन्ना !
पाकिस्तान पाकर जिन्ना को क्या मिला? उन्होंने खुद कहा मुझे कुतरा हुआ और दीमक खाया हुआ पाकिस्तान मिला| पंजाब और बंगाल बंट गए| सरहदी सूबे और कश्मीर ने भी साथ नहीं दिया| उनकी अपनी बेटी दीना उनके साथ नहीं गई| मुंबई का शानदार घर और प्राणपि्रया रतनबाई की कब्र भारत में ही छूट गई| लाखों लोग मारे गए, लाखों बेघर हुए और भारत के मुसलमान दो हिस्सों में बंट गए| बांग्लादेश बनने पर तीन हिस्सों में बंट गए| मौलाना मौदूदी ने ठीक ही कहा कि जिन्ना ने भारत के मुसलमानों का जितना नुकसान किया, किसी ने नहीं किया| जो पाकिस्तान में रहे, वे अमेरिकी ईसाइयों की कठपुतली बन गए और जो हिंदुस्तान में रह गए, उनकी हैसियत काफि़रों के राज में ''भेड़-बकरी की-सी बन गई|'' भारत अखंड न रह सका लेकिन मुसलमान तो खंड-खंड हो गए| इस्लाम के नाम पर वे फौजी बूटों तले रौंदे जा रहे हैं| क्या जिन्ना जैसा कुशाग्र बुद्घि का धनी इस अनहोनी को नहीं समझ पाया? वास्तव में इसके होने के पहले तक वे इसे समझ नहीं पाए| अगर समझ जाते तो वे शायद पाकिस्तान के सबसे बड़े विरोधी होते| वे जून 1947 तक यही समझते रहे कि पाकिस्तान तो सिर्फ एक गोटी है, जिसे वे अंग्रेज की शतरंज पर हिंदू-मुस्लिम समता के लिए आगे बढ़ा रहे हैं| उन्हें क्या पता था कि कांग्रेस के कुर्सीप्रेमी कमजोर नेता इतनी जल्दी घुटने टेक देंगे| वे 1920 के नागपुर अधिवेशन में गांधी से मात खा गए थे, वे 1928 की नेहरू रिपोर्ट को सुधरवाने में असफल हो गए थे, 1937 में प्रचंड विजय के बावजूद मुस्लिम लीग को वे उ.प्र. मंत्रिमंडल में शामिल नहीं करवा पाए थे, 1946 की अंतरिम सरकार में मुस्लिम लीगी मंत्रियों की महत्वहीनता ने उन्हें आहत किया था| उन पर सौ सुनारों की चोटें पड़ती रहीं| आखिरकार उन्होंने एक लुहार की जमा दी| उन्हें पाकिस्तान मिल गया| जिद पूरी हो गई| जिद पूरी हुई, गुस्सा ठंडा हुआ, होश आया तो पता चला कि 'मेरे जीवन की यह सबसे बड़ी भूल थी|' वे शिखर-पुरुष बनने के लिए ही पैदा हुए थे| कांग्रेस के न बन सके तो मुस्लिम लीग के बन गए| क़ायदे-आज़म शिखर पर पहुंच गए और जिन्ना तलहटी में छूट गए| इसी जिन्ना की खोज में वे आाखरी दम तक तड़फते रहे| सिर्फ 13 माह वे पाकिस्तान के पिता रहे और पूरे 71 साल भारत मां के बेटे रहे| वे 40 साल भारत के लिए लड़े और सिर्फ 7 साल पाकिस्तान के लिए लड़े| शायद पाकिस्तान के लिए भी नहीं, केवल अपने अहंकार के लिए ही लड़े| इसीलिए उन्हें न तो कट्टरपंथी कहा जा सकता है और न ही सेक्युलर| वे तो सिर्फ मिस्टर जिन्ना थे|

