Monday, 21 December, 2009

दमन की घट्टी पीस रही इंसान

आज देश बहुत ही बुरी स्थिति से गुज़र रहा है, और इसकी वजह देश की जनता बिल्कुल नहीं हैं। देश को इस बुरी स्थिति में घसीट लाने वाले वे लोग हैं, जिन पर पिछले बाँसठ बरसों से जनता भरोसा करती आयी है। कभी-कभी उनके चेहरे, नाम और झण्डे भलेही बदले हों, पर नीतियाँ थोड़े-बहुत हेर-फेर के साथ वही की वही रही हैं। यही वजह है कि देश की प्रगति का पहिया छः-सात प्रतिशत की विकास दर से आगे गुड़कने का नाम नहीं ले रहा है। कुछ प्रतिशत लोगों के पास ज़रूर गाड़ियों की संख्या और बैंक बैलेंस बढ़ गया है। लेकिन वह तबका जो देश के विकास की गाड़ी के पहिये में अपने ख़ून में भीगा ‘बोळा’ लगाता है, ताकि पहिया आसानी से गुड़के और गाड़ी में बैठी सरकार के पेट का पानी भी न हिले। लेकिन अब ‘बोळा’ देने वाले की नसों में लगातार ख़ून कम पड़ रहा है। वह गाड़ी के पहिये में ‘बोळा’ लगाने वाला बोलने लगा है। क्योंकि विकास की गाड़ी उसकी गर्दन और पेट पर से गुज़रने को आतुर है, जिससे वह सहमत नहीं, और उसकी असहमति से सरकार सहमत नहीं ।

पिछले उन्नीस-बीस बरसों में देश और दुनिया की आर्थिक नीतियों में जो बदलाव आये हैं, उसकी वजह से निम्न और निम्न मद्यवर्ग की जनता को बहुत कुछ सहना-भोगना पड़ा है। सैकड़ों की तादात में सरकारी कारखाने बंद हुए, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे महत्त्वपूर्ण विभाग भी निजी हाथों में चले गये और डाक विभाग आदि जैसे कई सरकारी विभागों में छंटनी चालू है, नयी भर्ती बंद है। बड़े शहरों में लोगों को पानी वितरण का काम भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सौंपने का षडयंत्र ज़ोर-शोर से चल रहा है। डॉक्टर दवाई निमित लेने के साथ बिसलरी का पानी पीने की सलाह भी देने लगे हैं।

गाँवों में रहने वाले किसान भाइयों के लिए खेती करना मुश्किल होता जा रहा है। सुनियोजित ढंग से पारंपरिक बीजों को जैनेटिक बीजों द्वारा खो किया जा रहा है। खेती करना लगातार घाटे का सौदा साबित हो रहा है। जन विरोधी सरकारी नीतियों के चलते किसान साहूकारों और बैंकों के कर्ज़ के ज़ाल में फंसते जा रहे हैं। लोग समय-समय पर सरकार की इन जन विरोधी नीतियों का जबरदस्त ढंग से विरोध करते रहे हैं। अब तक उपलब्ध जानकारी के मुताबिक देश भर में एक लाख अस्सी हज़ार से ज़्यादा किसानों ने अपनी जान गँवाकर अपना विरोध दर्ज़ कराया है। लेकिन सरकार ने न उनके विरोध को और न ही गुहार को तवज्जो दी। सरकार की ठगोरी और दमन कारी नीतियाँ अभी भी ज़ारी है, और ज़ारी है किसान का मरना भी। कहीं किसान ख़ुद विवश होकर फाँसी के फँदे पर झूल रहा है। कहीं सरकार ख़ुद उन्हें विकास विरोधी कहकर, और भी कई-कई नाम देकर अपनी पुलिस से मरवा रही है। याद करें- सिंगूर, नंदीग्रम, (प.बंगाल) दादरी, घोड़ी बछेड़ा (उ.प्र.) कलिंग नगर (उड़ीसा) जैसी अनेक जगहों पर जबरन भूमि अधिग्रहण की त्रासद और बर्बर घटनाओं की कहानियाँ। मेहंदी खेड़ा, मुलताई (म.प्र.) के किसानों द्वारा अपने हक़ की माँग करने पर, सरकार द्वारा छलनी की गयी उनकी ज़िंदगियों, अनाथ बच्चों और बेवा औरतों की कहानियाँ। कोयल कारो, बरगी, मान, इंदिरा सागर, सरदार सरोवर जैसी अनेक बाँध परियोजनाओं से उजड़ी ज़िंदगियों की कहानियाँ। यहाँ मैं कहना चाहता हूँ कि सरकार की नीति… नीति नहीं, अनीति है। जो हर बार विकास का स्वांग रचकर आती है और ग़रीबों के विस्थापन से शुरू होती है। यूँ तो पिछले बाँसठ बरसों में आदिवासी, दलित, किसान और मज़दूरों की लाशों पर कई कल्याणकारी योजनाओं की नीव रखी गई, लेकिन पिछले उन्नीस-बीस बरसों में दमन की गति बेतहाशा बढ़ी है। आप इतिहास के पन्ने पलटेंगे तो देखेंगे कि कितना ख़ून बिखरा है पन्नों पर।
अगर आप इतिहास के इन लहूलुहान पन्नों को नहीं पलटना चाहते, तो छोड़िए.. मत पलटिये। चलिए … वर्तमान से ही रूबरू हो लीजिए। आज देश के अनेक हिस्सों में सरकार द्वारा कई दमनात्मक कार्यवाही की जा रही है। सरकार कहती है कि वह यह सब विकास के लिए कर रही है। कुछ लोग जो खाये-पीये अघाये हैं, वे भी सरकार के सुर में सुर मिलाकर कहते हैं कि विकास तो ज़रूरी है और होना चाहिए। साथ में यह भी कहते हैं कि विकास की क़ीमत किसी न किसी को तो चुकानी पड़ती है !

तो भैय्या मैं मानता हूँ कि विकास ज़रूरी है और चहुंमुखी विकास होना चाहिये। विकास के लिए क़ीमत भी चुकानी पड़ती है, तो चुकायी जानी चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि यह क़ीमत कौन चुकाये ? और कोई एक ही बार-बार क्यों चुकाये ? आदिवासी, दलित, किसान, और मज़दूर तो हमेशा ही क़ीमत चुकाते आयें हैं। तो इस बार क्यों नहीं ऎसा किया जाये कि शहर की चकाचक कॉलोनियों में रहने वालों को क़ीमत चुकाने का मौक़ा दिया जाये ? जहाँ-जहाँ से बाँध, खदानों, कारखानों और सरकार एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियों की योजनाओं की वजह से जंगल, पहाड़, गाँव, घर, झोपड़े से आदिवासी, दलित, किसान और मज़दूर को विस्थापित किया जा रहा हैं, उन सभी विस्थापितों को इन चकाचक कॉलोनियों में बसाया जाये। और चकाचक कॉलोनी वालों की संपत्ति भी जंगल, पहाड़, गाँव से विस्थापितों के नाम कर दी जाये। और चकाचक कॉलोनी वालों को वह मुआवज़ा दिया जाये, जो आदिवासियों और अन्य विस्थापितों को सरकार देती है या देने का ढोंग करती है। अगर ऎसा हो तो, शायद चकाचक कॉलोनी में रहने वालों को विकास के बदले चुकाई जाने वाली क़ीमत का असल महत्त्व समझ में आये ! और यह शुरुआत दक्षिण उड़ीसा की नियमगीरी पहाड़ियों से खदेड़े जाने वाले आदिवासियों को बसा कर भी की जा सकती है !

सरकार ने आदिवासियों से जंगल, पहाड़ मुक्त कराने के लिए आॉपरेशन ग्रीन हंट का एलान किया है। इस काम को ज़ल्दी से ज़ल्दी पूरा किया जा सके इसलिए ग्रेहाउंड्स, कोबरा, स्कार्पियन यानी खूँखार कुत्ते, कोबरा साँप और बिच्छू के नाम से ख़ास पुलिस दस्ते बनाये हैं। लेकिन विश्व बैंक के भूतपूर्व अधिकारी और हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री डाक्साब मनमोहन सिंहजी और वेदांता के भूतपूर्व ग़ैर कार्यकारी निदेशक एवं हमारे वर्तमान गृहमंत्री जी को कैसे, और भला कौन समझायें कि आदिवासी साँप, बिच्छू और कुत्तों से नहीं डरते हैं। साँप, बिच्छू को कुचलना और कुत्ते का मुँह अपने तीरों से भरना उन्हें बहुत अच्छे से आता है। शायद एकलव्य की कहानी तो आपने भी पढ़ी-सुनी होगी !