(जिन्ना पर आडवाणी के बयान को लेकर जब जून 2005 में विवाद उठा तो डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने जिन्ना पर जो मौलिक एवं शोधपरख लेख लिखा था, उसे आपको दुबारा प्रेषित किया जा रहा हैं| डॉ. वैदिक ऐसे पहले भारतीय हैं, जिन्हें 1983 में कराची की जिन्ना एकेडेमी ने व्याख्यान देने के लिए निमंत्रित किया था| गांधी और जिन्ना के व्यक्तित्व के बारे में भारत और पाकिस्तान के लोग पुनर्विचार करे, इस वैचारिक आंदोलन का सूत्र्पात सबसे पहले डॉ. वैदिक ने ही किया था|डॉ वैदिक मौलिक राजनीतिक विचारक हैं और विदेशनीति विशेषज्ञ हैं| उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से अंतरराष्ट्रीय राजनीति में पी.एचडी. किया था और वे नवभारत टाइम्स और पीटीआई भाषा के संपादक भी रहे हैं|)

(पाकिस्तानी मामलों के विशेषज्ञ वेदप्रताप वैदिक का यह आलेख ईमेल के माध्यम से प्राप्त हुआ। मुझे लगा कि इन विचारों को साथियों के साथ साझा किया जाए, इसलिए पोस्टकर रहा हूँ। यह सवाल सचमुच चिन्तनीय है कि आजादी का साठ साल के बाद भी हम अपनी इतिहास चेतना के संदर्भ में दयनीय सिथ्ती में हैं। - प्रदीप मिश्र)

Wednesday, 13 May, 2009

लोकतंत्र का बखिया

बीस अप्रैल को अडवाणी जी के गाँधीनगर में अनहद, ऊर्जाघर और अमन समुदाय के 25 युवा कार्यकर्ताओं को घेर कर भाजपा के गुंडों ने खूब मारा-पीटा. लात-घूसे, थप्पड़-मुक्के, गालियाँ कुछ भी ऐसा नहीं था, जो उन नौजवानों को नही खाना पड़ा.

ये 25 नौजवान एक प्रधान मंत्री (बनने के इंतजार में... ) का आख़िर क्या बिगाड़ लेते ? क्या उस क्षेत्र के भाजपा के सदस्यों को इतना भी विश्वास नहीं था अपने अटल और मज़बूत नेता पर और उस अटल और मज़बूत नेता के 83 साल के अनुभव और काम पर कि उन्हें इन नौजवान बच्चों से इतना डर लग गया ?

पिछले सात साल में अनहद के कार्यकर्ताओं पर गुजरात में ही लगभग 20 हमले हो चुके हैं. भाजपा, विहिप और संघ परिवार के अन्य दल तो हमले करते ही हैं लेकिन कुछ अपने भी यही कहते सुने गये– इन पर ही हमला क्यों होता है?



अगर ऐसा हमला मायावती, लालू या किसी वामपंथी नेता के क्षेत्र में हुआ होता तो यह सब टेलीविज़न चैनल्स की सुर्ख़ियों में होता. क़ानून व्यवस्था, गुंडागर्दी, अभिव्यक्ति की आज़ादी और बहुत सारे प्रश्न बार-बार सामने आ जाते. लेकिन 20 अप्रैल ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया कि मीडिया और खास तौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का ज़्यादातर भाग बहुत तेज़ी से एक ओर दौड़ रहा है. इसके साथ-साथ वह एक वर्ग, एक जाति, एक धर्म का पक्षधर भी होता जा रहा है.

गुजरात में जिन लोगों ने ज़मीन पर काम किया है, वो शायद मेरी बात को समझ सकते हैं. संघ परिवार का जो सारा करिश्मा है, वो इसमें है कि उसने जनता तक सच्चाई पहुँचने के सारे रास्ते बंद कर दिए हैं. यह काम एक दिन में नही हुआ बल्कि यह बरसों की मेहनत का कमाल है.

गुजरात का जानमानस राष्ट्रीय अख़बार नही पढ़ता, राष्ट्रीय खबरें नही देखता. स्थानीय बड़े अख़बारों पर पूरी तरह से एक ही सोच, एक ही विचार का क़ब्ज़ा है. यह क़ब्ज़ा दिमागी भी है और इसे कायम रखने के लिए लगातार धन की आरती भी की जाती है. पिछले 20 वर्षों में एक पूरी पीढ़ी के सोचने की प्रक्रिया को ऐसी ज़ंजीरों में जकड़ा गया है कि वे निर्देशों पर काम करना तो जानते हैं लेकिन सोचना, सवाल करना नही जानते.