फोर्स के जवान जो आदिवासियों, किसानों और मज़दूरों का ख़ात्मा करने निकल पड़े हैं। उन जवानों में अस्सी से नब्बे फिसदी जवान गाँव में से किसानों और नीचले तबके के परिवारों से आते हैं। जो फोर्स के वरिष्ठ अधिकारी और गृहमंत्री साहब के एक आदेश पर अपनी जान की बाजी लगा देतें हैं। वरिष्ठ अधिकारी और गृहमंत्री साहब ने उन जवानों के दस्तों के नाम खूँखार कुत्ते, साँप और बिच्छू के दस्ते रखे हैं। ज़रा इस बात पर ग़ौर करे जनाब ! यदि जवानों के मग़ज़ में किसी ने यह बात ठीक से बैठाल दी, कि आप ने उनके ऎसे नाम रखे हैं, जो सभ्य समाज में कतई सम्माननीय विशेषण नहीं हैं, और इस बात से उनका भेजा घूम गया तो…, तो क्या कुछ हो सकता है ! शायद बंदूक की नाल जंगल, पहाड़, गाँव, झोपड़ों की बजाय दूसरी तरफ़ ही घूम जाये !

जब एक जवान किसी भी फोर्स में भर्ती होता है। प्रशिक्षण पूर्ण होने पर वह शपथ लेता है कि देश की आन, बान और शान की रक्षा करेगा। देश की रक्षा में उसे अपने प्राण भी न्यौछावर करना पड़े तो वह पीछे नहीं हटेगा। ऎसी शपथ से बँधे जवान की अगर कोई आँखें खोल दे कि उसे जिस आॉपरेशन ग्रीनहंट पर भेजा जा रहा है, वह किसी भी दृष्टि से देश हित में नहीं है। उनसे जो काम कराया जा रहा है, वह देशभक्ति भी नहीं है। बल्कि फोर्स के जवानों को मुगांबो जैसे कई चरित्र मिलकर छल रहे हैं। देशभक्ति की शपथ लेने वाले हाथों से ही सुनियोजित षडयंत्र के तहत देशभक्तों का ख़ात्मा करवाकर, देश को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मालिकों की सोने की थालियों में कैक के छोटे-छोटे पिस की तरह परोसाया जाने वाला है। तब… कल्पना कीजिए.. तब क्या हो सकता है ? क्या है देश के मानी जनाब ? रायसीना टिले पर खड़ी एक ईमारत.. और उसमें बैठने वाले चंद काले दिल वाले सफ़ेद पोश ! नहीं…! देश के मानी एक अरब से ज़्यादा धड़कती ज़िन्दगियाँ हैं। उन्हें अनदेखा, अनसुना कर देश के जंगलों, पहाड़ियों और नदियों का सौदा मत करिये ! कहीं ऎसा न हो कि जैसा आपने कहा- आॉपरेशन ग्रीनहंट, ये अरब से ज़्यादा आबादी यह कहने को विवश हो जाये कि आॉपरेशन रायसीना टिला क्लीन। इतिहास गवाह है। जब-जब आबादी की बाढ़ आयी है। अच्छी-अच्छी सत्ताओं और व्यवस्थाओं के पाये उखड़ गये हैं।

2004 में वित्त मंत्री का पद सम्भालने के पश्चात भले ही चिदंबरम साहब वेदांता के ग़ैर कार्यकारी निदेशक नहीं रहे हों, लेकिन उनकी कार्यप्रणाली से और उनकी बातों और निर्णयों से स्पष्ट लगता है कि वे आज भी वेदांता और उसकी तरह की पूँजीपति कंपनियों के हितों को ध्यान में रखकर सोच रहे हैं। आज मित्तल, टाटा, जिंदल, एस्सार, रिलायंस, पास्को, विलिटॉन, बी.एस. पी. और टिंटो ही नहीं, ऎसी सैकड़ों कंपनियाँ हैं जो देश के जंगल, पहाड़ के गर्भ में छुपे बॉक्साइड, कोयला, गैस, तेल आदि खनिज एवं प्राकृतिक संपदा पर अपनी गिद्ध दृष्टि गड़ाये बैठी हैं। कंपनियाँ उस भू्गर्भिय और प्राकृतिक संपदा को हर हाल और हर क़ीमत पर हथियाना चाहती हैं, फिर चाहे वह क़ीमत लाखों ग़रीबों की ज़िंदगियाँ ही क्यों न हों ?