राष्ट्रीय परिवार कल्याण एवं स्वास्थ्य सर्वेक्षण-3 के अनुसार गुजरात में 42.4 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. गुजरात में 80.1 प्रतिशत बच्चों में खून की कमी है.


राजनीति से जुड़े ज़्यादातर लोगों के मस्तिष्क पर इस माहौल का गहरा प्रभाव है. ऐसी हालत में आम आदमी तक जरुरी सूचनाओं को पहुंचाने का एकमात्र तरीका होता है घर-घर जाना. और जब इस माहौल में ऐसे काम के लिए कोई सिरफिरा निकलता है तो संघ को उससे बड़ा ख़तरा कोई और नही दिखता.

संघ ने नफ़रत फैलाने के जो तरीके सोचे और निकाले, उससे टक्कर लेने के लिए एक सिरफिरों की फौज चाहिए. उसके लिए जुनून चाहिए, दुनिया बदलने का, रुके हुई पानी में पत्थर मारने का. लेकिन जो भी उस पानी में लहरें उत्पन्न करने की कोशिश करता है, चाहे वो कितनी ही छोटी क्यों ना हो; वह व्यक्ति या संस्था संघ का एक बड़ा दुश्मन घोषित कर दिया जाता है.

पिछले सात साल में यह प्रयास कई लोगों, संस्थाओं ने किए हैं. उनकी गिनती छोटी तो नही लेकिन बड़ी भी नही है. अनहद ने उसमें एक अहम भूमिका निभाई है. 650 गावों में जाकर ‘लोकतंत्र बचाओ अभियान’ के माध्यम से, युवा सम्मेलनों, गोष्ठियों, नुक्कड़ नाटक, जनसंपर्क, पर्चों के माध्यम से लगातार गुजरात की आम जनता के सामने सच्चाई रखने का प्रयास किया है. पिछले सात साल में पांच हजार से अधिक नौजवानों को प्रशिक्षण के माध्यम से कम-से कम प्रश्न पूछने के मुकाम तक पहुँचाया है.

गुजरात और देश की मीडिया का बड़ा हिस्सा पूंजीपतियों के साथ मिल कर कह रहा है कि गुजरात देश में नंबर वन है, करोड़ों रुपये के करार हो रहे हैं वाइब्रैंट गुजरात में. ठीक उसी समय अनहद के नौजवान साथी गली-गली अपने पर्चे बांट कर इसका सच सामने ला रहे हैं. नौजवान बता रहे हैं कि गुजरात में किसान लगातार आत्महत्या कर रहे हैं, राज्य पर 94,000 करोड़ रुपये का क़र्ज है, जो 2001-02 में 45,301 करोड़ था. अब तक राज्य में हीरा उद्योग के 4.13 लाख मज़दूरों की नौकरियाँ जा चुकी हैं.

अनहद के पर्चे घर-घर पहुंचने लगे कि राष्ट्रीय परिवार कल्याण एवं स्वास्थ्य सर्वेक्षण-3 के अनुसार गुजरात में 42.4 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं या गुजरात में 80.1 प्रतिशत बच्चों में खून की कमी है. जाहिर है, यह सब भाजपा के लिए बर्दाश्त करना नामुमकिन हो जाता है.

राज्य की ज्यादातर राजनीतिक और सामाजिक संस्थाएं प्रेस विज्ञप्ति या 4-5 हजार पर्चों के सहारे लोगों तक पहुंचती हैं लेकिन तमाम तरह की मुश्किलों, मारपीट के बाद भी अनहद के कार्यकर्ता घर-घर पहुंचते हैं. यही कारण है कि अनहद पर बार-बार हमला होता है.

पिछले साल राज्य के मुख्यनंत्री नरेंद्र मोदी के क्षेत्र में अनहद कार्यकर्ता 10 दिन में अपना प्रचार करते हुए 80,000 घरों तक पहुंचे. इस दौरान भी अनहद कार्यकर्ताओं पर हमले हुए, उन्हें गिरफ्तार किया गया.

बहुत सारे ‘दोस्तों’ ने मज़ाक भी उड़ाया-“क्या हरा दिया भाजपा को?”

सवाल यह नहीं है कि हमारे काम करने से कोई पार्टी हार या जीत सकती है. सवाल केवल इतना भर है कि जिस नफ़रत और फरेब के बीज वर्षों पहले बोए गये और उसकी फसलें अब भी कटी जा रही हैं, उन कांटों के बीच क्या हमारे फूल खिलने शुरू होंगे ?

मैं मानती हूं, ज़रूर होंगे. आज अनहद के मंच पर पूजा पटेल, सचिन पांड्या, देव देसाई, मनोज शर्मा, मनीषा त्रिवेदी, जुनेद अंसारी और ईमानुएल जैसे सैकड़ों नौजवान कार्यकर्ता खुल कर काम कर रहे हैं, लोगों तक अपनी बात ले जा रहे हैं. इसका असर तो होगा ही. संभव है, इसमें वक्त लगे लेकिन ज़मीन पर किया हुआ कोई भी काम कभी जाया नहीं होता.

( क्षमा चहता हूँ, इन दिनों मैं नियमित नहीं हूँ। यथा शीघ्र नियमित होने का प्रयास करूँगा। इस बीच हमारे समय के युवा चिंतक विनीत का एक मेल मिला। जिसमें शबनम हाशमी की यह रपट थी, जो विकास से चौंधियाये हुए गुजरात के अंधकार को उजागर करता है। मुझे लगा इसे मित्रों के बीच रखना चाहिए। सो प्रस्तुत है। - प्रदीप मिश्र)

Sunday, 22 February, 2009

प्रदीप कांत की ग़ज़लें




जन्म : 22 मार्च 1968 रावत भाटा (राजस्थान )।
शिक्षा : स्नातकोत्तर (भौतिकी व गणित )।
प्रकाशन :
कथादेश ,इन्द्रपस्थ भारती, सम्यक, सहचर, अक्षर पर्व आदि लघु पत्रिकाओं व समाचार पत्रों में ग़ज़लें व गीत प्रकाशित ।
सम्प्रति :
प्रगत प्रौद्योगिकी केन्द्र में वैज्ञानिक अधिकारी के पद पर कार्यरत
सम्पर्क :
प्रदीप कान्त, सी 26/5 आर आर केट कॉलोनी इन्दौर 452 013,फोन: 0731 2320041,इमेल:kant1008@rediffmail.com, kant1008@yahoo.co.in

प्रदीप कांत हमारे समय के महत्वपूर्ण युवा रचनाकार है,जिनके अन्दर बहुमुखी प्रतिभा खिलखिलाती हुई नजर आती है। कभी कन्धे पर कैमरा लादे समय को कैद करते दिख जाऐंगें , तो कभी दाढ़ी खुजाता हुए शायर की तरह मुलाकात होगी । मंच पर नाटक करते-करते, उनमें संगीत की मस्ती उतर जाती है। हमसब के अजीज और खुशमिजाज। इसबार हम प्रदीप की कुछ ग़ज़लें पढ़ेंगे। ग़ज़लों के साथ लगे फोटो का ग्राफर भी प्रदीप है। क्षमा चाहता हूँ, काफी अवकाश के बाद ब्लाग पर आने के लिए। मूझे पूरा विश्वास है कि प्रदीप की ग़ज़लें पढ़ने के बाद आप जरूर कहेंगे, देर आए दुरूस्त आए। प्रदीप मिश्र।