आज पुलिस और सलवा जुडुम के लोग गोली चलाये या अपने हक़ की लड़ाई लड़ने वाले गोली दागे, मरने वाला एक ही वर्ग का होता है। कभी कोई पूँजपति या फिर मंत्री नहीं मरता है। पूँजपति और मंत्री मिलकर संविधान, क़ानून को धत्ता बताते हुए ग़रीबों का सफाया करने में लगे हुए हैं। इन कार्पोरेटियों ने केवल सरकार को ही अपने खिसे में नहीं रख लिया है, बल्कि इन्होंने प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रानिक मीडिया का भी खिस्या गरम कर रखा है। इसिलिए ज़्यादातर मीडिया कार्पोरेटियों के ही प्रचार-प्रसार में लगा है। ग़रीबों के मुद्दों को कोई अख़बार या चैनल दबंगता नहीं रख रहा है, क्योंकि ग़रीब उन्हें कुछ दे नहीं सकते हैं। मीडिया अपनी नैतिकता खोता जा रहा है।

कुछ ईमानदार वेबसाइटों पर पढ़ने में तो यह भी आता रहता है कि कई अख़बारों, टी.वी. चैनलों का पूरा-पूरा ख़र्चा धन्नासेठ ही चला रहे हैं। कई एन.जी.ओ. इन्हीं के दिये फण्ड से चल रहे हैं। खादी का कुर्ता और जींस पहन कंधे पर लैपटॉप का बैग लटकाये घुमने वाले, कभी जंगल, पहाड़, नदी, आदिवासी, दलित, स्त्री, ग़रीबी, खेत, किसान, स्वास्थ्य, शिक्षा, साम्प्रदायिकता, संस्कृति जैसे आदि मुद्दों पर सर्वे करने वालों में से कई इन्हीं कंपनियों द्वारा खड़ी की गई फन्डिग एजेन्सियों से फण्ड लेकर काम कर रहे हैं। कुछ तो बातचीत में बेशर्मी से खुलेआम इस बात को स्वीकार करते हैं। कुछ से सवाल करो तो वे छद्म वामपंथी, प्रगतिशील और जनवादी मुखौटा लगा लेते हैं और सवाल पूछने वाले को ही कटघरे में खड़ा कर देते हैं। तर्क़ देते हैं कि पैसा तो बस पैसा होता है। काला होता है, न सफ़ेद होता है। पैसा किससे लिया यह महत्त्व की बात नहीं, महत्त्व की बात यह है कि उसका उपयोग क्या कर रहे हैं ! असल में वे इस तर्क़ का उपयोग अपनी करतूतों पर पर्दा डालने के लिए ही करते हैं। लेकिन फन्डिग एजेन्सियों को भेजी जाने वाली उनकी रिपोर्टें इस तरक के चिंदे-चिंदे कर देती हैं। ऎसे ही छद्म वामपंथियों, प्रगतिशीलों, जनवादियों और एन.जी.ओ. ने पिछले उन्नीस-बीस बरस में वामपंथ को कितना नुकसान पहुँचाया है, यह वर्तमान में देखने को मिल भी रहा है। वामपंथी आंदलोनों को सबसे ज़्यादा नुकसान उनके भीतर मौजूद छद्म वामपंथियों ने ही पहुँचाया है।

अगर सरकार सचीमुची की ईमानदार है और देश का विकास करना चाहती है, तो मुझे नहीं लगता कि कोई सरकार के विकास में रोड़े अटकाने को फुर्सत में बैठा है। लेकिन सरकार विकास चाहती है, यह बात देश को समझाये तो सही। विकास की शर्त प्रत्येक का मुक्त विकास होना चाहिए। विकास का मतलब किसी भी व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण करना होना चाहिए। विकास व्यक्ति को मार कर कैसे किया जा सकता है ? विकास बदूंक की नाल से संभव है ! ऎसा कभी नहीं सुना-पढ़ा.. हाँ.. यह ज़रूर पढ़ा कि बंदूक की नाल ने साम्राज्यवादी, तानाशाह सत्ता को एक से अधिक बार उखाड़ फेंका है।