1


किसी न किसी बहाने की बातें
ले देकर ज़माने की बातें

उसी मोड़ पर गिरे थे हम भी
जहाँ थी सम्भल जाने की बातें


रात अपनी गुज़ार दें ख़्वाबों में
सुबह फिर वही कमाने की बातें

समझें न समझें हमारी मरजी
बड़े हो, कहो सिखाने की बातें

मैं फ़रिश्ता नहीं न होंगी मुझसे
रोकर कभी भी हँसाने की बातें


2


उलझे प्रश्नो के जवाब की तरह
जी रहे हैं हम तो ख़्वाब की तरह

आज भी गुज़ारा कल ही की तरह
कल भी जी लेंगे आज की तरह

आवाज़ तो दो रूक जाऐंगे हम
भले आदमी की साँस की तरह

उदास आखों में बाकी है कुछ
किसी यतीम की इक आस की तरह

रूकती साँसों को गिन रहा हूँ मैं
किसी महाजन के हिसाब की तरह


3

रेत पर नाम लिखता हूँ
अपना अन्जाम लिखता हूँ

कद से बड़े हुऐ साये
जीवन की शाम लिखता हूँ

सिमटनें लगी दूरियाँ जब
फासले तमाम् लिखता हूँ

हैसियत है तो आइये
मैं अपना दाम लिखता हूँ


4

फिर से पत्थर, फिर से पानी
कब तक कहिये, वही कहानी

अक्सर चुप चुप ही रहती है
बिटिया जब से हुई सयानी

मेंरा चेहरा पढ़कर समझों
कहूँ कहाँ तक सभी जुबानी

नये नये सलीके है बस
बातें ठहरी वही पुरानी


5


मोड़ के आगे मोड़ बहुत
रही उम्र भर दौड़ बहुत

द्वापर में तो कान्हा ही थे
इस युग में रणछोड़ बहुत

नियम एक ही लिखा गया
हुऐ प्रकाशित तोड़ बहुत

किसिम किसिम की मुखमुद्राएँ
धनी हुऐ हँसोड़ बहुत

अन्तिम सहमति कुर्सी पर
रहा सफल गठजोड़ बहुत


6

चौखट में जड़ी हु हैं आँखें
कब से यूँ खड़ी हु हैं आँखें

गिद्धों की दृष्टि सहते सहते
उम्र से बड़ी हुई हैं आँखें

देखो कैसी लगती है भीड़
चेहरों से जड़ी हुई हैं आँखें

पढ़ पाओ जज़्बातों को जो
आँखों में मढ़ी हुई हैं आँखें

7

क्या अजब ये हो रहा है रामजी
मोम अग्नि बो रहा है रामजी

पेट पर लिक्खी हु तहरीर को
आँसुओं से धो रहा है रामजी

आप का कुछ खो गया जिस राह में
कुछ मेंरा भी खो रहा है रामजी

आँगने में चाँद को देकर शरण
ये गगन क्यों रो रहा है रामजी

सुलगती रही करवटें रात भर
और रिश्ता सो रहा है रामजी


8

उठता गिरता पारा पानी
पलकों पलकों ख़ारा पानी

चाने आईं पथ में जब
बनते देखा आरा पानी

नानी की ऐनक के पीछे
उफन रहा था गारा पानी

पानी तो पानी है फिर भी
उनका और हमारा पानी

देख जगत को रोया फिर से
यह बेबस बेचारा पानी


9


भीड़ बुलाएँ उठो मदारी
खेल दिखाएँ उठो मदारी

खाली पेट जमूरा सोया
चाँद उगाएँ उठो मदारी

रिक्त हथेली नई पहेली
फिर लझाएँ उठो मदारी

अन्त सुखद होता है दुख का
हम समझाएँ उठो मदारी

देख कबीरा भी हँसता अब
किसे रूलाएँ उठो मदारी




10

मिट्टी होगा सोना होगा
कुछ ना कुछ तो होना होगा

नहीं उचटती नींद जहाँ पर
सपना वहीं सलोना होगा

पत्थर ना हो जाएँ पलकें
हँसी न हो तो रोना होगा

गर्द सफ़र की निकल सके भी
घर में कोई कोना होगा

बरखा के आसार नहीं है
बीज तो फिर भी बोना होगा


11

सीधे सादे लोगों
तुम हो प्यादे लोगों

कब पूरे बन पाओगे
आधे आधे लोगों

चक्रव्यूह में फँसे हुऐ
करो इरादे लोगों

बंसी बजी कृष्ण की
तो नाची राधे लोगों

चुप चुप क्यूँ सुनते
हो वो ही वादे लोगों


12
अपने रंग में उतर
अब तो जंग में उतर

सलीका उनका क्यों
अपने ढंग में उतर

दर्द को लफ़्ज़ यूँ दे
किसी के रंज में उतर

बदतर हैं हालात ये
कलम ले, तंज में उतर

अपने में ही गुम है
उस दिले तंग में उतर


13

दर्द चेहरों पे पढ़ रहा हूँ मैं
एक कहानी फिर गढ़ रहा हूँ मैं

अधिकार हो किसी का मुझपे अगर
सम्पर्क कर ले, बिक रहा हूँ मैं

समझो तो सही आदमी का दिल हूँ
कहाँ बसोगे, सिकुड़ रहा हूँ मैं







14

वो जो बेघर सा लगे है
क्यों हमसफ़र सा लगे है

धूप बिफर गया है जबसे
छाँव से भी डर सा लगे है

सिर्फ मैं हूँ और तन्हा
घर भी कहीं घर सा लगे है

उसका चेहरा है आखि़र
अच्छी ख़बर सा लगे है

कुछ नहीं क्यों ख़्याल सा है
दिल में नश्तर सा लगे है


15

घर से जब उचटते हैं मन
दर ब दर भटकते हैं मन

जाने अन्जाने डर से
टूटते छिटकते हैं मन

खुद बनाए दायरों में
घुटते सिसकते हैं मन

इस गुमराह वक्त में तो
जड़ों से उखड़ते हैं मन

को न बात नहीं है
सायों से लिपटते हैं मन

सिर्फ सतही हँसी है यह
भीतर से सिसकते हैं मन


16

अपनी ही बारी के
दर्द नहीं उधारी के

जीतने में अनुभव थे
हार की पारी के

भोथरे हो गये मगर
तेवर हैं आरी के

भीतर की चुप्पी में
दर्द हैं तिबारी के

दर्द दिन की देह पर
नीँद की खुमारी के


17

जो भी पूछो, सच सच बताता है
जमूरा लोगों को बरगलाता है

हुनर यही तो है उस बदसूरत में
आईने बखूबी बेच जाता है

कहानियाँ गढ़ना सीखता है और
एक बच्चा बड़ा हो जाता है

तंग आ चुकी झील किनारों से
हाथ हर एक पत्थर उठाता है


18


गुत्थियाँ सुलझाने में गुज़र गया दिन
गलतियाँ दुहराने में गुज़र गया दिन

आँखों में सिमट रहे थे कुछ हादसे
खुद को आजमाने में गुज़र गया दिन

आले में ही दरक ग आस्थाएँ
चूल्हा सुलगाने में गुज़र गया दिन


19

आती जाती सड़क
शोर मचाती सड़क

रोज़ नये दर्द का
बोझ उठाती सड़क

आएगा वो फिर से
पलकें बिछाती सड़क

राजा हो रकं हो
सर झुकाती सड़क

दौरे पे मन्त्रीजी
ख़ौफ खाती सड़क

Thursday, 1 January, 2009

साल आया है नया

साल आया है नया

फटे मोजे,
पाँव की उँगली दिखाई दे रही
साल आया है नया
दुनिया बधाई दे रही!

रोटियाँ ठंडे तवे पर
आग पानी-सी लगे
ज़िंदगी कब तक बताओ
मेहरबानी-सी लगे
बीतकर भी एक बीती धुन
सुनाई दे रही!

दूध-सा फटना दिलों का
साल-भर जारी रहा
हर नशा उतरा चढ़े बिन
सिर मगर भारी रहा
ज़िंदगी फिर बंद घड़ियों को
कलाई दे रही!

आपसी रिश्ते रहे
काई लगी दीवार-से
रह गए हम भुरभुरे
संकल्प की मुट्ठी कसे
उम्र पतली ऊन को
मोटी सलाई दे रही!

लगे उड़ने बहुत सारे सच
हवा में चील से
कई अफ़साने बिना जाने
दिखे अश्लील से
सुबह भी अब
सुबह होने की सफ़ाई दे रही!

मंज़िलों के नाम
उलझे रास्ते ही रह गए
बहुत नन्हे मोड़ भी
बस खाँसते ही रह गए
माँ की खाली पेट
बच्चों को दवाई दे रही!

डबडबाई आँख
हर तारीख को पढ़ती रही
बदचलन-सी सांस
अपनी सांस से लड़ती रही
रात, दिन को देह की,
सारी कमाई दे रही!

गीतकार - यश मालवीय
(आगन्तुकों को नये वर्ष की शुभकामनाऐं। आनेवाले वर्ष को लेकर जो विचार मेरे मन में थे, उनको शब्दों में पिरो कर मेरे प्रिय गीतकार यश मालवीय ने पहले से रख दिया है। मैं उनके इस गीत के साथ नव वर्ष की शुरूआत कर रहा हूँ। - प्रदीप मिश्र)

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