आज देश के अलग-अलग हिस्सों में कहीं शांति के नाम पर, कहीं विकास के नाम पर सरकार जो दमन की घट्टी (पत्थर की चक्की) चला रही है, उसमें सिर्फ़ और सिर्फ़ आदिवासी, दलित,किसान, मज़दूर, बच्चे,और औरतें ही पिसे जा रहे हैं। लेकिन सरकार की नज़र में ये लोग हिंसक हैं। हिंसक वो नहीं, जो विधान सभा में हिन्दी बोलने पर थप्पड़ मारते हैं और जो बाबरी, गुजरात और कंधमाल जैसे कांड करते हैं। सरकार उनका कुछ नहीं कर पाती है, लेकिन ग़रीब अपना हक़ माँगती है, तो उन्हें हिंसक कहकर कुचलने लगती है। सरकार को अपना यह दृष्टिदोष दूर करने की ज़रूरत है। अगर देश में लोकतंत्र है, तो असहमति के स्वर को भी सम्मान से सुनना चाहिए, न कि कुचलना चाहिए। क्या कभी सरकार द्वारा चलायी जा रही यह दमन की घट्टी रुकेगी ! क्या कभी टूटेंगे इस घट्टी के पुड़ ! और क्या वामपंथी आँदोलनकारी विरोध का ढोंग करना बंद कर, सच में साम्राज्यवादी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने की कोई सांगठनिक मुहिम छेड़ने का कभी मन बनायेंगे ?

शांति का आधार न्याय के सिवा क्या हो सकता है ? लेकिन हमारी सरकार के पास देने को न्याय ही तो नहीं है। उससे कुछ भी माँगों रोटी, कपड़ा, मकान, काम, हक़, या फिर न्याय। लेकिन अफसोस सरकार के पास देने को सिर्फ़ एक ही चीज़ है और वह गोली है। सरकार मुर्दा शांति स्थापित करना चाहती है, इसलिए एक बड़ी संख्या सरकार के कुतर्क़ों से असहमत हैं। असहमति का स्वर मणिपुर, काश्मीर, झारखण्ड, उ.प्र., प. बंगाल, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, म.प्र. की नर्मदा पट्टी और कहाँ-कहाँ नहीं गूँज रहा है। बंद और कसी मुट्ठियाँ आसमान में लहरा रही हैं। सबके अपने-अपने मुद्दे और हक़ के सवाल हैं।

जब से श्रीलंका की सेना ने लिट्टे का सफाया किया है। सरकार को भी वही धुन सवार है कि किसी तरह अपने पक्ष में जनमत बनाकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों की राह में रोड़े अटकाने वालों का, संवैधानिक अधिकारों की वकालत करने वालों का सफाया किया जाये। लेकिन सच में सरकार सफाया कर सकती है ! क्योंकि दमन कारी नीतियों से असहमत केवल माओवादी, नक्शलवादी, जन आँदलनकारी, और कुछ बुद्धिजीवी ही नहीं हैं, बल्कि देश की साठ से सत्तर प्रतिशत आबादी असहमत है। पर अभी वह असंगठित हैं। लेकिन जैसे ही सरकार असहमति के स्वर का सफाया करने को क़दम उठायेगी, यह साठ-सत्तर प्रतिशत अबादी एकजुट होने लगेगी और ये सरकार की हर गोली के सामने मिलेगी।

हमारे देश की सरकार काश्मीर सहित हर मुद्दे पर पाकिस्तान से बात करने को राज़ी है। चीन से बात करने को प्रयास रत है, बल्कि एक पाँव पर खड़ी है। लेकिन देश के भीतर देश हित में उठते असहमति के स्वर को न सुनने को तैयार है, न बातचीत के माध्यम से हल खोजने को राज़ी है। बल्कि देश में उठते असहमति के हर स्वर को ही सदा-सदा के लिए खामोश कर देना चाहती है। आज मुर्दा शांति स्थापित करना ही पूँजीपतियों और सरकार के हित में है। इनके हित से ऊपर सरकार की नज़र में शायद देश भी नहीं है। एक बार … सिर्फ़ एक बार एकजुट होकर सोचो इस व्यवस्था का पहिया चलाने वालों… चुपचाप गोली खाकर मुर्दा शांति स्थापित करने वालों का सहयोग करने के पक्ष में हो या संघर्ष के पक्ष में। अपना पक्ष और लक्ष्य तय करो। क्योंकि दमन की घट्टी इंसान पीस रही है। किसी की बारी आज तो किसी की कल है।

सत्यनारायण पटेल
बिजूका फ़िल्म क्लब
एम-2 /199, अयोध्या नगरी,
इन्दौर-11 (म.प्र.)
ssattu2007@gmail.com,
bizooka2009.blogspot.com

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